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विश्व में मृत्यु के 17 प्रमुख कारण

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, 2019 में, दुनिया भर में मौत के शीर्ष 10 कारण 55.4 मिलियन लोगों की मृत्यु का 55% हिस्सा था। हृदय रोग, स्ट्रोक, श्वसन रोग और नवजात शिशुओं में संक्रमण सबसे ज्यादा मौतों का कारण बनता है। विश्व स्तर पर, 2019 में मृत्यु के 10 प्रमुख कारणों में से 7 छुआछूत वाली बीमारियां नहीं थीं। इन सात कारणों से होने वाली मौतें सभी मौतों का 44% हिस्सा है। हृदय रोग से पूरी दुनियां में सबसे ज्यादा मौतें होती हैं। यह दुनिया भर में होने वाली कुल मौतों में 16% मौत के लिए जिम्मेदार है। स्ट्रोक और क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिज़ीज मौत का दूसरा और तीसरा प्रमुख कारण है और उसके बाद सांस का संक्रमण मौत का चौथा प्रमुख कारण बनता है। यह विश्व स्वास्थ्य संगठन का डाटा है।


हृदयवाहिका रोग Cardiovascular disease

Average 17.79 million Deaths Noted by Cardiovascular Diseases.

हृदय रोग या हृदयनलिका रोग ऐसे रोगों का एक समूह है, जो हृदय या रक्त नलिकाओं (धमनियां और शिराएं) को ग्रस्त करते हैं. हालांकि इस शब्द का संबंध ऐसे किसी भी रोग से है जो हृदयनलिका तंत्र (MeSH C14 में प्रयोग) को प्रभावित करता हो, सामान्यतः इसका प्रयोग मेदकाठिन्य या एथेरोस्क्लेरोसिस (धमनी के रोग) से संबंधित रोगों के लिये किया जाता है. इन तंत्र और उपचार शर्तों के समान होता है. व्यवहार में, हृदयनलिका रोग का उपचार हृदयरोगतज्ञों, वक्ष के शल्यचिकित्सकों, रक्तनलिकाओं के शल्यचिकित्सकों, नाड़ीरोगतज्ञों और व्यवधानी रेडियोलाजिस्टों द्वारा किया जाता है, जिनका कार्यक्षेत्र उपचाराधीन अवयव तंत्र पर निर्भर करता है. विभिन्न विशेषज्ञताओं के बीच काफी आपसी आच्छादन होता है और यह आम बात है कि एक ही अस्पताल में कतिपय प्रक्रियाएं भिन्न प्रकार के विशेषज्ञों द्वारा की जाती हैं. अधिकांश देश हृदयनलिका रोग की उच्च और बढ़ती दरों का सामना कर रहे हैं. प्रति वर्ष कैंसर की अपेक्षा हृदय रोग से कहीं अधिक अमेरिकियों की मृत्यु होती है. पिछले कुछ वर्षों में स्त्रियों में हृदयनलिका रोग का जोखम बढ़ने लगा है और स्तन कैंसर की अपेक्षा अधिक स्त्रियों की मृत्यु इससे हुई है. एक बड़े ऊतकवैज्ञानिक अध्ययन (पीडीएवाई) में देखा गया है कि रक्तनलिकीय विक्षति किशोरवय से जमा होती रहती है, जिससे प्राथमिक रोकथाम के प्रयास बाल्यावस्था से ही किया जाना आवश्यकता हो गया है.जिस समय तक हृदय की समस्याओं का पता चलता है, इसका मूल कारण (मेदकाठिन्य) सामान्यतः काफी बढ़ चुका होता है, क्योंकि वह कई दशकों से उन्नत हो रहा होता है. इसलिये, मेदकाठिन्य की रोकथाम के लिये जोखम कारकों में फेर-बदल लाने पर जोर दिया जा रहा है, जैसे, स्वस्थ भोजन और व्यायाम करके तथा धूम्रपान का त्याग करके.

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कर्कट रोग Cancer

Average 9.56 million Deaths Noted by Cancer.

