यह सूची उन विश्वविख्यात दार्शनिकों के बारे में है, जो भारतीय नहीं हैं|

  1. सुकरात Socrates
    सुकरात मौलिक शिक्षा और आचार द्वारा उदाहरण देना ही पसंद था। साधारण शिक्षा तथा मानव सदाचार पर वह जोर देता था और उन्हीं की तरह पुरानी रूढ़ियों पर प्रहार करता था। वह कहता था, ""सच्चा ज्ञान संभव है बशर्ते उसके लिए ठीक तौर पर प्रयत्न किया जाए; जो बातें हमारी समझ में आती हैं या हमारे सामने आई हैं, उन्हें तत्संबंधी घटनाओं पर हम परखें, इस तरह अनेक परखों के बाद हम एक सचाई पर पहुँच सकते हैं। ज्ञान के समान पवित्रतम कोई वस्तु नहीं हैं।' बुद्ध की भाँति सुकरात ने बहोत सारे ग्रंथ लिखे। बुद्ध के शिष्यों ने उनके जीवनकाल में ही उपदेशों को कंठस्थ करना शुरु किया था जिससे हम उनके उपदेशों को बहुत कुछ सीधे तौर पर जान सकते हैं; किंतु सुकरात के उपदेशों के बारे में यह भी सुविधा नहीं। सुकरात का क्या जीवनदर्शन था यह उसके आचरण से ही मालूम होता है, लेकिन उसकी व्याख्या भिन्न-भिन्न लेखक भिन्न-भिन्न ढंग से करते हैं। कुछ लेखक सुक्रात की प्रसन्नमुखता और मर्यादित जीवनयोपभोग को दिखलाकर कहते हैं कि वह भोगी था। दूसरे लेखक शारीरिक कष्टों की ओर से उसकी बेपर्वाही तथा आवश्यकता पड़ने पर जीवनसुख को भी छोड़ने के लिए तैयार रहने को दिखलाकर उसे सादा जीवन का पक्षपाती बतलाते हैं। सुकरात को हवाई बहस पसंद न थी। वह अथेन्स के बहुत ही गरीब घर में पैदा हुआ था। गंभीर विद्वान् और ख्यातिप्राप्त हो जाने पर भी उसने वैवाहिक जीवन की लालसा नहीं रखी। ज्ञान का संग्रह और प्रसार, ये ही उसके जीवन के मुख्य लक्ष्य थे। उसके अधूरे कार्य को उसके शिष्य अफलातून और अरस्तू ने पूरा किया। इसके दर्शन को दो भागों में बाँटा जा सकता है, पहला सुक्रात का गुरु-शिष्य-यथार्थवाद और दूसरा अरस्तू का प्रयोगवाद। तरुणों को बिगाड़ने, देवनिंदा और नास्तिक होने का झूठा दोष उसपर लगाया गया था और उसके लिए उसे जहर देकर मारने का दंड मिला था। सुकरात ने जहर का प्याला खुशी-खुशी पिया और जान दे दी। उसे कारागार से भाग जाने का आग्रह उसे शिष्यों तथा स्नेहियों ने किया किंतु उसने कहा- भाइयो, तुम्हारे इस प्रस्ताव का मैं आदर करता हूँ कि मैं यहाँ से भाग जाऊँ। प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और प्राण के प्रति मोह होता है। भला प्राण देना कौन चाहता है? किंतु यह उन साधारण लोगों के लिए हैं जो लोग इस नश्वर शरीर को ही सब कुछ मानते हैं। आत्मा अमर है फिर इस शरीर से क्या डरना? हमारे शरीर में जो निवास करता है क्या उसका कोई कुछ बिगाड़ सकता है? आत्मा ऐसे शरीर को बार बार धारण करती है अत: इस क्षणिक शरीर की रक्षा के लिए भागना उचित नहीं है। क्या मैंने कोई अपराध किया है? जिन लोगों ने इसे अपराध बताया है उनकी बुद्धि पर अज्ञान का प्रकोप है। मैंने उस समय कहा था-विश्व कभी भी एक ही सिद्धांत की परिधि में नहीं बाँधा जा सकता। मानव मस्तिष्क की अपनी सीमाएँ हैं। विश्व को जानने और समझने के लिए अपने अंतस् के तम को हटा देना चाहिए। मनुष्य यह नश्वर कायामात्र नहीं, वह सजग और चेतन आत्मा में निवास करता है। इसलिए हमें आत्मानुसंधान की ओर ही मुख्य रूप से प्रवृत्त होना चाहिए। यह आवश्यक है कि हम अपने जीवन में सत्य, न्याय और ईमानदारी का अवलंबन करें। हमें यह बात मानकर ही आगे बढ़ना है कि शरीर नश्वर है। अच्छा है, नश्वर शरीर अपनी सीमा समाप्त कर चुका। टहलते-टहलते थक चुका हूँ। अब संसार रूपी रात्रि में लेटकर आराम कर रहा हूँ। सोने के बाद मेरे ऊपर चादर ओढा देना।

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  2. प्लेटो Plato
    प्लोटिनस एक प्रमुख हेलेनिस्टिक दार्शनिक थे जो रोमन मिस्र में रहते थे। एन्नोइड्स में वर्णित उनके दर्शन में, तीन सिद्धांत हैं: एक, बुद्धि और आत्मा। उनके शिक्षक अम्मोनियस सैकस थे, जो प्लेटोनिक परंपरा के थे। 19 वीं शताब्दी के इतिहासकारों ने नियोप्लाटोनिज्म शब्द का आविष्कार किया  और इसे प्लोटिनस और उनके दर्शन पर लागू किया, जो लेट एंटिकिटी और मध्य युग के दौरान प्रभावशाली था। प्लोटिनस के बारे में जीवनी संबंधी अधिकांश जानकारी पॉर्फिरी की प्रस्तावना से प्लॉटिनस एननहेड्स के उनके संस्करण में आती है। उनकी आध्यात्मिक लेखनी ने सदियों से बुतपरस्त, यहूदी, ईसाई, ज्ञानी और इस्लामिक तत्वमीमांसा और मनीषियों को प्रेरित किया है, जिसमें धर्मों के भीतर मुख्यधारा की धर्मशास्त्रीय अवधारणाओं को प्रभावित करने वाले उपदेश शामिल हैं, जैसे कि दो आध्यात्मिक अवस्थाओं में द्वैत पर उनका काम। यह अवधारणा यीशु की ईश्वर की धारणा के समान है, ईश्वर और मनुष्य दोनों, ईसाई धर्मशास्त्र में एक मौलिक विचार है।

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  3. अरस्तू Aristotle
    अरस्तु (384 ईपू – 322 ईपू) यूनानी दार्शनिक थे। वे प्लेटो के शिष्य व सिकंदर के गुरु थे। उनका जन्म स्टेगेरिया नामक नगर में हुआ था । अरस्तु ने भौतिकी, आध्यात्म, कविता, नाटक, संगीत, तर्कशास्त्र, राजनीति शास्त्र, नीतिशास्त्र, जीव विज्ञान सहित कई विषयों पर रचना की। अरस्तु ने अपने गुरु प्लेटो के कार्य को आगे बढ़ाया।
    प्लेटो, सुकरात और अरस्तु पश्चिमी दर्शनशास्त्र के सबसे महान दार्शनिकों में एक थे। उन्होंने पश्चिमी दर्शनशास्त्र पर पहली व्यापक रचना की, जिसमें नीति, तर्क, विज्ञान, राजनीति और आध्यात्म का मेलजोल था। भौतिक विज्ञान पर अरस्तु के विचार ने मध्ययुगीन शिक्षा पर व्यापक प्रभाव डाला और इसका प्रभाव पुनर्जागरण पर भी पड़ा। अंतिम रूप से न्यूटन के भौतिकवाद ने इसकी जगह ले लिया।
    जीव विज्ञान उनके कुछ संकल्पनाओं की पुष्टि उन्नीसवीं सदी में हुई। उनके तर्कशास्त्र आज भी प्रासांगिक हैं। उनकी आध्यात्मिक रचनाओं ने मध्ययुग में इस्लामिक और यहूदी विचारधारा को प्रभावित किया और वे आज भी क्रिश्चियन, खासकर रोमन कैथोलिक चर्च को प्रभावित कर रही हैं। उनके दर्शन आज भी उच्च कक्षाओं में पढ़ाये जाते हैं।
    अरस्तु ने अनेक रचनाएं की थी, जिसमें कई नष्ट हो गई। अरस्तु का राजनीति पर प्रसिद्ध ग्रंथ पोलिटिक्स है।अरस्तु ने जन्तु इतिहास नामक पुस्तक लिखी।इस पुस्तक में लगभग 500 प्रकार के विविध जन्तुओं की रचना,स्वभाव,वर्गीकरण,जनन आदि का व्यापक वर्णन किया गया। अरस्तु को father of bioLogy का सम्मान प्राप्त है।

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  4. इम्मैनुएल कांत Immanuel Kant
    इमानुएल कांट (1724-1804) जर्मन वैज्ञानिक, नीतिशास्त्री एवं दार्शनिक थे। उसका वैज्ञानिक मत "कांट-लाप्लास परिकल्पना" (हाइपॉथेसिस) के नाम से विख्यात है। उक्त परिकल्पना के अनुसार संतप्त वाष्पराशि नेबुला से सौरमंडल उत्पन्न हुआ। कांट का नैतिक मत "नैतिक शुद्धता" (मॉरल प्योरिज्म) का सिद्धांत, "कर्तव्य के लिए कर्तव्य" का सिद्धांत अथवा "कठोरतावाद" (रिगॉरिज्म) कहा जाता है। उसका दार्शनिक मत "आलोचनात्मक दर्शन" (क्रिटिकल फ़िलॉसफ़ी) के नाम से प्रसिद्ध है। इमानुएल कांट अपने इस प्रचार से प्रसिद्ध हुये कि मनुष्य को ऐसे कर्म और कथन करने चाहियें जो अगर सभी करें तो वे मनुष्यता के लिये अच्छे हों।

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  5. रेने डेस्कर्टेस René Descartes

    रेने देकार्त जो कि दार्शनिक होने के साथ साथ एक सुप्रसिद्घ गणितज्ञ थे, वे दर्शन को विज्ञान में परिवर्तित करना चाहते थे। आधुनिक पाश्चात्य दर्शन का जनक के रुप में इन्हें जाना जाता है, साथ ही साथ इन्होंने ज्ञान के लिए बुद्धि को सर्वोत्तम राह बताया, क्योंकि इसमें ज्ञान सार्वभौमिक व अनिवार्य होता है,

    उनका जन्म 31 मार्च 1596 ई. को हेग में हुआ था। 21 वर्ष की आयु में शिक्षा समाप्त कर ये ओरेंज के राजकुमार मोरिस की सेना में भर्ती हो गए। यहाँ पर प्राप्त अवकाश को ये गणित के अध्ययन में व्यतीत किया करते हैं। इन्होंने कई युद्धों में भी भाग लिया। सेवॉय के ड्यूक के साथ हुए युद्ध में प्रदर्शित वीरता के कारण इनका लेफ्टिनेंट जनरल की उपाधि प्रदान की गई, परंतु इन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया और पेरिस में तीन वर्ष तक शांतिपूर्वक दर्शनशास्त्र की साधना करते रहे। प्रकृति के भेदों की गणित के नियमों से तुलना करने पर इन्होंने आशा प्रकट की कि दोनों के रहस्यों का ज्ञान एक ही प्रकार से किया जा सकता है। इस भाँति इन्होंने तत्वज्ञान में 'कार्तेज़ियनवाद' का आविष्कार किया।