कैंसर से लड़ने में सबसे कारगर है-व्रत/उपवास। आयुर्वेद की एक सूक्ति या कहावत है- ज्वर साधु और पाहुना लंघन देय कराए— अर्थात रोग होने पर भोजन छोड़ देना चाहिए। यह सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा है। दूसरी बात है कि जब कभी साधु या रिश्तेदार एक या दो दिन से घर में ज्यादा रुके, तो लंघन यानि भूखा रखना चाहिए। उसे समय पर कुछ भी खाने पीने को न देंवें। चाहें वह कितना ही मान-धान क्यों न हो। किसी भी बाहरी व्यक्ति के घर में रुकने से उसके विचारों में खोटापन आने लगता है। वह आपके निजी मामले में दखलंदाजी करने लगेगा। यह बड़े-बुजुर्गों के अनुभव हैं। आजमा सकते हैं। व्रतराज नामक ग्रन्थ में लगभग 112 तरह के व्रतों का वर्णन है। इन व्रतों द्वारा रोगों से मुक्ति के उपाय बताए गए हैं। जैसे-एकादशी के व्रत रखने से वात-पित्त-कफ सन्तुलित रहते हैं। चतुर्दशी के उपवास से मानसिक विकार नहीं होते। पंचमी को व्रत रखने से आत्मविश्वास एवं मनोबल बढ़ता है। अष्टमी के व्रत से सिद्धियां आती हैं। चतुर्थी के व्रत से ज्ञान-बुद्धि तेज होती है। भारत की अनेकों महिलाएं अपने पति व परिवार की खुशी के लिए निर्जल और निराहार व्रत रखती हैं। जैसे-निर्जला ग्यारस, करवा चौथ, तीजा व्रत आदि इसीलिए भारत में महिलाएं कम बीमार रहती हैं। अब वैज्ञानिकों की खोजे जाने- जर्मनी के 4 वैज्ञानिक भारत के विभिन्न क्षेत्रों में रहकर शोध किया कि व्रत का क्या प्रभाव है। इनकी टीम में से 2 लोगों ने 7 दिन का व्रत रखा और 2 लोगों ने नहीं। जांच करने पर पाया कि जिन्होंने व्रत किया उनकी इम्युनिटी काफी बेहतर थी, वे ऊर्जा से भरा महसूस कर रहे थे। व्रत पर अनुसंधान करने वाले वैज्ञानिकों के अनुसार 12 घण्टे तक कुछ न खाने वाले लोगों के शरीर में ऑटोफागी नाम की सफाई प्रक्रिया शुरू हो जाती है।उपवास से मृत, बेकार कोशिकाओं को शरीर साफ-स्वच्छ कर उसे स्वस्थ्य बनाने लगता है। भूखे रहने और उपवास करना दोनों नवीन कोशिकाओं के निर्माण में फ़ायदेमन्द है। व्रत-उपवास के फायदे पर एक रिसर्चर जपानी वैज्ञानिक योशीनोरी ओसुमि को नॉबेल पुरस्कार मिला था। जापान में लम्बे जीने वाले सर्वाधिक लोग हैं। ये लोग 7 दिन में एक बार पूरी तरह निराहार रहते हैं। उपवास से शरीर को फायदा—बीमार होने पर भोजन के बीच लम्बा अंतराल रखें। कोशिश करें कि केवल पानी पीकर ही काम चल सके। कुछ लोगों पर व्रत का यह प्रयोग कराया गया, उनकी सभी दवाएं बन्द करनी पड़ी, क्यों कि वे पूरी तरह स्वस्थ्य थे।

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श्वसन तंत्र के रोग Respiratory disease

More than 3.91 million Deaths Noted by Respiratory Diseases.

श्वसन तंत्र के रोगों में फेफड़ों के रोग, श्वासनली के रोग सहित इस तंत्र के अन्य रोग शामिल हैं। श्वसन तंत्र के रोगों में स्वयंसीमित सर्दी-जुकाम से लेकर जीवाणुजन्य न्यूमोनिया जैसे घातक रोग हैं।

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पाचन रोग Digestive diseases

Average 2.38 million Deaths Noted by Digestive Diseases.

पाचन तंत्र जठरांत्र संबंधी मार्ग (जीआई), यकृत, अग्न्याशय और पित्ताशय से बना होता है जो शरीर को भोजन पचाने में मदद करता है। भोजन को पोषक तत्वों में तोड़ने के लिए पाचन महत्वपूर्ण है, जिसका उपयोग आपका शरीर ऊर्जा, विकास और कोशिका की मरम्मत के लिए करता है।

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यकृत रोग Liver disease

Average 1.32 million Deaths Noted by Liver Diseases.

इस नाम से भी जाना जाता है: जिगर की बीमारी

कोई भी स्थिति जो लिवर को क्षति पहुंचाती है और उसे ठीक से काम करने से रोकती है

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क्षयरोग Tuberculosis

Average 1.18 million Deaths Noted by Tuberculosis.

यक्ष्मा, तपेदिक, क्षयरोग, एमटीबी या टीबी (tubercle bacillus का लघु रूप) एक आम और कई मामलों में घातक संक्रामक बीमारी है जो माइक्रोबैक्टीरिया, आमतौर पर माइकोबैक्टीरियम तपेदिक के विभिन्न प्रकारों की वजह से होती है। क्षय रोग आम तौर पर फेफड़ों पर हमला करता है, लेकिन यह शरीर के अन्य भागों को भी प्रभावित कर सकता हैं। यह हवा के माध्यम से तब फैलता है, जब वे लोग जो सक्रिय टीबी संक्रमण से ग्रसित हैं, खांसी, छींक, या किसी अन्य प्रकार से हवा के माध्यम से अपना लार संचारित कर देते हैं। ज्यादातर संक्रमण स्पर्शोन्मुख और भीतरी होते हैं, लेकिन दस में से एक भीतरी संक्रमण, अंततः सक्रिय रोग में बदल जाते हैं, जिनको अगर बिना उपचार किये छोड़ दिया जाये तो ऐसे संक्रमित लोगों में से 50% से अधिक की मृत्यु हो जाती है।
सक्रिय टीबी संक्रमण के आदर्श लक्षण खून-वाली थूक के साथ पुरानी खांसी, बुखार, रात को पसीना आना और वजन घटना हैं (बाद का यह शब्द ही पहले इसे "खा जाने वाला/यक्ष्मा" कहा जाने के लिये जिम्मेदार है)। अन्य अंगों का संक्रमण, लक्षणों की एक विस्तृत श्रृंखला प्रस्तुत करता है। सक्रिय टीबी का निदान रेडियोलोजी, (आम तौर पर छाती का एक्स-रे) के साथ-साथ माइक्रोस्कोपिक जांच तथा शरीर के तरलों की माइक्रोबायोलॉजिकल कल्चर पर निर्भर करता है। भीतरी या छिपी टीबी का निदान ट्यूबरक्यूलाइन त्वचा परीक्षण (TST) और/या रक्त परीक्षणों पर निर्भर करता है। उपचार मुश्किल है और इसके लिये, समय की एक लंबी अवधि में कई एंटीबायोटिक दवाओं के माध्यम से उपचार की आवश्यकता पड़ती है। यदि आवश्यक हो तो सामाजिक संपर्कों की भी जांच और उपचार किया जाता है। दवाओं के प्रतिरोधी तपेदिक (MDR-TB) संक्रमणों में एंटीबायोटिक प्रतिरोध एक बढ़ती हुई समस्या है। रोकथाम जांच कार्यक्रमों और बेसिलस काल्मेट-गुएरिन बैक्सीन द्वारा टीकाकरण पर निर्भर करती है।
ऐसा माना जाता है कि दुनिया की आबादी का एक तिहाई एम.तपेदिक, से संक्रमित है, नये संक्रमण प्रति सेकंड एक व्यक्ति की दर से बढ़ रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार, 2007 में विश्व में, 13.7 मिलियन जटिल सक्रिय मामले थे, जबकि 2010 में लगभग 8.8 मिलियन नये मामले और 1.5 मिलियन संबंधित मौतें हुई जो कि अधिकतर विकासशील देशों में हुई थीं। 2006 के बाद से तपेदिक मामलों की कुल संख्या कम हुई है और 2002 के बाद से नये मामलों में कमी आई है। तपेदिक का वितरण दुनिया भर में एक समान नहीं है; कई एशियाई और अफ्रीकी देशों में जनसंख्या का 80% ट्यूबरक्यूलाइन परीक्षणों में सकारात्मक पायी गयी, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका की आबादी का 5-10% परीक्षणों के प्रति सकारात्मक रहा है। प्रतिरक्षा में समझौते के कारण, विकासशील दुनिया के अधिक लोग तपेदिक से पीड़ित होते हैं, जो कि मुख्य रूप से HIV संक्रमण की उच्च दर और उसके एड्स में विकास के कारण होता है।

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श्वासनली के निचले हिस्से का संक्रमण Lower respiratory tract infection

Average 2.56 million Deaths Noted by Lower Respiratory Tract Infections.