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  6. फ्रेडरिक निएत्ज़्स्चे Friedrich Nietzsche

    फ्रेडरिक नीत्शे (Friedrich Nietzsche) (15, अक्टूबर, 1844 से 25, अगस्त 1900) जर्मनी का दार्शनिक था। मनोविश्लेषणवाद, अस्तित्ववाद एवं परिघटनामूलक चिंतन (Phenomenalism) के विकास में नीत्शे की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। व्यक्तिवादी तथा राज्यवादी दोनों प्रकार के विचारकों ने उससे प्रेरणा ली है। हालाँकि नाज़ी तथा फासिस्ट राजनीतिज्ञों ने उसकी रचनाओं का दुरुपयोग भी किया। जर्मन कला तथा साहित्य पर नीत्शे का गहरा प्रभाव है। भारत में भी इक़बाल आदि कवियों की रचनाएँ नीत्शेवाद से प्रभावित हैं।

    नीत्शे का जन्म लाइपज़िग के निकट रोएकन नामक ग्राम में एक प्रोटेस्टेट पादरी के परिवार में हुआ था। उसके माता-पिता परंपरा से धर्मोपदेश के कार्य में संलग्न परिवारों के वंशज थे। अपने पिता की मृत्यु के समय नीत्शे पाँच वर्ष का था, परंतु उसकी शिक्षा की व्यवस्था उसकी माता ने समुचित ढंग से की। स्कूली शिक्षा में ही वह ग्रीक साहित्य से प्रभावित हो चुका था। धर्मशास्त्र तथा भाषाविज्ञान के अध्ययन के लिए उसने बॉन विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया, जहाँ अपने प्राध्यापक रित्शल से घनिष्टता उसके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुई। रित्शल के लाइपज़िग विश्वविद्यालय जाने पर नीत्शे ने भी उसका साथ दिया। 24 वर्ष की ही अवस्था में नीत्शे बेस्ल विश्वविद्यालय में भाषा-विज्ञान के प्राध्यापक पद पर नियुक्त हुआ। नीत्शे को सैनिक जीवन के प्रति भी आकर्षण था। दो बार वह सैनिक बना परंतु दोनों बार उसे अपने पद से हटना पड़ा। पहली बार एक दुर्घटना में घायल होकर और दूसरी बार अस्वस्थ होकर। लाइपज़िग के विद्यार्थी जीवन में ही वह प्रसिद्ध संगीतज्ञ वेगेनर के घनिष्ठ संपर्क में आ चुका था और, साथ ही शोपेनहावर की पुस्तक "संकल्प एवं विचार के रूप में विश्व" से अपनी दर्शन संबंधी धारणाओं के लिए बल प्राप्त कर चुका था। नीत्शे और वेगेनर का संबंध, नीत्शे के व्यक्तित्व को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण सूत्र की भाँति माना जाता है। 1879 ई. में अस्वस्थता के कारण नीत्शे ने प्राध्यापक पद से त्यागपत्र दे दिया। तत्पश्चात लगभग दस वर्षों तक वह स्वास्थ्य की खोज में स्थान स्थान भटकता फिरा; परंतु इसी बीच में उसने उन महान पुस्तकों की रचना की जिनके लिए वह प्रसिद्ध है। 1889 में उसे पक्षाघात का दौरा हुआ और मानसिक रूप से वह सदा के लिए विक्षिप्त हो गया। नीत्शे की मृत्यु के समय तक उसकी रचनाएँ प्रसिद्धि पा चुकी थीं।

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  7. कन्फ्यूशियस Confucius
    कंफ्यूशियसी दर्शन की शुरुआत 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व चीन में हुई। जिस समय भारत में भगवान महावीर और बुद्ध धर्म के संबध में नए विचार रख रहें थे, चीन में भी एक महात्मा का जन्म हुआ, जिसका नाम कन्फ़्यूशियस था। उस समय झोऊ राजवंश का बसंत और शरद काल चल रहा था। समय के साथ झोऊ राजवंश की शक्ति शिथिल पड़ने के कारण चीन में बहुत से राज्य कायम हो गये, जो सदा आपस में लड़ते रहते थे, जिसे झगड़ते राज्यों का काल कहा जाने लगा। अतः चीन की प्रजा बहुत ही कष्ट झेल रही थी। ऐसे समय में चीन वासियों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने हेतु महात्मा कन्फ्यूशियस का आविर्भाव हुआ।

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  8. जॉन लोके John Locke
    जॉन लॉक (1632-1704) आंग्ल दार्शनिक एवं राजनैतिक विचारक थे।

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  9. कार्ल मार्क्स Karl Marx

    कार्ल हेनरिक मार्क्स ( 5 मई 1818 - 14 मार्च 1883) एक जर्मन दार्शनिक, अर्थशास्त्री, इतिहासकार, समाजशास्त्री, राजनीतिक सिद्धांतकार, पत्रकार और समाजवादी क्रांतिकारी थे। जर्मनी के ट्रायर में जन्मे मार्क्स ने विश्वविद्यालय में कानून और दर्शन का अध्ययन किया। उन्होंने 1843 में जेनी वॉन वेस्टफेलन से शादी की। अपने राजनीतिक प्रकाशनों के कारण, मार्क्स स्टेटलेस हो गए और दशकों तक लंदन में अपनी पत्नी और बच्चों के साथ निर्वासन में रहे, जहाँ उन्होंने जर्मन विचारक फ्रेडरिक एंगेल्स के साथ मिलकर अपने विचार विकसित किए और उनके लेखन को प्रकाशित किया, ब्रिटिश संग्रहालय के पढ़ने के कमरे में शोध। उनके सबसे प्रसिद्ध खिताब 1848 पैम्फलेट द कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो और तीन-खंड दास कपिटल (1867-1883) हैं। मार्क्स के राजनीतिक और दार्शनिक विचार का बाद के बौद्धिक, आर्थिक और राजनीतिक इतिहास पर काफी प्रभाव था। उनके नाम का इस्तेमाल विशेषण, संज्ञा और सामाजिक सिद्धांत के स्कूल के रूप में किया गया है।

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  10. थॉमस एक्विनास Thomas Aquinas

    सेण्ट थॉमस एक्विनास (Thomas Aquinas ; 1225 – 7 मार्च 1274) को मध्ययुग का सबसे महान राजनीतिक विचारक और दार्शनिक माना जाता है। वह एक महान विद्वतावादी (Scholastic) तथा समन्वयवादी था। प्रो॰ डनिंग ने उसको सभी विद्वतावादी दार्शनिकों में से सबसे महान विद्वतावादी माना है। सेण्ट एक्विनास ने न केवल अरस्तू और आगस्टाइन के बल्कि अन्य विधिवेत्ताओं, धर्मशास्त्रियों और टीकाकारों के भी परस्पर विरोधी विचारों में समन्वय स्थापित किया है। इसलिए एम॰ बी॰ फोस्टर ने उनको विश्व का सबसे महान क्रमबद्ध (systematic) विचारक कहा है। वास्तव में सेण्ट थॉमस एक्विनास ने मध्ययुग के समग्र राजनीतिक चिन्तन का प्रतिनिधित्व किया हैं फोस्टर के मतानुसार वह समूचे मध्यकालीन विचारों का प्रतिनिधित्व करते हैं जैसा कि दूसरा कोई अकेले नहीं कर सका।

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  11. सिग्मंड फ्रायड Sigmund Freud
    सिग्मंड फ्रायड ( 6 मई 1856 -- 23 सितम्बर 1939 ) आस्ट्रिया के तंत्रिकाविज्ञानी (neurologist) तथा मनोविश्लेषण के संस्थापक थे।

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  12. ज्यां-पाल सार्त्र Jean-Paul Sartre
    ज्यां-पाल सार्त्र
    नोबेल पुरस्कार साहित्य विजेता, 1964

    ज्यां-पाल सार्त्र अस्तित्ववाद के पहले विचारकों में से माने जाते हैं। वह बीसवीं सदी में फ्रान्स के सर्वप्रधान दार्शनिक कहे जा सकते हैं। कई बार उन्हें अस्तित्ववाद के जन्मदाता के रूप में भी देखा जाता है।
    अपनी पुस्तक "ल नौसी" में सार्त्र एक ऐसे अध्यापक की कथा सुनाते हैं जिसे ये इलहाम होता है कि उसका पर्यावरण जिससे उसे इतना लगाव है वो बस कि़ंचित् निर्जीव और तत्वहीन वस्तुओं से निर्मित है। किन्तु उन निर्जीव वस्तुओं से ही उसकी तमाम भावनाएँ जन्म ले चुकी थीं।
    सार्त्र का निधन अप्रैल 15, 1980 को पेरिस में हआ।

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  13. डायोजनीज Diogenes

    डायोजनीज जिसे डायोजनीज़ द साइनिक भी कहा जाता है। निंदक दर्शन के संस्थापकों में। वह सिनोप में पैदा हुआ था, जो आधुनिक दिन तुर्की के काला सागर तट पर एक इयानियन कॉलोनी था, 412 या 404 ईसा पूर्व में और 323 ईसा पूर्व में कोरिंथ में मृत्यु हो गई थी।