निचली श्वासनली, स्वर ग्रंथि के नीचे स्थित श्वसन पथ का ही एक भाग है।
इस शीर्षक, श्वसन पथ के निचले भाग का संक्रमण, का प्रयोग प्रायः निमोनिया के समानार्थक शब्द के रूप में किया जाता है, लेकिन इसका प्रयोग अन्य प्रकार के संक्रमणों के लिए भी किया जा सकता है जिसमे फेफड़ों में होने वाला फोड़ा और गंभीर श्वसन शोथ (फेफड़ों की सूजन) भी शामिल हैं। इसके लक्षणों में सांस लेने में कठिनाई, कमजोरी, तेज़ बुखार खांसी और थकावट आते हैं।
श्वसन पथ के निचले भाग का संक्रमण साधारणतया इसके ऊपरी भाग के संक्रमण से अधिक गंभीर होता है और इससे हमारे स्वास्थ्य बजट पर भी काफी दबाव पड़ता है। 1993 से श्वसन पथ के निचले भाग में होने वाले संक्रमण के कारण होने वाली मृत्युओं की संख्या में मामूली कमी आयी है। हालांकि फिर भी सन 2002 में इसका प्रतिशत संक्रमण के कारण होने वाली बिमारियों में सर्वधिक था और इस बीमारी के कारण उस वर्ष विश्व स्तर पर 3.9 मिलियन मृत्यु हुई थी और उस वर्ष हुई कुल मृत्युओं में से 6.9 प्रतिशत मौतें इसी के कारण हुई थीं।
कई तरह के घातक और दीर्घकालिक संक्रमण श्वसन पथ के निचले हिस्से को प्रभावित करते हैं। दो सर्वाधिक प्रचलित संक्रमण निमोनिया और ब्रोंकाइटिस हैं। ज़ुकाम श्वसन पथ के निचले और ऊपरी दोनों हिस्सों को प्रभावित करता है। श्वसन पथ के निचले हिस्से के संक्रमणों में एंटीबॉयटिक को प्रायः प्राथमिक उपचार माना जाता है; हालांकि वायरल (विषाणुजनित) संक्रमणों में ऐसा नहीं होता है। संक्रमण फ़ैलाने वाले जीव के आधार पर उचित एंटीबॉयटिक का चुनाव आवश्यक है और इसके लिए इन संक्रमणों की विकास की प्रकृति तथा परम्परागत उपचारों के प्रति विकसित प्रतिरोधक क्षमता के साथ साथ उपचार का तरीका भी बदलना पड़ता है।
एच. इन्फ्ल्युएंज़ा (H. influenzae) और एम.कटेर्हेलिस (M. catarrhalis) समुदाय उपार्जित निमोनिया (community acquired pneumonia)(CAP) और दीर्घकालिक ब्रोंकाइटिस की घातक तीव्रता (acute exacerbation of chronic bronchitis) (AECB) के सम्बन्ध में अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं जबकि एस.निमोनिया का महत्व घटता जा रहा है। असामान्य रोगाणुओं जैसे सी. निमोनिया, एम. निमोनिया और एल. निमोनिया की CAP में महत्ता भी स्पष्ट हो गयी है।

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किडनी डिजीज Kidney disease

Average 1.23 million Deaths Noted by Kidney Diseases.

लंबे समय से चल रहा गुर्दे का रोग जिसके कारण गुर्दे काम करना बंद कर सकते हैं.गुर्दे खून से बेकार और नुकसान पहुंचाने वाले पदार्थों और अतिरिक्त तरल को छानते हैं| गुर्दों के काम बंद करने पर यह खराब पदार्थ शरीर में जमा होने लगते हैं.लक्षण धीरे-धीरे बढ़ते हैं और वे अन्य रोगों के लक्षण भी हो सकते हैं. कुछ लोगों में कोई लक्षण नहीं होता और प्रयोगशाला में जाँच कराने पर उनमें रोग होने का पता लगता है.दवाओं से लक्षणों को रोका जा सकता है. रोग बढ़ जाने पर खून को मशीन से छानना पड़ता है (डायलिसिस) या फिर गुर्दा प्रत्यारोपण की ज़रूरत हो सकती है|

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अतिसार Diarrhea

Average 1.57 million Deaths Noted by Diarrhea Diseases.

अतिसार या डायरिया (अग्रेज़ी:Diarrhea) में या तो बार-बार मल त्याग करना पड़ता है या मल बहुत पतले होते हैं या दोनों ही स्थितियां हो सकती हैं। पतले दस्त, जिनमें जल का भाग अधिक होता है, थोड़े-थोड़े समय के अंतर से आते रहते हैं।

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एड्स HIV/AIDS

Average 954,492 Deaths Noted by HIV/AIDS.

उपार्जित प्रतिरक्षी अपूर्णता सहलक्षण या एड्स (अंग्रेज़ी:एड्स) मानवीय प्रतिरक्षी अपूर्णता विषाणु [मा.प्र.अ.स.] (एच.आई.वी) संक्रमण के बाद की स्थिति है, जिसमें मानव अपने प्राकृतिक प्रतिरक्षण क्षमता खो देता है। एड्स स्वयं कोई बीमारी नही है पर एड्स से पीड़ित मानव शरीर संक्रामक बीमारियों, जो कि जीवाणु और विषाणु आदि से होती हैं, के प्रति अपनी प्राकृतिक प्रतिरोधी शक्ति खो बैठता है क्योंकि एच.आई.वी (वह वायरस जिससे कि एड्स होता है) रक्त में उपस्थित प्रतिरोधी पदार्थ लसीका-कोशो पर आक्रमण करता है। एड्स पीड़ित के शरीर में प्रतिरोधक क्षमता के क्रमशः क्षय होने से कोई भी अवसरवादी संक्रमण, यानि आम सर्दी जुकाम से ले कर क्षय रोग जैसे रोग तक सहजता से हो जाते हैं और उनका इलाज करना कठिन हो जाता हैं। एच.आई.वी. संक्रमण को एड्स की स्थिति तक पहुंचने में 8 से 10 वर्ष या इससे भी अधिक समय लग सकता है। एच.आई.वी से ग्रस्त व्यक्ति अनेक वर्षों तक बिना किसी विशेष लक्षणों के बिना रह सकते हैं।
एड्स वर्तमान युग की सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है यानी कि यह एक महामारी है। एड्स के संक्रमण के तीन मुख्य कारण हैं - असुरक्षित यौन संबंधो, रक्त के आदान-प्रदान तथा माँ से शिशु में संक्रमण द्वारा। राष्ट्रीय उपार्जित प्रतिरक्षी अपूर्णता सहलक्षण नियंत्रण कार्यक्रम और [1] संयुक्त राष्ट्रसंघ उपार्जित प्रतिरक्षी अपूर्णता सहलक्षण] दोनों ही यह मानते हैं कि भारत में 80 से 85 प्रतिशत संक्रमण असुरक्षित विषमलिंगी/विषमलैंगिक यौन संबंधों से फैल रहा है। माना जाता है कि सबसे पहले इस रोग का विषाणु: एच.आई.वी, अफ्रीका के खास प्राजाति की बंदर में पाया गया और वहीं से ये पूरी दुनिया में फैला। अभी तक इसे लाइलाज माना जाता है लेकिन दुनिया भर में इसका इलाज पर शोधकार्य चल रहे हैं। 1981 में एड्स की खोज से अब तक इससे लगभग 30 करोड़ लोग जान गंवा बैठे हैं।

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मनोभ्रंश रोग Dementia

Average 2.51 million Deaths Noted by Dementia.

मनोभ्रंश (डिमेंशिया) से ग्रस्त व्यक्ति की याददाशत भी कमज़ोर हो जाती है। वे अपने दैनिक कार्य ठीक से नहीं कर पाते। कभी-कभी वे यह भी भूल जाते हैं कि वे किस शहर में हैं, या कौनसा साल या महीना चल रहा है। बोलते हुए उन्हें सही शब्द नहीं सूझता। उनका व्यवहार बदला बदला सा लगता है और व्यक्तित्व में भी फ़र्क आ सकता है। मनोभ्रंश रोग (डिमेंशिया) दिमाग की क्षमता का निरंतर कम होना है। यह दिमाग की बनावट में शारीरिक बदलावों के परिणामस्वरूप होता है। ये बदलाव स्मृति, सोच, आचरण तथा मनोभाव को प्रभावित करते हैं। एलसायमर रोग मनोभ्रंश रोग (डिमेंशिया) की सबसे सामान्य किस्म है। मनोभ्रंश रोग (डिमेंशिया) की अन्य किस्में हैं- नाड़ी संबंधी डिमेंशिया, लुई बाड़िस वाला डिमेंशिया तथा फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया शामिल हैं। वास्त्व में मनोभ्रंश किसी विशेष बीमारी का नाम नहीं, बल्कि के लक्षणों के समूह का नाम है, जो मस्तिष्क की हानि से सम्बंधित हैं। “Dementia” शब्द “de” (without) और “mentia” (mind) को जोड़ कर बनाया गया है।

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शराबीपन Alcoholism

Average 184,934 Deaths Noted by Alcohol use Disorders.