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  14. जार्ज विल्हेम फ्रेड्रिक हेगेल Georg Wilhelm Friedrich Hegel
    जार्ज विलहेम फ्रेड्रिक हेगेल (1770-1831) सुप्रसिद्ध दार्शनिक थे। वे कई वर्ष तक बर्लिन विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रहे और उनका देहावसान भी उसी नगर में हुआ।
    हेगेल की प्रमुख उपलब्धि उनके आदर्शवाद की विशिष्ट अभिव्यक्ति का विकास थी, जिसे कभी-कभी पूर्ण आदर्शवाद कहा जाता है, [32] जिसमें उदाहरण के लिए, मन और प्रकृति और विषय और वस्तु के द्वंद्वों को दूर किया जाता है। उनकी आत्मा का दर्शन वैचारिक रूप से मनोविज्ञान, राज्य, इतिहास, कला, धर्म और दर्शन को एकीकृत करता है। विशेष रूप से 20 वीं सदी के फ्रांस में मास्टर-दास की बोली का उनका खाता अत्यधिक प्रभावशाली रहा है। [33] विशेष महत्व की उनकी आत्मा की अवधारणा है (तार्किक रूप से ऐतिहासिक अभिव्यक्ति और "उदात्तीकरण" के रूप में "गेस्ट", जिसे कभी-कभी "अनुवाद" भी कहा जाता है) (प्रतीत होता है या विरोधाभासी कारकों के विरोध के उन्मूलन या कमी के बिना Aufhebung, एकीकरण): उदाहरणों में शामिल हैं प्रकृति और स्वतंत्रता के बीच स्पष्ट विरोध और अनुकरण और पारगमन के बीच। हेगेल को 20 वीं सदी में थीसिस, एंटीथिसिस, सिंथेसिस ट्रायड के प्रवर्तक के रूप में देखा गया है, [34] लेकिन यह एक स्पष्ट वाक्यांश के रूप में जोहान गोटलिब फिच के साथ उत्पन्न हुआ। [35]
    हेगेल ने कई विचारकों और लेखकों को प्रभावित किया है जिनके अपने पद व्यापक रूप से भिन्न हैं। [36] कार्ल बार्थ ने हेगेल को एक "प्रोटेस्टेंट एक्विनास" [37] के रूप में वर्णित किया, जबकि मौरिस मर्लेउ-पोंटी ने लिखा है कि "पिछली सदी के सभी महान दार्शनिक विचार- मार्क्स और नीत्शे, दर्शनशास्त्र, जर्मन अस्तित्ववाद और मनोविश्लेषण के दर्शन-उनकी शुरुआत थी। हेगेल। "[38]
    जॉर्ज विल्हेम फ्रेडरिक हेगेल (/ ɪɡəhe /l /; [25] [26] जर्मन: [ˈeˈk ˈɡvɪlhɛlm ˈfʁiːtʁɪç ˈheːɡl̩]; [2]] [2]] [3]] [26] 2 27 अगस्त, 1703ed-1ed13; एक जर्मन दार्शनिक और जर्मन आदर्शवाद का एक महत्वपूर्ण व्यक्ति। उन्होंने अपने दिन में व्यापक पहचान हासिल की और-जबकि मुख्य रूप से दर्शन की महाद्वीपीय परंपरा के भीतर प्रभावशाली- विश्लेषणात्मक परंपरा में भी प्रभावशाली रूप से प्रभावशाली हो गया है। [31] हालांकि हेगेल एक विभाजनकारी व्यक्ति बने हुए हैं, पश्चिमी दर्शन के भीतर उनके विहित कथानक को सार्वभौमिक मान्यता प्राप्त है

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  15. फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की Fyodor Dostoevsky
    फ़्योदर दस्ताएवस्की ( रूसी: Фёдор Миха́йлович Достое́вский 30 अक्तूबर [11 नवम्बर] 1821, मसक्वा [मास्को], रूसी साम्राज्य — 28 जनवरी [9 फ़रवरी] 1881, सांक्त पितेरबूर्ग [सेण्ट पीटर्सबर्ग], रूसी साम्राज्य) — रूसी भाषा के एक महान् साहित्यकार,विचारक, दार्शनिक और निबन्धकार थे, जिन्होंने अनेक उपन्यास और कहानियाँ लिखीं पर जिन्हें अपने जीवनकाल में लेखक के रूप में कोई महत्व नहीं दिया गया। मृत्यु होने के बाद दस्ताएवस्की को रूसी यथार्थवाद का प्रवर्तक माना गया और रूस के महान लेखकों में उनका नाम शामिल किया गया। मॉस्को में जन्मे फ़्योदर दस्ताएवस्की को रूसी विचारक और सामाजिक कार्यकर्ता मिख़अईल पित्रअशेव्स्की के राज्यविरोधी गुप्त दल का सदस्य होने के कारण 20 अन्य लोगों के साथ गिरफ़्तार कर लिया गया और उन्हें मृत्युदण्ड की सज़ा दी गई। लेकिन इस सज़ा पर अमल होने से पहले ही अंतिम समय में उनकी सज़ा को चार वर्ष के सश्रम कारावास में बदल दिया गया। दस्ताएवस्की ने गिरफ़्तार होने से पहले ही लिखना शुरू कर दिया था। साइबेरिया में कारावास की सज़ा बिताने के बाद उन्होंने फिर से लिखना शुरू कर दिया। 'अपराध और दंड ', 'बौड़म ', ’नर-पिशाच’, ’करमअजोफ़ बन्धु’, ’ग़रीब लोग’ और ’जुआरी’ जैसे विख्यात उपन्यासों के रचनाकार दस्ताएवस्की को मनोवैज्ञानिक विषयों का महान लेखक माना जाता है। रूसी और पश्चिम के कई लेखकों को इन्होंने प्रभावित किया - जिनमें एंटन चेखव [अन्तोन चेख़फ़] भी शामिल हैं। 2002 में नार्वे पुस्तक क्लब ने विश्व साहित्य की सौ प्रमुख किताबों में दस्ताएवस्की की पाँच किताबों को शामिल किया है।

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  16. जीन जक्क़ुएस रूसो Jean-Jacques Rousseau
    जीन-जक्क़ुएस रूसो (1712 - 78) की गणना पश्चिम के युगप्रवर्तक विचारकों में है।

    किंतु अंतर्विरोध तथा विरोधाभासों से पूर्ण होने के कारण उसके दर्शन का स्वरूप विवादास्पद रहा है। अपने युग की उपज होते हुए भी उसने तत्कालीन मान्यताओं का विरोध किया, बद्धिवाद के युग में उसने बुद्धि की निंदा की (विश्वकोश के प्रणेताओं (Encyclopaedists) से उसका विरोध इस बात पर था) और सहज मानवीय भावनाओं को अत्यधिक महत्व दिया। सामाजिक प्रसंविदा (सोशल कंट्रैक्ट) की शब्दावली का अवलंबन करते हुए भी उसने इस सिद्धांत की अंतरात्मा में सर्वथा नवीन अर्थ का सन्निवेश किया। सामाजिक बंधन तथा राजनीतिक दासता की कटु आलोचना करते हुए भी उसने राज्य को नैतिकता के लिए अनिवार्य बताया। आर्थिक असमानता और व्यक्तिगत संपत्ति को अवांछनीय मानते हुए भी रूसो साम्यवादी नहीं था। घोर व्यक्तिवाद से प्रारंभ होकर उसे दर्शन की परिणति समष्टिवाद में होती है। स्वतंत्रता और जनतंत्र का पुजारी होते हुए भी वह राबेसपीयर जैसे निरंकुशतावादियों का आदर्श बन जाता है।

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  17. थेल्स Thales of Miletus
    Thales का जन्म ग्रीक के छोटे से राज्य माईलेट्स नगर में हुआ।इन्हें प्रथम यूनानी दार्शनिक माना जाता है। पाश्चात्य जगत में दर्शनशास्त्र के संस्थापक के रुप में भी इन्हें जाना जाता है। इनको यूनान के सप्त ऋषियों या सात बुद्धिमानों में से एक माना जाता है।
    585-584 बी. सी. में सूर्यग्रहण की भविष्यवाणी का भी श्रेय इन्हें दिया जाता है।
    ये माईलेशियन मत के भी संस्थापक है। इनके दर्शन की तीन प्रमुख मान्यताएं है
    1. समस्त वस्तुओं में देवों का प्रभाव/निवास है। ये विश्वात्मा(जल) में भी विश्वास रखते हैं।
    2. पृथ्वी एक समतल चक्र के समान है जो जल पर तैरती है।
    3. जल ही समस्त भौतिक वस्तुओं का कारण और समस्त प्राणी जीवन का आधार है।
    थेल्स विश्व का परम तत्व जल को ही मानते थे क्योंकि संसार में सभी वस्तुएं या तो ठोस या द्रव या गैस रुप में मिलती हैं और जल में वे सब गुण शामिल है जिसके कारण वह ठोस, तरल और गैस(भाप) का रूप धारण कर सकता है।
    थेल्स ने प्रकृति को एक सजीव, गतिशील, क्रियात्मक एवं परिवर्तनात्मक सिद्धांत के रूप में देखा क्योंकि वे मानते थे कि परम तत्व सर्वत्र व्याप्त है। सर्वप्रथम थेल्स के द्वारा विश्व की तात्विक व्याख्या प्रकृतिवादी होने के कारण इसे वैज्ञानिक कहा जाएगा। उन्होंने न तो विश्व की व्याख्या में पारलौकिक शक्तियों का हाथ माना और न हीं मानवत्वारोपण किया।
    मिस्र देश से यूरोप में ज्यॉमिति की परंपरा लाना और समुद्री जहाज की दूरी को समुद्र तट से नापने की विधि को भी वे जानते थे। चुंबक में भी आत्मा का वास उन्होंने स्वीकार किया है। थेलीज सभी वस्तु चर और अचर में प्राण शक्ति के रहने को स्वीकार करते थे।
    थेल्स यूनान का महान दार्शनिक थे। इनको ज्यामिति का जनक कहा जाता है। इन्होंने गणितीय भूगोल में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।
    उस समय के सात यूनानी भौतिक विज्ञानिको में थेल्स का प्रथम स्थान था और "आयोनिक स्कुल ऑफ फिलासफी " से सम्बंधित था .इन्होने मिस्र और सहलग्न देशो की यात्रा की ।.मिस्र के ज्यामिति से परिचित थे और इसी के आधार पर उसने दो स्थान के बिच दूरी को नापे थे । इन्होने नील नदी की उत्पति ,कटाव और डेल्टा प्रदेश का भी विवरण दिया है ।इन्होने पृथ्वी के आकृति को गुम्बदकार बताया और उसकी स्थिति ब्रह्माण्ड के बिच में बताई थी ।
    इन्होने पृथवी को पाँच जलवायु में बटा था ।उस समय पृथ्वी के बहुत छोटे से भू -भाग का ही ज्ञान यूनानियो को था ।

    थेल्स ने बताया कि जीवन का उद्गम जल में हुआ है

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  18. अबू अली सीना Avicenna
    अबू अली सीना (फारसी: بو علی‌ سینا ; 980 – 1037, अंग्रेजी: Avicenna or Ibn-Sina) फारस के विद्वान, दार्शनिक एवं चिकित्सक थे। उन्होने विविध विषयों पर लगभग 450 पुस्तकें लिखी जिसमें से 240 अब भी प्राप्य हैं। इसमें से 15 पुस्तकें चिकित्सा विज्ञान से संबंधित हैं। उनकी विश्वविख्यात किताब का नाम क़ानून है। यह किताब मध्यपूर्व जगत में मेडिकल सांइस की सबसे ज़्यादा प्रभावी और पढ़ी जाने वाली किताब है। इस प्रकार अपने समय के प्रसिद्ध चिकित्सक थे। अबू अली सीना न केवल नास्तिक चिकित्सकों और दार्शनिकों में सबसे आगे हैं बल्कि पश्चिम में शताब्दियों तक वे चिकित्सकों के सरदार के रूप मे प्रसिद्ध रहे।[कृपया उद्धरण जोड़ें]इब्न सिन्ना (एविसेना) पर दुनिया की प्राचीनता, उसके (दुनिया के) बाद की अस्वीकृति और "भीतर की महान विचारधारा" के अलावा अन्य नास्तिक सिद्धांतों के बारे में अपने बयानों के कारण काफिर और नास्तिक होने का आरोप लगाया गया था।अन्य विद्वानों जिन्होंने यह कहा कि इब्न सिन्ना एक नास्तिक था (शेख अल-थुवैनी के पहले), अल-ग़ज़ाली, इब्न तैमियाह, इब्न अल-क़ायम और अल-ढाबी है।