शराबीपन, जिसे शराब निर्भरता भी कहते हैं, एक निष्क्रिय कर देने वाला नशीला विकार है जिसे बाध्यकारी और अनियंत्रित शराब की लत के रूप में निरूपित किया जाता है जबकि पीन वाले के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है और उसके जीवन में नकारात्मक सामाजिक परिणाम देखने को मिलते हैं। अन्य नशीली दवाओं की लत की तरह शराबीपन को चिकित्सा की दृष्टि से एक इलाज़ योग्य बीमारी के रूप में परिभाषित किया गया है। 19वीं सदी और 20वीं सदी की शुरुआत में, शराब पर निर्भरता को शराबीपन शब्द के द्वारा प्रतिस्थापित किये जाने से पूर्व इसे मदिरापान कहा जाता था।शराबीपन को सहारा देने वाले जैविक तंत्र अनिश्चित हैं, लेकिन फिर भी, जोखिम के कारकों में सामाजिक वातावरण, तनाव, मानसिक स्वास्थ्य, अनुवांशिक पूर्ववृत्ति, आयु, जातीय समूह और लिंग शामिल हैं। लम्बे समय तक चलने वाली शराब पीने की लत मस्तिष्क में शारीरिक बदलाव, जैसे - सहनशीलता और शारीरिक निर्भरता, लाती है, जिससे पीना बंद होने पर शराब वापसी सिंड्रोम का परिणाम सामने आता है। ऐसा मस्तिष्क प्रक्रिया बदलाव पीना बंद करने के लिए शराबी की बाध्यकारी अक्षमता को बनाए रखता है। शराब प्रायः शरीर के प्रत्येक अंग को क्षतिग्रस्त कर देती है जिसमें मस्तिष्क भी शामिल है; लम्बे समय से शराब पीने की लत के संचयी विषाक्त प्रभावों के कारण शराबी को चिकित्सा और मनोरोग सम्बन्धी कई विकारों का सामना करने का जोखिम उठाना पड़ता है। शराबीपन की वजह से शराबियों और उनके जीवन से जुड़े लोगों को गंभीर सामाजिक परिणामों का सामना करना पड़ता है।शराबीपन सहनशीलता, वापसी और अत्यधिक शराब के सेवन की चक्रीय उपस्थिति है; अपने स्वास्थ्य को शराब से होने वाली क्षति की जानकारी होने के बावजूद ऐसी बाध्यकारी पियक्कड़ी को नियंत्रित करने में पियक्कड़ की अक्षमता इस बात का संकेत देती है कि व्यक्ति एक शराबी हो सकता है। प्रश्नावली पर आधारित जांच शराबीपन सहित नुकसानदायक पीने के तरीकों का पता लगाने की एक विधि है। वापसी के लक्षणों को प्रबंधित करने के लिए आम तौर पर सहनशीलता-विरोधी दवाओं, जैसे - बेंज़ोडायज़ेपींस, के साथ शराब पीने से शराबी व्यक्ति को उबारने के लिए शराब विषहरण की व्यवस्था की जाती है। शराब से संयम करने के लिए आम तौर पर चिकित्सा के बाद की जानी वाली देखभाल, जैसे - समूह चिकित्सा, या स्व-सहायक समूह, की आवश्यकता है। शराबी अक्सर अन्य नशों, खास तौर पर बेंज़ोडायज़ेपींस, के भी आदि होते हैं, जिसके लिए अतिरिक्त चिकित्सीय इलाज की आवश्यकता हो सकती है। एक शराबी होने के नाते पुरुषों की अपेक्षा शराब पीने वाली महिलाएं शराब के हानिकारक शारीरिक, दिमागी और मानसिक प्रभावों और वर्धित सामाजिक कलंक के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि दुनिया भर में शराबियों की संख्या 140 मिलियन है।

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मलेरिया Malaria

Average 619,827 Deaths Noted by Malaria.