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  19. गाटफ्रीड विलहेल्म लाइबनिज Gottfried Wilhelm Leibniz
    गाटफ्रीड विलहेल्म लाइबनिज (Gottfried Wilhelm von Leibniz / 1 जुलाई 1646 - 14 नवम्बर 1716) जर्मनी के दार्शनिक, वैज्ञानिक, गणितज्ञ, राजनयिक, भौतिकविद्, इतिहासकार, राजनेता, विधिकार थे। उनका पूरा नाम 'गोतफ्रीत विल्हेल्म फोन लाइब्नित्स' ([ˈɡɔtfʁiːt ˈvɪlhɛlm fɔn ˈlaɪbnɪts]) था। गणित के इतिहास तथा दर्शन के इतिहास में उनका प्रमुख स्थान है।

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  20. जॉन स्टूवर्ट मिल John Stuart Mill
    जॉन स्टूवर्ट मिल (John Stuart Mill) (1806 - 1873) प्रसिद्ध आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, एवं दार्शनिक चिन्तक तथा प्रसिद्ध इतिहासवेत्ता और अर्थशास्त्री जेम्स मिल का पुत्र।

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  21. पटहहोतेप Ptahhotep

    पटहहोतेप 25 वीं शताब्दी ईसा पूर्व के अंत और 24 वीं शताब्दी के प्रारंभ में मिस्र के ईसा पूर्व पाँचवें राजवंश के दौरान एक प्राचीन मिस्र का जादूगर था।

    पंहोटेप फिफ्थ राजवंश में फिरौन जिदकेरे इसेसी के शासनकाल के दौरान शहर के प्रशासक और पहले मंत्री थे। मिस्र के "ज्ञान साहित्य" के शुरुआती अंश, द मैक्सिम्स ऑफ़ पंहोटेप को लिखने का श्रेय उन्हें उपयुक्त व्यवहार में युवा पुरुषों को निर्देश देने के लिए दिया जाता है।

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  22. लयूसिप्पुस Leucippus

    लयूसिप्पुस कुछ प्राचीन स्रोतों में बताया गया है कि एक दार्शनिक थे जो परमाणुवाद के सिद्धांत को विकसित करने के लिए सबसे पहले यूनानी थे - यह विचार कि सब कुछ पूरी तरह से पूरी तरह से बना है। विभिन्न अपूर्ण, अविभाज्य तत्व जिन्हें परमाणु कहा जाता है। लेउसीपस अक्सर अपने शिष्य डेमोक्रिटस के गुरु के रूप में प्रकट होता है, एक दार्शनिक भी परमाणु सिद्धांत के प्रवर्तक के रूप में जाना जाता है।

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  23. एपिक्टेतुस Epictetus

    एपिक्टेटस एक ग्रीक स्टोइक दार्शनिक था। उनका जन्म हायरपोलिस, फ़्रीगिया (वर्तमान पॉमुकले, तुर्की) में एक दास के रूप में हुआ था और वे अपने निर्वासन तक रोम में रहे, जब वे अपने पूरे जीवन के लिए पश्चिमोत्तर ग्रीस के निकोपोलिस गए थे। उनकी शिक्षाओं को उनके शिष्य एरियन ने अपने प्रवचनों और एनकिरिडियन में लिखा और प्रकाशित किया।

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  24. क्रिसिपस Chrysippus

    सोली का क्रिसिपस एक ग्रीक स्टॉइस दार्शनिक था। वह सोली, सिलिसिया के मूल निवासी थे, लेकिन एथेंस में एक युवा के रूप में चले गए, जहां वे स्टोइक स्कूल में क्लीनथेस के शिष्य बन गए। जब क्लींथेस की मृत्यु हो गई, लगभग 230 ईसा पूर्व, क्रिसिपस स्कूल का तीसरा प्रमुख बन गया। एक विपुल लेखक, क्रिसिपस ने स्कूल के संस्थापक, ज़ेनो ऑफ सिटियम के मौलिक सिद्धांतों का विस्तार किया, जिसने उन्हें स्टोइकवाद के द्वितीय संस्थापक का खिताब दिया।

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  25. दलाई लामा (तेनजिन ग्यात्सो) Dalai Lama
    चौदहवें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो (6 जुलाई, 1935 - वर्तमान) तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष और आध्यात्मिक गुरू हैं। उनका जन्म 6 जुलाई 1935 को उत्तर-पूर्वी तिब्बत के ताकस्तेर क्षेत्र में रहने वाले ये ओमान परिवार में हुआ था। दो वर्ष की अवस्था में बालक ल्हामो धोण्डुप की पहचान 13 वें दलाई लामा थुबटेन ग्यात्सो के अवतार के रूप में की गई। दलाई लामा एक मंगोलियाई पदवी है जिसका मतलब होता है ज्ञान का महासागर और दलाई लामा के वंशज करूणा, अवलोकेतेश्वर के बुद्ध के गुणों के साक्षात रूप माने जाते हैं। बोधिसत्व ऐसे ज्ञानी लोग होते हैं जिन्होंने अपने निर्वाण को टाल दिया हो और मानवता की रक्षा के लिए पुनर्जन्म लेने का निर्णय लिया हो। उन्हें सम्मान से परमपावन भी कहा जाता है।

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  26. मॉर्गन स्कॉट पेक M. Scott Peck

    मॉर्गन स्कॉट पेक (1936–2005) एक अमेरिकी मनोचिकित्सक और सबसे अधिक बिकने वाले लेखक थे, जिन्होंने 1978 में प्रकाशित पुस्तक द रोड लेस ट्रैवल्ड लिखी थी।

    पेक का जन्म 22 मई, 1936 को, न्यूयॉर्क शहर में, एक वकील और न्यायाधीश, ज़ेबेथ (नी सविले) और डेविड वार्नर पेक के बेटे के रूप में हुआ था। उनके माता-पिता क्वेकर थे। पेक को एक प्रोटेस्टेंट उठाया गया था (उनकी पैतृक दादी एक यहूदी परिवार से थी, लेकिन पेक के पिता ने खुद को के रूप में पहचाना और यहूदी के रूप में नहीं)|

    उनके माता-पिता ने उन्हें न्यू हैम्पशायर के एक्सेटर में प्रतिष्ठित बोर्डिंग स्कूल फिलिप्स एक्सेटर एकेडमी में भेजा, जब वह 6 साल के थे। अपनी पुस्तक, द रोड लेस ट्रैवल्ड में, वह एक्सेटर में अपने संक्षिप्त प्रवास की कहानी को स्वीकार करता है, और स्वीकार करता है कि यह सबसे दुखद समय था। अंत में, 15 वर्ष की आयु में, अपने तीसरे वर्ष के वसंत की छुट्टी के दौरान, वह घर आया और स्कूल लौटने से इनकार कर दिया, जिसके बाद उसके माता-पिता ने उसके लिए मनोचिकित्सक से मदद मांगी और वह अवसाद के बाद का निदान कर रहा था एक महीने के लिए मनोरोग अस्पताल में रहने की सिफारिश की जाती है (जब तक कि उसने स्कूल लौटने का विकल्प नहीं चुना)। फिर उन्होंने 1952 के अंत में फ्रेंड्स सेमिनरी (एक निजी के स्कूल) में स्थानांतरित कर दिया, और 1954 में स्नातक किया, जिसके बाद उन्होंने 1958 में हार्वर्ड से बीए और 1963 में केस वेस्टर्न रिज़र्व यूनिवर्सिटी से एमडी की डिग्री प्राप्त की।

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  27. पॉल द एपोस्टल Paul the Apostle

    पॉल को आमतौर पर एपोस्टोलिक युग के सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ों में से एक माना जाता है और 30 के दशक के मध्य से लेकर 50 के दशक के मध्य तक उन्होंने एशिया माइनर और यूरोप में कई ईसाई समुदायों की स्थापना की।

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  28. अल ग़ज़ाली Al-Ghazali
    अबू हामिद मुहम्मद इब्न मुहम्मद अल-गज़ाली (/ɡæˈzɑːli/; फ़ारसी: ابو حامد محمد ابن محمد غزالی; c. 1058–1111), पश्चिम में अल-ग़ज़ाली या अलगाज़ेल के नाम से मशहूर, एक मुस्लिम तत्वग्नानी, सूफ़ी जो पर्शिया से थे।
    इस्लामी दुनिया में हज़रत मुहम्मद के बाद अगर कोई मुस्लिम समूह को आकर्शित किया या असर रुसूक़ किया तो वो अल-ग़ज़ाली' हैं। इस्लामी समूह में अल-ग़ज़ाली' को मुजद्दिद या पुनर्व्यवस्थीकरण करने वाला माना जाता है। इस्लामी समूह में माना जाता है कि हर शताब्द में एक मुजद्दिद जन्म लेते है, मुस्लिम समूह को धर्ममार्ग पर प्रेरेपित और उत्तेजित करते हैं। इन के कार्य और रचनाएं इतनी प्रबावशाली हैं कि लोग इन को "हुज्जतुल इस्लाम" (इस्लाम का सबूत) कहा करते हैं।

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  29. एडम स्मिथ Adam Smith
    एडम स्मिथ (5जून 1723 से 17 जुलाई 1790) एक ब्रिटिश नीतिवेत्ता, दार्शनिक और राजनैतिक अर्थशास्त्री थे। उन्हें अर्थशास्त्र का पितामह भी कहा जाता है।आधुनिक अर्थशास्त्र के निर्माताओं में एडम स्मिथ (जून 5, 1723—जुलाई 17, 1790) का नाम सबसे पहले आता है. उनकी पुस्तक ‘राष्ट्रों की संपदा(The Wealth of Nations) ने अठारहवीं शताब्दी के इतिहासकारों एवं अर्थशास्त्रियों को बेहद प्रभावित किया है. कार्ल मार्क्स से लेकर डेविड रिकार्डो तक अनेक ख्यातिलब्ध अर्थशास्त्री, समाजविज्ञानी और राजनेता एडम स्मिथ से प्रेरणा लेते रहे हैं. बीसवीं शताब्दी के अर्थशास्त्रियों में, जिन्होंने एडम स्मिथ के विचारों से प्रेरणा ली है, उनमें मार्क्स, एंगेल्स, माल्थस, मिल, केंस(Keynes) तथा फ्राइडमेन(Friedman) के नाम उल्लेखनीय हैं. स्वयं एडम स्मिथ पर अरस्तु, जा॓न ला॓क, हा॓ब्स, मेंडविले, फ्रांसिस हचसन, ह्यूम आदि विद्वानों का प्रभाव था. स्मिथ ने अर्थशास्त्र, राजनीति दर्शन तथा नीतिशास्त्र के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया. किंतु उसको विशेष मान्यता अर्थशास्त्र के क्षेत्र में ही मिली. आधुनिक बाजारवाद को भी एडम स्मिथ के विचारों को मिली मान्यता के रूप में देखा जा सकता है.
    एडम स्मिथ के जन्म की तिथि सुनिश्चित नहीं है. कुछ विद्वान उसका जन्म पांच जून 1723 को तथा कुछ उसी वर्ष की 16 जून को मानते हैं. जो हो उसका जन्म ब्रिटेन के एक गांव किर्काल्दी(Kirkaldy, Fife, United Kingdom) में हुआ था. एडम के पिता कस्टम विभाग में इंचार्ज रह चुके थे. किंतु उनका निधन स्मिथ के जन्म से लगभग छह महीने पहले ही हो चुका था. एडम अपने माता–पिता की संभवतः अकेली संतान था. वह अभी केवल चार ही वर्ष का था कि आघात का सामना करना पड़ा. जिप्सियों के एक संगठन द्वारा एडम का अपहरण कर लिया गया. उस समय उसके चाचा ने उसकी मां की सहायता की. फलस्वरूप एडम को सुरक्षित प्राप्त कर लिया गया. पिता की मृत्यु के पश्चात स्मिथ को उसकी मां ने ग्लासगो विश्वविद्यालय में पढ़ने भेज दिया. उस समय स्मिथ की अवस्था केवल चौदह वर्ष थी. प्रखर बुद्धि होने के कारण उसने स्कूल स्तर की पढ़ाई अच्छे अंकों के साथ पूरी की, जिससे उसको छात्रवृत्ति मिलने लगी. जिससे आगे के अध्ययन के लिए आ॓क्सफोर्ड विश्वविद्यालय जाने का रास्ता खुल गया. वहां उसने प्राचीन यूरोपीय भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया. उस समय तक यह तय नहीं हो पाया था कि भाषा विज्ञान का वह विद्यार्थी आगे चलकर अर्थशास्त्र के क्षेत्र में न केवल नाम कमाएगा, बल्कि अपनी मौलिक स्थापनाओं के दम पर वैश्विक अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में युगपरिवर्तनकारी योगदान भी देगा.
    सन 1738 में स्मिथ ने सुप्रसिद्ध विद्वान–दार्शनिक फ्रांसिस हचीसन के नेतृत्व में नैतिक दर्शनशास्त्र में स्नातक की परीक्षा पास की. वह फ्रांसिस की मेधा से अत्यंत प्रभावित था तथा उसको एवं उसके अध्यापन में बिताए गए दिनों को, अविस्मरणीय मानता था. अत्यंत मेधावी होने के कारण स्मिथ की प्रतिभा का॓लेज स्तर से ही पहचानी जाने लगी थी. इसलिए अध्ययन पूरा करने के पश्चात युवा स्मिथ जब वापस अपने पैत्रिक नगर ब्रिटेन पहुंचा, तब तक वह अनेक महत्त्वपूर्ण लेक्चर दे चुका था, जिससे उसकी ख्याति फैलने लगी थी. वहीं रहते हुए 1740 में उसने डेविड ह्यूम की चर्चित कृति A Treatise of Human Nature का अध्ययन किया, जिससे वह अत्यंत प्रभावित हुआ. डेविड ह्यूम उसके आदर्श व्यक्तियों में से था. दोनों में गहरी दोस्ती थी. स्वयं ह्यूम रूसो की प्रतिभा से बेहद प्रभावित थे. दोनों की दोस्ती के पीछे एक घटना का उल्लेख मिलता है. जिसके अनुसार ह्यूम ने एक बार रूसो की निजी डायरी उठाकर देखी तो उसमें धर्म, समाज, राजनीति, अर्थशास्त्र आदि को लेकर गंभीर टिप्पणियां की गई थीं. उस घटना के बाद दोनों में गहरी मित्रता हो गई. ह्यूम एडम स्मिथ से लगभग दस वर्ष बड़ा था. डेविड् हयूम के अतिरिक्त एडम स्मिथ के प्रमुख दोस्तों में जा॓न होम, ह्यूज ब्लेयर, लार्ड हैलिस, तथा प्रंसिपल राबर्टसन आदि के नाम नाम उल्लेखनीय हैं.अपनी मेहनत एवं प्रतिभा का पहला प्रसाद उसको जल्दी मिल गया. सन 1751 में स्मिथ को ग्लासगा॓ विश्वविद्यालय में तर्कशास्त्र के प्रवक्ता के पद पर नौकरी मिल गई. उससे अगले ही वर्ष उसको नैतिक दर्शनशास्त्र का विभागाध्यक्ष बना दिया गया. स्मिथ का लेखन और अध्यापन का कार्य सतत रूप से चल रहा था. सन 1759 में उसने अपनी पुस्तक ‘नैतिक अनुभूतियों का सिद्धांत’ (Theory of Moral Sentiments) पूरी की. यह पुस्तक अपने प्रकाशन के साथ ही चर्चा का विषय बन गई. उसके अंग्रेजी के अलावा जर्मनी और फ्रांसिसी संस्करण हाथों–हाथ बिकने लगे. पुस्तक व्यक्ति और समाज के अंतःसंबंधों एवं नैतिक आचरण के बारे में थी. उस समय तक स्मिथ का रुझान राजनीति दर्शन एवं नीतिशास्त्र तक सीमित था. धीरे–धीरे स्मिथ विश्वविद्यालयों के नीरस और एकरस वातावरण से ऊबने लगा. उसे लगने लगा कि जो वह करना चाहता है वह का॓लेज के वातावरण में रहकर कर पाना संभव नहीं है.
    इस बीच उसका रुझान अर्थशास्त्र के प्रति बढ़ा था. विशेषकर राजनीतिक दर्शन पर अध्यापन के दौरान दिए गए लेक्चरर्स में आर्थिक पहलुओं पर भी विचार किया गया था. उसके विचारों को उसी के एक विद्यार्थी ने संकलित किया, जिन्हें आगे चलकर एडविन केनन ने संपादित किया. उन लेखों में ही ‘वैल्थ आ॓फ नेशनस्’ के बीजतत्व सुरक्षित थे. करीब बारह वर्ष अध्यापन के क्षेत्र में बिताने के पश्चात स्मिथ ने का॓लेज की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और जीविकोपार्जन के लिए ट्यूशन पढ़ाने लगा. इसी दौर में उसने फ्रांस तथा यूरोपीय देशों की यात्राएं कीं तथा समकालीन विद्वानों डेविड ह्यूम, वाल्तेयर, रूसो, फ्रांसिस क्वेसने (François Quesnay), एनी राबर्ट जेकुइस टुरगोट(Anne-Robert-Jacques Turgot) आदि से मिला. इस बीच उसने कई शोध निबंध भी लिखे, जिनके कारण उसकी प्रष्तिठा बढ़ी. कुछ वर्ष पश्चात वह वह किर्काल्दी वापस लौट आया.
    अपने पैत्रिक गांव में रहते हुए स्मिथ ने अपनी सर्वाधिक चर्चित पुस्तक The Wealth of Nations पूरी की, जो राजनीतिविज्ञान और अर्थशास्त्र पर अनूठी पुस्तक है. 1776 में पुस्तक के प्रकाशन के साथ ही एडम स्मिथ की गणना अपने समय के मूर्धन्य विद्वानों में होने लगी. इस पुस्तक पर दर्शनशास्त्र का प्रभाव है. जो लोग स्मिथ के जीवन से परिचित नहीं हैं, उन्हें यह जानकर और भी आश्चर्य होगा कि स्मिथ ने इस पुस्तक की रचना एक दर्शनशास्त्र का प्राध्यापक होने के नाते अपने अध्यापन कार्य के संबंध में की थी. उन दिनों विश्वविद्यालयों में इतिहास और दर्शनशास्त्र की पुस्तकें ही अधिक पढ़ाई जाती थीं, उनमें एक विषय विधिवैज्ञानिक अध्ययन भी था. विधिशास्त्र के अध्ययन का सीधा सा तात्पर्य है, स्वाभाविक रूप से न्यायप्रणालियों का विस्तृत अध्ययन. प्रकारांतर में सरकार और फिर राजनीति अर्थव्यवस्था का चिंतन. इस तरह यह साफ है कि अपनी पुस्तक ‘राष्ट्रों की संपदा’ में स्मिथ ने आर्थिक सिद्धांतों की दार्शनिक विवेचनाएं की हैं. विषय की नवीनता एवं प्रस्तुतीकरण का मौलिक अंदाज उस पुस्तक की मुख्य विशेषताएं हैं.
    स्मिथ पढ़ाकू किस्म का इंसान था. उसके पास एक समृद्ध पुस्तकालय था, जिसमें सैंकड़ों दुर्लभ ग्रंथ मौजूद थे. रहने के लिए उसको शांत एवं एकांत वातावरण पसंद था, जहां कोई उसके जीवन में बाधा न डाले. स्मिथ आजीवन कुंवारा ही रहा. जीवन में सुख का अभाव एवं अशांति की मौजूदगी से कार्य आहत न हों, इसलिए उसका कहना था कि समाज का गठन मनुष्यों की उपयोगिता के आधार पर होना चाहिए, जैसे कि व्यापारी समूह गठित किए जाते हैं; ना कि आपसी लगाव या किसी और भावनात्मक आधार पर.
    अर्थशास्त्र के क्षेत्र में एडम स्मिथ की ख्याति उसके सुप्रसिद्ध सिद्धांत ‘लेजे फेयर (laissez-faire) के कारण है, जो आगे चलकर उदार आर्थिक नीतियों का प्रवर्तक सिद्धांत बना. लेजे फेयर का अभिप्राय था, ‘कार्य करने की स्वतंत्रता’ अर्थात आर्थिक गतिविधियों के क्षेत्र में सरकार का न्यूनतम हस्तक्षेप. आधुनिक औद्योगिक पूंजीवाद के समर्थक और उत्पादन व्यवस्था में क्रांति ला देने वाले इस नारे के वास्तविक उदगम के बारे में सही–सही जानकारी का दावा तो नहीं किया जाता. किंतु इस संबंध में एक बहुप्रचलित कथा है, जिसके अनुसार इस उक्ति का जन्म 1680 में, तत्कालीन प्रभावशाली फ्रांसिसी वित्त मंत्री जीन–बेपटिस्ट कोलबार्ट की अपने ही देश के व्यापरियों के साथ बैठक के दौरान हुआ था. व्यापारियों के दल का नेतृत्व एम. ली. जेंड्री कर रहे थे. व्यापारियों का दल कोलबार्ट के पास अपनी समस्याएं लेकर पहुंचा था. उन दिनों व्यापारीगण एक ओर तो उत्पादन–व्यवस्था में निरंतर बढ़ती स्पर्धा का सामना कर रहे थे, दूसरी ओर सरकारी कानून उन्हें बाध्यकारी लगते थे. उनकी बात सुनने के बाद कोलबार्ट ने किंचित नाराजगी दर्शाते हुए कहा—
    ‘इसमें सरकार व्यापारियों की भला क्या मदद कर सकती है?’ इसपर ली. जेंड्री ने सादगी–भरे स्वर में तत्काल उत्तर दिया—‘लीजेज–नाउज फेयर [Laissez-nous faire (Leave us be, Let us do)].’ उनका आशय था, ‘आप हमें हमारे हमारे हाल पर छोड़ दें, हमें सिर्फ अपना काम करने दें.’ इस सिद्धांत की लोकप्रियता बढ़ने के साथ–साथ, एडम स्मिथ को एक अर्थशास्त्री के रूप में पहचान मिलती चली गई. उस समय एडम स्मिथ ने नहीं जानता था कि वह ऐसे अर्थशास्त्रीय सिद्धांत का निरूपण कर रहा है, जो एक दिन वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए क्रांतिकारी सिद्ध होगा.
    ‘राष्ट्रों की संपदा’ नामक पुस्तक के प्रकाशन के दो वर्ष बाद ही स्मिथ को कस्टम विभाग में आयुक्त की नौकरी मिल गई. उसी साल उसे धक्का लगा जब उसके घनिष्ट मित्र और अपने समय के जानेमाने दार्शनिक डेविड ह्यूम की मृत्यु का समाचार उसको मिला. कस्टम आयुक्त का पद स्मिथ के लिए चुनौती–भरा सिद्ध हुआ. उस पद पर रहते हुए उसे तस्करी की समस्या से निपटना था; जिसे उसने अपने ग्रंथ राष्ट्रों की संपदा में ‘अप्राकृतिक विधान के चेहरे के पीछे सर्वमान्य कर्म’ (Legitimate activity in the face of ‘unnatural’ legislation) के रूप में स्थापित किया था. 1783 में एडिनवर्ग रा॓यल सोसाइटी की स्थापना हुई तो स्मिथ को उसका संस्थापक सदस्य मनोनीत किया गया. अर्थशास्त्र एवं राजनीति के क्षेत्र में स्मिथ की विशेष सेवाओं के लिए उसको ग्ला॓स्ग विश्वविद्यालय का मानद रेक्टर मनोनीत किया गया. वह आजीवन अविवाहित रहा. रात–दिन अध्ययन–अध्यापन में व्यस्त रहने के कारण उसका स्वास्थ्य गड़बड़ाने लगा था. अंततः 19 जुलाई 1790 को, मात्र सढ़सठ वर्ष की अवस्था में एडिनबर्ग में उसकी मृत्यु हो गई.