मलेरिया या दुर्वात एक वाहक-जनित संक्रामक रोग है जो प्रोटोज़ोआ परजीवी द्वारा फैलता है। यह मुख्य रूप से अमेरिका, एशिया और अफ्रीका महाद्वीपों के उष्ण तथा उपोष्ण कटिबंधी क्षेत्रों में फैला हुआ है। प्रत्येक वर्ष यह 51.5 करोड़ लोगों को प्रभावित करता है तथा 10 से 30 लाख लोगों की मृत्यु का कारण बनता है जिनमें से अधिकतर उप-सहारा अफ्रीका के युवा बच्चे होते हैं। मलेरिया को आमतौर पर गरीबी से जोड़ कर देखा जाता है किंतु यह खुद अपने आप में गरीबी का कारण है तथा आर्थिक विकास का प्रमुख अवरोधक है।
मलेरिया सबसे प्रचलित संक्रामक रोगों में से एक है तथा भंयकर जन स्वास्थ्य समस्या है। यह रोग प्लास्मोडियम गण के प्रोटोज़ोआ परजीवी के माध्यम से फैलता है। केवल चार प्रकार के प्लास्मोडियम (Plasmodium) परजीवी मनुष्य को प्रभावित करते है जिनमें से सर्वाधिक खतरनाक प्लास्मोडियम फैल्सीपैरम (Plasmodium falciparum) तथा प्लास्मोडियम विवैक्स (Plasmodium vivax) माने जाते हैं, साथ ही प्लास्मोडियम ओवेल (Plasmodium ovale) तथा प्लास्मोडियम मलेरिये (Plasmodium malariae) भी मानव को प्रभावित करते हैं। इस सारे समूह को 'मलेरिया परजीवी' कहते हैं।
मलेरिया के परजीवी का वाहक मादा एनोफ़िलेज़ (Anopheles) मच्छर है। इसके काटने पर मलेरिया के परजीवी लाल रक्त कोशिकाओं में प्रवेश कर के बहुगुणित होते हैं जिससे रक्तहीनता (एनीमिया) के लक्षण उभरते हैं (चक्कर आना, साँस फूलना, द्रुतनाड़ी इत्यादि)। इसके अलावा अविशिष्ट लक्षण जैसे कि बुखार, सर्दी, उबकाई और जुखाम जैसी अनुभूति भी देखे जाते हैं। गंभीर मामलों में मरीज मूर्च्छा में जा सकता है और मृत्यु भी हो सकती है।
मलेरिया के फैलाव को रोकने के लिए कई उपाय किये जा सकते हैं। मच्छरदानी और कीड़े भगाने वाली दवाएं मच्छर काटने से बचाती हैं, तो कीटनाशक दवा के छिडकाव तथा स्थिर जल (जिस पर मच्छर अण्डे देते हैं) की निकासी से मच्छरों का नियन्त्रण किया जा सकता है। मलेरिया की रोकथाम के लिये यद्यपि टीके/वैक्सीन पर शोध जारी है, लेकिन अभी तक कोई उपलब्ध नहीं हो सका है। मलेरिया से बचने के लिए निरोधक दवाएं लम्बे समय तक लेनी पडती हैं और इतनी महंगी होती हैं कि मलेरिया प्रभावित लोगों की पहुँच से अक्सर बाहर होती है। मलेरिया प्रभावी इलाके के ज्यादातर वयस्क लोगों मे बार-बार मलेरिया होने की प्रवृत्ति होती है साथ ही उनमें इस के विरूद्ध आंशिक प्रतिरोधक क्षमता भी आ जाती है, किंतु यह प्रतिरोधक क्षमता उस समय कम हो जाती है जब वे ऐसे क्षेत्र मे चले जाते है जो मलेरिया से प्रभावित नहीं हो। यदि वे प्रभावित क्षेत्र मे वापस लौटते हैं तो उन्हे फिर से पूर्ण सावधानी बरतनी चाहिए। मलेरिया संक्रमण का इलाज कुनैन या आर्टिमीसिनिन जैसी मलेरियारोधी दवाओं से किया जाता है यद्यपि दवा प्रतिरोधकता के मामले तेजी से सामान्य होते जा रहे हैं।

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यकृत शोथ Hepatitis

Average 126,391 Deaths Noted by Hepatitis.