    वैचारिकी
    एडम स्मिथ को आधुनिक अर्थव्यवस्था के निर्माताओं में से माना जाता है. उसके विचारों से प्रेरणा लेकर जहां कार्ल मार्क्स, एंगेल्स, मिल, रिकार्डो जैसे समाजवादी चिंतकों ने अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाया, वहीं अत्याधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था के बीजतत्व भी स्मिथ के विचारों में निहित हैं. स्मिथ का आर्थिक सामाजिक चिंतन उसकी दो पुस्तकों में निहित है. पहली पुस्तक का शीर्षक है— नैतिक अनुभूतियों के सिद्धांत’ जिसमें उसने मानवीय व्यवहार की समीक्षा करने का प्रयास किया है. पुस्तक पर स्मिथ के अध्यापक फ्रांसिस हचसन का प्रभाव है. पुस्तक में नैतिक दर्शन को चार वर्गों—नैतिकता, सदगुण, व्यक्तिगत अधिकार की भावना एवं स्वाधीनता में बांटते हुए उनकी विवेचना की गई है. इस पुस्तक में स्मिथ ने मनुष्य के संपूर्ण नैतिक आचरण को निम्नलिखित दो हिस्सों में वर्गीकृत किया है—
    1. नैतिकता की प्रकृति (Nature of morality)
    2. नैतिकता का लक्ष्य (Motive of morality)
    नैतिकता की प्रकृति में स्मिथ ने संपत्ति, कामनाओं आदि को सम्मिलित किया है. जबकि दूसरे वर्ग में स्मिथ ने मानवीय संवेदनाओं, स्वार्थ, लालसा आदि की समीक्षा की है. स्मिथ की दूसरी महत्त्वपूर्ण पुस्तक है—‘राष्ट्रों की संपदा की प्रकृति एवं उसके कारणों की विवेचना’ यह अद्वितीय ग्रंथ पांच खंडों में है. पुस्तक में राजनीतिविज्ञान, अर्थशास्त्र, मानव व्यवहार आदि विविध विषयों पर विचार किया गया है, किंतु उसमें मुख्य रूप से स्मिथ के आर्थिक विचारों का विश्लेषण है. स्मिथ ने मुक्त अर्थव्यवस्था का समर्थन करते हुए दर्शाया है कि ऐसे दौर में अपने हितों की रक्षा कैसे की जा सकती है, किस तरह तकनीक का अधिकतम लाभ कमाया जा सकता है, किस प्रकार एक कल्याणकारी राज्य को धर्मिकता की कसौटी पर कसा जा सकता है और कैसे व्यावसायिक स्पर्धा से समाज को विकास के रास्ते पर ले जाया जा सकाता है. स्मिथ की विचारधारा इसी का विश्लेषण बड़े वस्तुनिष्ठ ढंग से प्रस्तुत करती है. इस पुस्तक के कारण स्मिथ पर व्यक्तिवादी होने के आरोप भी लगते रहे हैं. लेकिन जो विद्वान स्मिथ को निरा व्यक्तिवादी मानते हैं, उन्हें यह तथ्य चौंका सकता है कि उसका अधिकांश कार्य मानवीय नैतिकता को प्रोत्साहित करने वाला तथा जनकल्याण पर केंद्रित है. अपनी दूसरी पुस्तक ‘नैतिक अनुभूतियों का सिद्धांत’ में स्मिथ लिखता है—
    ‘पूर्णतः स्वार्थी व्यक्ति की संकल्पना भला कैसे की जा सकती है. प्रकृति के निश्चित ही कुछ ऐसे सिद्धांत हैं, जो उसको दूसरों के हितों से जोड़कर उनकी खुशियों को उसके लिए अनिवार्य बना देते हैं, जिससे उसे उन्हें सुखी–संपन्न देखने के अतिरिक्त और कुछ भी प्राप्त नहीं होता.’
    स्मिथ के अनुसार स्वार्थी और अनिश्चितता का शिकार व्यक्ति सोच सकता है कि प्रकृति के सचमुच कुछ ऐसे नियम हैं जो दूसरे के भाग्य में भी उसके लिए लाभकारी सिद्ध हो सकते हैं तथा उसके लिए खुशी का कारण बन सकते हैं. जबकि यह उसका सरासर भ्रम ही है. उसको सिवाय ऐसा सोचने के कुछ और हाथ नहीं लग पाता. मानव व्यवहार की एकांगिकता और सीमाओं का उल्लेख करते हुए एक स्थान पर स्मिथ ने लिखा है कि—
    ‘हमें इस बात का प्रामाणिक अनुभव नहीं है कि दूसरा व्यक्ति क्या सोचता है. ना ही हमें इस बात का कोई ज्ञान है कि वह वास्तव में किन बातों से प्रभावित होता है. सिवाय इसके कि हम स्वयं को उन परिस्थितियों में होने की कल्पना कर कुछ अनुमान लगा सकें. छज्जे पर खडे़ अपने भाई को देखकर हम निश्चिंत भी रह सकते हैं, बिना इस बात की परवाह किए कि उसपर क्या बीत रही है. हमारी अनुभूतियां उसकी स्थिति के बारे में प्रसुप्त बनी रहती हैं. वे हमारे ‘हम’ से परे न तो जाती हैं, न ही जा सकती हैं; अर्थात उसकी वास्तविक स्थिति के बारे में हम केवल अनुमान ही लगा पाते हैं. न उसकी चेतना में ही वह शक्ति है जो हमें उसकी परेशानी और मनःस्थिति का वास्तविक बोध करा सके, उस समय तक जब तक कि हम स्वयं को उसकी परिस्थितियों में रखकर नहीं सोचते. मगर हमारा अपना सोच केवल हमारा सोच और संकल्पना है, न कि उसका. कल्पना के माध्यम से हम उसकी स्थिति का केवल अनुमान लगाने में कामयाब हो पाते हैं.’
    उपर्युक्त उद्धरण द्वारा स्मिथ ने यथार्थ स्थिति बयान की है. हमारा रोजमर्रा का बहुत–सा व्यवहार केवल अनुमान और कल्पना के सहारे ही संपन्न होता है.
    भावुकता एवं नैतिकता के अनपेक्षित दबावों से बचते हुए स्मिथ ने व्यक्तिगत सुख–लाभ का पक्ष भी बिना किसी झिझक के लिया है. उसके अनुसार खुद से प्यार करना, अपनी सुख–सुविधाओं का खयाल रखना तथा उनके लिए आवश्यक प्रयास करना किसी भी दृष्टि से अकल्याणकारी अथवा अनैतिक नहीं है. उसका कहना था कि जीवन बहुत कठिन हो जाएगा यदि हमारी कोमल संवेदनाएं और प्यार, जो हमारी मूल भावना है, हर समय हमारे व्यवहार को नियंत्रित करने लगे, और उसमें दूसरों के कल्याण की कोई कामना ही न हो; या वह अपने अहं की रक्षा को ही सर्वस्व मानने लगे, और दूसरों की उपेक्षा ही उसका धर्म बन जाए. सहानुभूति तथा व्यक्तिगत लाभ एक दूसरे के विरोधी न होकर परस्पर पूरक होते हैं. दूसरों की मदद के सतत अवसर मनुष्य को मिलते ही रहते हैं.
    स्मिथ ‘राष्ट्रों की संपदा’ नामक ग्रंथ में परोपकार और कल्याण की व्याख्या बड़े ही वस्तुनिष्ट ढंग से करता है. स्मिथ के अनुसार अभ्यास की कमी के कारण हमारा मानस एकाएक ऐसी मान्यताओं को स्वीकारने को तैयार नहीं होता, हालांकि हमारा आचरण निरंतर उसी ओर इंगित करता रहता है. हमारे अंतर्मन में मौजूद द्वंद्व हमें निरंतर मथते रहते हैं. एक स्थान पर वह लिखता है कि केवल धर्म अथवा परोपकार के बल पर आवश्यकताओं की पूर्ति असंभव है. उसके लिए व्यक्तिगत हितों की उपस्थिति भी अनिवार्य है. वह लिखता है—
    ‘हमारा भोजन किसी कसाई, शराब खींचनेवाले या तंदूरवाले की दयालुता की सौगात नहीं है. यह उनके निहित लाभ के लिए, स्वयं के लिए किए गए कार्य का प्रतिफल है.’
    स्मिथ के अनुसार यदि कोई आदमी धनार्जन के लिए परिश्रम करता है तो यह उसका अपने सुख के लिए किया गया कार्य है. लेकिन उसका प्रभाव स्वयं उस तक ही सीमित नहीं रहता. धनार्जन की प्रक्रिया में वह किसी ने किसी प्रकार दूसरों से जुड़ता है. उनका सहयोग लेता है तथा अपने उत्पाद के माध्यम से अपने साथ–साथ अपने समाज की आवश्यकताएं पूरी करता है. स्पर्धा के बीच कुछ कमाने के लिए उसे दूसरों से अलग, कुछ न कुछ उत्पादन करना ही पड़ता है. उत्पादन तथा उत्पादन के लिए प्रयुक्त तकनीक की विशिष्टता का अनुपात ही उसकी सफलता तय करता है. ‘राष्ट्रों की संपदा’ नामक ग्रंथ में स्मिथ लिखता है कि—
    ‘प्रत्येक उद्यमी निरंतर इस प्रयास में रहता है कि वह अपनी निवेश राशि पर अधिक से अधिक लाभ अर्जित कर सके. यह कार्य वह अपने लिए, केवल अपने भले की कामना के साथ करता है, न कि समाज के कल्याण की खातिर. यह भी सच है कि अपने भले के लिए ही वह अपने व्यवसाय को अधिक से अधिक आगे ले जाने, उत्पादन और रोजगार के अवसरों को ज्यादा से ज्यादा विस्तार देने का प्रयास करता है. किंतु इस प्रक्रिया में देर–सवेर समाज का भी हित–साधन होता है.’
    पांच खंडों में लिखी गई पुस्तक ‘राष्ट्रों की संपदा’ में स्मिथ किसी राष्ट्र की समृद्धि के कारणों और उनकी प्रकृति को स्पष्ट करने का प्रयास भी किया है. किंतु उसका आग्रह अर्थव्यवस्था पर कम से कम नियंत्रण के प्रति रहा है. स्मिथ के अनुसार समृद्धि का पहला कारण श्रम का अनुकूल विभाजन है. यहां अनुकूलता का आशय किसी भी व्यक्ति की कार्यकुशलता का सदुपयोग करते हुए उसे अधिकतम उत्पादक बनाने से है. इस तथ्य को स्पष्ट करने के लिए स्मिथ का एक उदाहरण बहुत ही चर्चित रहा है—
    ‘कल्पना करें कि दस कारीगर मिलकर एक दिन में अड़तालीस हजार पिन बना सकते हैं, बशर्ते उनकी उत्पादन प्रक्रिया को अलग–अलग हिस्सों में बांटकर उनमें से हर एक को उत्पादन प्रक्रिया का कोई खास कार्य सौंप दिया जाए. किसी दिन उनमें से एक भी कारीगर यदि अनुपस्थित रहता है तो; उनमें से एक कारीगर दिन–भर में एक पिन बनाने में भी शायद ही कामयाब हो सके. इसलिए कि किसी कारीगर विशेष की कार्यकुशलता उत्पादन प्रक्रिया के किसी एक चरण को पूरा कर पाने की कुशलता है.’
    स्मिथ मुक्त व्यापार के पक्ष में था. उसका कहना था कि सरकारों को वे सभी कानून उठा लेने चाहिए जो उत्पादकता के विकास के आड़े आकर उत्पादकों को हताश करने का कार्य करते हैं. उसने परंपरा से चले आ रहे व्यापार–संबंधी कानूनों का विरोध करते हुए कहा कि इस तरह के कानून उत्पादकता पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं. उसने आयात के नाम पर लगाए जाने वाले करों एवं उसका समर्थन करने वाले कानूनों का भी विरोध किया है. अर्थशास्त्र के क्षेत्र में उसका सिद्धांत ‘लैसे फेयर’ के नाम से जाना जाता है. जिसका अभिप्रायः है—उन्हें स्वेच्छापूर्वक कार्य करने दो (let them do). दूसरे शब्दों में स्मिथ उत्पादन की प्रक्रिया की निर्बाधता के लिए उसकी नियंत्रणमुक्ति चाहता था. वह उत्पादन–क्षेत्र के विस्तार के स्थान पर उत्पादन के विशिष्टीकरण के पक्ष में था, ताकि मशीनी कौशल एवं मानवीय श्रम का अधिक से अधिक लाभ उठाया जाए. उत्पादन सस्ता हो और वह अधिकतम तक पहुंच सके. उसका कहना था कि—
    ‘किसी वस्तु को यदि कोई देश हमारे देश में आई उत्पादन लागत से सस्ती देने को तैयार है तो यह हमारा कर्तव्य है कि उसको वहीं से खरीदें. तथा अपने देश के श्रम एवं संसाधनों का नियोजन इस प्रकार करें कि वह अधिकाधिक कारगर हो सकें तथा हम उसका उपयुक्त लाभ उठा सकें.’
    स्मिथ का कहना था कि समाज का गठन विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों, अनेक सौदागरों के बीच से होना चाहिए. बगैर किसी पारस्पिरिक लाभ अथवा कामना के होना चाहिए. उत्पादन की इच्छा ही उद्यमिता की मूल प्रेरणाशक्ति है. लेकिन उत्पादन के साथ लाभ की संभावना न हो, यदि कानून मदद करने के बजाय उसके रास्ते में अवरोधक बनकर खड़ा हो जाए, तो उसकी इच्छा मर भी सकती है. उस स्थिति में उस व्यक्ति और राष्ट्र दोनों का ही नुकसान है. स्मिथ के अनुसार—
    ‘उपभोग का प्रत्यक्ष संबंध उत्पादन से है. कोई भी व्यक्ति इसलिए उत्पादन करता करता है, क्योंकि वह उत्पादन की इच्छा रखता है. इच्छा पूरी होने पर वह उत्पादन की प्रक्रिया से किनारा कर सकता है अथवा कुछ समय के लिए उत्पादन की प्रक्रिया को स्थगित भी कर सकता है. जिस समय कोई व्यक्ति अपनी आवश्यकता से अधिक उत्पादन कर लेता है, उस समय अतिरिक्त उत्पादन को लेकर उसकी यही कामना होती है कि उसके द्वारा वह किसी अन्य व्यक्ति से, किसी और वस्तु की फेरबदल कर सके. यदि कोई व्यक्ति कामना तो किसी वस्तु की करता है तथा बनाता कुछ और है, तब उत्पादन को लेकर उसकी यही इच्छा हो सकती है कि वह उसका उन वस्तुओं के साथ विनिमय कर सके, जिनकी वह कामना करता है और उन्हें उससे भी अच्छी प्रकार से प्राप्त कर सके, जैसा वह उन्हें स्वयं बना सकता था.’
    स्मिथ ने कार्य–विभाजन को पूर्णतः प्राकृतिक मानते हुआ उसका मुक्त स्वर में समर्थन किया है. यह उसकी वैज्ञानिक दृष्टि एवं दूरदर्शिता को दर्शाता है. उसके विचारों के आधार पर अमेरिका और यूरोपीय देशों ने मुक्त अर्थव्यवस्था को अपनाया. शताब्दियों बाद भी उसके विचारों की प्रासंगिकता यथावत बनी हुई है. औद्योगिक स्पर्धा में बने रहने के लिए चीन और रूस जैसे कट्टर साम्यवादी देश भी मुक्त अर्थव्यवस्था के समर्थक बने हुए हैं. उत्पादन के भिन्न–भिन्न पहलुओं का विश्लेषण करते हुए स्मिथ ने कहा कि उद्योगों की सफलता में मजदूर और कारीगर का योगदान भी कम नहीं होता. वे अपना श्रम–कौशल निवेश करके उत्पादन में सहायक बनते हैं.
    स्मिथ का यह भी लिखा है ऐसे स्थान पर जहां उत्पादन की प्रवृत्ति को समझना कठिन हो, वहां पर मजदूरी की दरें सामान्य से अधिक हो सकती हैं. इसलिए कि लोग, जब तक कि उन्हें अतिरिक्त रूप से कोई लाभ न हो, सीखना पसंद ही नहीं करेंगे. अतिरिक्त मजदूरी अथवा सामान्य से अधिक अर्जन की संभावना उन्हें नई प्रविधि अपनाने के लिए प्रेरित करती हैं. इस प्रकार स्मिथ ने सहज मानववृत्ति के विशिष्ट लक्षणों की ओर संकेत किया है. इसी प्रकार ऐसे कार्य जहां व्यक्ति को स्वास्थ्य की दृष्टि से प्रतिकूल स्थितियों में कार्य करना पड़े अथवा असुरक्षित स्थानों पर चल रहे कारखानों में मजदूरी की दरें सामान्य से अधिक रखनी पड़ेंगी. नहीं तो लोग सुरक्षित और पसंदीदा ठिकानों की ओर मजदूरी के लिए भागते रहेंगे और वैसे कारखानों में प्रशिक्षित कर्मियों का अभाव बना रहेगा.
    स्मिथ ने तथ्यों का प्रत्येक स्थान पर बहुत ही संतुलित तथा तर्कसंगत ढंग से उपयोग किया है. अपनी पुस्तक ‘राष्ट्रों की संपदा’ में वह स्पष्ट करता है कि कार्य की प्रवृत्ति के अंतर को वेतन के अंतर से संतुलित किया जा सकता है. उसके लेखन की एक विशेषता यह भी है कि वह बात को समझाने के लिए लंबे–लंबे वर्णन के बजाए तथ्यों एवं तर्कों का सहारा लेता है. उत्पादन–व्यवस्था के अंतरराष्ट्रीयकरण को लेकर भी स्मिथ के विचार आधुनिक अर्थचिंतन की कसौटी पर खरे उतरते हैं. इस संबंध में उसका मत था कि—
    ‘यदि कोई विदेशी मुल्क हमें किसी उपभोक्ता सामग्री को अपेक्षाकृत सस्ता उपलब्ध कराने को तैयार है तो उसे वहीं से मंगवाना उचित होगा. क्योंकि उसी के माध्यम से हमारे देश की कुछ उत्पादक शक्ति ऐसे कार्यों को संपन्न करने के काम आएगी जो कतिपय अधिक महत्त्वपूर्ण एवं लाभकारी हैं. इस व्यवस्था से अंततोगत्वा हमें लाभ ही होगा.’
    विश्लेषण के दौरान स्मिथ की स्थापनाएं केवल पिनों की उत्पादन तकनीक के वर्णन अथवा एक कसाई तथा रिक्शाचालक के वेतन के अंतर को दर्शाने मात्र तक सीमित नहीं रहतीं. बल्कि उसके बहाने से वह राष्ट्रों के जटिल राजनीतिक मुद्दों को सुलझाने का भी काम करता है. अर्थ–संबंधों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय रणनीति बनाने का चलन आजकल आम हो चला है. संपन्न औद्योगिक देश यह कार्य बड़ी कुशलता के साथ करते हैं. मगर उसके बीजतत्व स्मिथ के चिंतन में अठारहवीं शताब्दी से ही मौजूद हैं.
    ‘राष्ट्रों की संपदा’ शृंखला की चैथी पुस्तक में सन 1776 में स्मिथ ने ब्रिटिश सरकार से साफ–साफ कह दिया था कि उसकी अमेरिकन कालोनियों पर किया जाने व्यय, उनके अपने मूल्य से अधिक है. इसका कारण स्पष्ट करते हुए उसने कहा था कि ब्रिटिश राजशाही बहुत खर्चीली व्यवस्था है. उसने आंकड़ों के आधार पर यह सिद्ध किया था कि राजनीतिक नियंत्रण के स्थान पर एक साफ–सुथरी अर्थनीति, नियंत्रण के लिए अधिक कारगर व्यवस्था हो सकती है. वह आर्थिक मसलों से सरकार को दूर रखने का पक्षधर था. इस मामले में स्मिथ कतिपय आधुनिक अर्थनीतिकारों से कहीं आगे था. लेकिन यदि सबकुछ अर्थिक नीतियों के माध्यम से पूंजीपतियों अथवा उनके सहयोग से बनाई गई व्यवस्था द्वारा ही संपन्न होना है तब सरकार का क्या दायित्व है? अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए वह क्या कर सकती है?
    इस संबंध में स्मिथ का एकदम स्पष्ट मत था कि सरकार पेटेंट कानून, कांट्रेक्ट, लाइसेंस एवं का॓पीराइट जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से अपना नियंत्रण बनाए रख सकती है. यही नहीं सरकार सार्वजनिक महत्त्व के कार्यों जैसे कि पुल, सड़क, विश्रामालय आदि बनाने का कार्य अपने नियंत्रण में रखकर जहां राष्ट्र की समृद्धि का लाभ जन–जन पहुंचा सकती है. प्राथमिकता के क्षेत्रों में, ऐसे क्षेत्रों में जहां उद्यमियों की काम करने की रुचि कम हो, विकास की गति बनाए रखकर सरकार अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सकती है. पूंजीगत व्यवस्था के समर्थन में स्मिथ के विचार कई स्थान पर व्यावहारिक हैं तो कई बार वे अतिरेक की सीमाओं को पार करते हुए नजर आते हैं. वह सरकार को एक स्वयंभू सत्ता के बजाय एक पूरक व्यवस्था में बदल देने का समर्थक था. जिसका कार्य उत्पादकता में यथासंभव मदद करना है. उसका यह भी विचार था कि नागरिकों को सुविधाओं के उपयोग के अनुपात में निर्धारित शुल्क का भुगतान भी करना चाहिए. लेकिन इसका अभिप्राय यह नहीं है कि स्मिथ सरकारों को अपने नागरिकों के कल्याण की जिम्मेदारी से पूर्णतः मुक्त कर देना चाहता था. उसका मानना था कि—
    ‘कोई भी समाज उस समय तक सुखी एवं समृद्ध नहीं माना जा सकता, जब तक कि उसके सदस्यों का अधिकांश, गरीब, दुखी एवं अवसादग्रस्त हो.’
    व्यापार और उत्पादन तकनीक के मामले में स्मिथ मुक्त स्पर्धा का समर्थक था. उसका मानना था कि अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में स्पर्धा का आगमन ‘प्राकृतिक नियम’ के अनुरूप होगा. स्मिथ का प्राकृतिक नियम निश्चित रूप से जंगल के उस कानून का ही विस्तार है, जिसमें जीवन की जिजीविषा संघर्ष को अनिवार्य बना देती है. स्मिथ के समय में सहकारिता की अवधारणा का जन्म नहीं हुआ था, समाजवाद का विचार भी लोकचेतना के विकास के गर्भ में ही था. उसने एक ओर तो उत्पादन को स्पर्धा से जोड़कर उसको अधिक से अधिक लाभकारी बनाने पर जोर दिया. दूसरी ओर उत्पादन और नैतिकता को परस्पर संबद्ध कर उत्पादन–व्यवस्था के चेहरे को मानवीय बनाए रखने का रास्ता दिखाया. हालांकि अधिकतम मुनाफे को ही अपना अभीष्ठ मानने वाला पूंजीपति बिना किसी स्वार्थ के नैतिकता का पालन क्यों करे, उसकी ऐसी बाध्यता क्योंकर हो? इस ओर उसने कोई संकेत नहीं किया है. तो भी स्मिथ के विचार अपने समय में सर्वाधिक मौलिक और प्रभावशाली रहे हैं.
    स्मिथ ने आग्रहपूर्वक कहा था कि—
    ‘किसी भी सभ्य समाज में मनुष्य को दूसरों के समर्थन एवं सहयोग की आवश्यकता प्रतिक्षण पड़ती है. जबकि चंद मित्र बनाने के लिए मनुष्य को एक जीवन भी अपर्याप्त रह जाता है. प्राणियों में वयस्कता की ओर बढ़ता हुआ कोई जीव आमतौर पर अकेला और स्वतंत्र रहने का अभ्यस्त हो चुका होता है. दूसरों की मदद करना उसके स्वभाव का हिस्सा नहीं होता. किंतु मनुष्य के साथ ऐसा नहीं है. उसको अपने स्वार्थ के लिए हर समय अपने भाइयों एवं सगे–संबंधियों के कल्याण की चिंता लगी रहती है. जाहिर है मनुष्य अपने लिए भी यही अपेक्षा रखता है. क्योंकि उसके लिए केवर्ल शुभकामनाओं से काम चलाना असंभव ही है. वह अपने संबंधों को और भी प्रगाढ़ बनाने का कार्य करेगा, यदि वह उनकी सुख–लालसाओं में अपने लिए स्थान बना सके. वह यह भी जताने का प्रयास करेगा कि यह उनके अपने भी हित में है कि वे उन सभी कार्यों को अच्छी तरह अंजाम दें, जिनकी वह उनसे अपेक्षा रखता है. मनुष्य दूसरों के प्रति जो भी कर्तव्य निष्पादित करता है, वह एक तरह की सौदेबाजी ही है– यानी तुम मुझको वह दो जिसको मैं चाहता हूं, बदले में तुम्हें वह सब मिलेगा जिसकी तुम कामना करते हो. किसी को कुछ देने का यही सिद्धांत है, यही एक रास्ता है, जिससे हमारे सामाजिक संबंध विस्तार पाते हैं और जिनके सहारे यह संसार चलता है. हमारा भोजन किसी कसाई, शराब खींचनेवाले या तंदूरवाले की दयालुता की सौगात नहीं है. यह उनके निहित लाभ के लिए, स्वयं के लिए किए गए कार्य का प्रतिफल है.’
    इस प्रकार हम देखते हैं कि एडम स्मिथ के अर्थनीति संबंधी विचार न केवल व्यावहारिक, मौलिक और दूरदर्शितापूर्ण हैं; बल्कि आज भी अपनी प्रासंकगिता को पूर्ववत बनाए हुए हैं. शायद यह कहना ज्यादा उपयुक्त होगा कि वे पहले की अपेक्षा आज कहीं अधिक प्रासंगिक हैं. उसकी विचारधारा में हमें कहीं भी विचारों के भटकाव अथवा असंमजस के भाव नहीं दिखते. स्मिथ को भी मान्यताओं पर पूरा विश्वास था, यही कारण है कि वह अपने तर्क के समर्थन में अनेक तथ्य जुटा सका. यही कारण है कि आगे आने वाले अर्थशास्त्रियों को जितना प्रभावित स्मिथ ने किया; उस दौर का कोई अन्य अर्थशास्त्री वैसा नहीं कर पाया.
    हालांकि अपने विचारों के लिए एडम स्मिथ को लोगों की आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा. कुछ विद्वानों का विचार है कि उसके विचार एंडरर्स चांडिनिअस(Anders Chydenius) की पुस्तक ‘दि नेशनल गेन (The National Gain, 1765) तथा डेविड ह्यूम आदि से प्रभावित हैं. कुछ विद्वानों ने उसपर अराजक पूंजीवाद को बढ़ावा देने के आरोप भी लगाए हैं. मगर किसी भी विद्वान के विचारों का आकलन उसकी समग्रता में करना ही न्यायसंगत होता है. स्मिथ के विचारों का आकलन करने वाले विद्वान अकसर औद्योगिक उत्पादन संबंधी विचारों तक ही सिमटकर रह जाते हैं, वे भूल जाते हैं कि स्मिथ की उत्पादन संबंधी विचारों में सरकार और नागरिकों के कर्तव्य भी सम्मिलित हैं. जो भी हो, उसकी वैचारिक प्रखरता का प्रशंसा उसके तीव्र विरोधियों ने भी की है. दुनिया के अनेक विद्वान, शोधार्थी आज भी उसके आर्थिक सिद्धांतों का विश्लेषण करने में लगे हैं. एक विद्वान के विचारों की प्रासंगिकता यदि शताब्दियों बाद भी बनी रहे तो यह निश्चय ही उसकी महानता का प्रतीक है. जबकि स्मिथ ने तो विद्वानों की पीढ़ियों को न केवल प्रभावित किया, बल्कि अर्थशास्त्रियों की कई पीढ़ियां तैयार भी की हैं.