हेपाटाइटिस या यकृत शोथ यकृत को हानि पहुंचाने वाला एक गंभीर और खतरनाक रोग होता है। इसका शाब्दिक अर्थ ही यकृत को आघात पहुंचना है। यह नाम प्राचीन ग्रीक शब्द हेपार (ἧπαρ), मूल शब्द हेपैट - (ἡπατ-) जिसका अर्थ यकृत और प्रत्यय -आइटिस जिसका अर्थ सूज़न है, से व्युत्पन्न है। इसके प्रमुख लक्षणों में अंगो के उत्तकों में सूजी हुई कोशिकाओं की उपस्थिति आता है, जो आगे चलकर पीलिया का रूप ले लेता है। यह स्थिति स्वतः नियंत्रण वाली हो सकती है, यह स्वयं ठीक हो सकता है, या यकृत में घाव के चिह्न रूप में विकसित हो सकता है। हैपेटाइटिस अतिपाती हो सकता है, यदि यह छः महीने से कम समय में ठीक हो जाये। अधिक समय तक जारी रहने पर चिरकालिक हो जाता है और बढ़ने पर प्राणघातक भी हो सकता है। हेपाटाइटिस विषाणुओं के रूप में जाना जाने वाला विषाणुओं का एक समूह विश्व भर में यकृत को आघात पहुंचने के अधिकांश मामलों के लिए उत्तरदायी होता है। हेपाटाइटिस जीवविषों (विशेष रूप से शराब (एल्कोहोल)), अन्य संक्रमणों या स्व-प्रतिरक्षी प्रक्रिया से भी हो सकता है। जब प्रभावित व्यक्ति बीमार महसूस नहीं करता है तो यह उप-नैदानिक क्रम विकसित कर सकता है। यकृत यानी लिवर शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है। वह भोजन पचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शरीर में जो भी रासायनिक क्रियाएं एवं परिवर्तन यानि उपापचय होते हैं, उनमें यकृत विशेष सहायता करता है। यदि यकृत सही ढंग से अपना काम नहीं करता या किसी कारण वे काम करना बंद कर देता है तो व्यक्ति को विभिन्न प्रकार के रोग हो सकते हैं। जब रोग अन्य लक्षणों के साथ-साथ यकृत से हानिकारक पदार्थों के निष्कासन, रक्त की संरचना के नियंत्रण और पाचन-सहायक पित्त के निर्माण में संलग्न यकृत के कार्यों में व्यवधान पहुंचाता है तो रोगी की तबीयत ख़राब हो जाती है और वह रोगसूचक हो जाता है। ये बढ़ने पर पीलिया का रूफ लेता है और अंतिम चरण में पहुंचने पर हेपेटाइटिस लिवर सिरोसिस और यकृत कैंसर का कारण भी बन सकता है। समय पर उपचार न होने पर इससे रोगी की मृत्यु तक हो सकती है।

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पार्किंसन रोग Parkinson's disease

Average 340,639 Deaths Noted by Parkinson’s Disease.

पार्किन्‍सोनिज्‍म का आरम्भ आहिस्ता-आहिस्ता होता है। पता भी नहीं पड़ता कि कब लक्षण शुरू हुए। अनेक सप्ताहों व महीनों के बाद जब लक्षणों की तीव्रता बढ़ जाती है तब अहसास होता है कि कुछ गड़बड़ है। डॉक्टर जब हिस्‍ट्री (इतिवृत्त) कुरेदते हैं तब मरीज़ व घरवाले पीछे मुड़ कर देखते हैं याद करते हैं और स्वीकारते हैं कि हां सचमुय ये कुछ लक्षण, कम तीव्रता के साथ पहले से मौजूद थे। लेकिन तारीख बताना सम्भव नहीं होता।
कभी-कभी किसी विशिष्ट घटना से इन लक्षणों का आरम्भ जोड़ दिया जाता है - उदाहरण के लिये कोई दुर्घटना, चोट, बुखार आदि। यह संयोगवश होता है। उक्त तात्कालिक घटना के कारण मरीज़ का ध्यान पार्किन्‍सोनिज्‍म के लक्षणों की ओर चला जाता है जो कि धीरे-धीरे पहले से ही अपनी मौजूदगी बना रहे थे।
बहुत सारे मरीजों में पार्किन्‍सोनिज्‍म रोग की शुरूआत कम्पन से होती है। कम्पन अर्थात् धूजनी या धूजन या ट्रेमर या कांपना।
पार्किंसन किसी को तब होता है जब रसायन पैदा करने वाली मस्तिष्क की कोशिकाएँ गायब होने लगती हैं

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पोषण की कमी Nutrient deficiency

Average 269,997 Deaths Noted by Nutritional Deficiencies.

पोषण की कमी तब होती है जब शरीर को विटामिन और खनिज जैसे पर्याप्त पोषक तत्व नहीं मिल रहे हैं। ऐसी कई स्थितियां हैं जो पोषण की कमी जैसे एनीमिया के कारण होती हैं । शरीर को स्वस्थ रहने और ठीक से काम करने के लिए विटामिन की आवश्यकता होती है।

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प्रोटीन-ऊर्जा कुपोषण Protein–energy malnutrition

Average 231,771 Deaths Noted by Protein-Energy Malnutrition.

विश्व स्वास्थ्य संगठन कुपोषण को परिभाषित करता है "पोषक तत्वों और ऊर्जा की आपूर्ति और उनके विकास, रखरखाव और विशिष्ट कार्यों को सुनिश्चित करने के लिए शरीर की मांग के बीच सेलुलर असंतुलन।

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मृत्यु के प्रमुख कारण मृत्यु के सबसे खतरनाक कारण वर्ल्ड वाइड मौत के कारण अधिकांश मौतों का कारण बनने वाले रोग