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  30. जॉन केल्विन मैक्सवेल John C. Maxwell

    जॉन केल्विन मैक्सवेल (जन्म 20 फरवरी, 1947) एक अमेरिकी लेखक, वक्ता और पादरी हैं, जिन्होंने मुख्य रूप से नेतृत्व पर ध्यान केंद्रित करते हुए कई किताबें लिखी हैं। टाइटल में लीडरशिप के 21 अकाट्य कानून और एक लीडर के 21 अपरिहार्य गुण शामिल हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स बेस्ट सेलर लिस्ट में कुछ के साथ उनकी पुस्तकों की लाखों प्रतियां बिक चुकी हैं।

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  31. रिचर्ड जॉन कोच John C. Maxwell

    रिचर्ड जॉन कोच (जन्म 28 जुलाई 1950 को लंदन में) एक ब्रिटिश प्रबंधन सलाहकार, उद्यम पूंजी निवेशक और प्रबंधन, विपणन और जीवन शैली पर पुस्तकों के लेखक हैं।

    कोच ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से एम.ए. और व्हार्टन स्कूल से एम.बी.ए. प्रारंभ में कोच ने बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप के साथ एक सलाहकार के रूप में काम किया। इसके बाद वह बैन एंड कंपनी में भागीदार बने। 1983 में बैन छोड़ने के बाद उन्होंने एल.ई.के. की सह-स्थापना की। इयान इवांस और जेम्स लॉरेंस के साथ परामर्श।

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  32. अर्नेस्ट शर्टलेफ़ होम्स Ernest Holmes

    अर्नेस्ट शर्टलेफ़ होम्स (21 जनवरी, 1887 - 7 अप्रैल, 1960) एक अमेरिकी न्यू थॉट लेखक, शिक्षक और नेता थे। वह एक आध्यात्मिक आंदोलन के संस्थापक थे जिसे धार्मिक विज्ञान के रूप में जाना जाता था, न्यू थॉट आंदोलन का एक बड़ा भाग, जिसका आध्यात्मिक दर्शन "दि साइंस ऑफ़ माइंड" के रूप में जाना जाता है। वह 1927 से लगातार प्रकाशन में द साइंस ऑफ़ माइंड और कई अन्य आध्यात्मिक पुस्तकों के लेखक और साइंस ऑफ़ माइंड पत्रिका के संस्थापक थे। उनकी किताबें प्रिंट में रहती हैं, और उन्होंने "माइंड ऑफ़ साइंस" के रूप में पढ़ाए जाने वाले सिद्धांतों को प्रेरित किया है। आध्यात्मिक छात्रों और शिक्षकों की कई पीढ़ियों को प्रभावित किया। होम्स ने इससे पहले एक और न्यू थॉट टीचिंग, डिवाइन साइंस का अध्ययन किया था और वह एक दिव्य विज्ञान मंत्री था। न्यू थॉट्स से परे उनका प्रभाव स्व-सहायता आंदोलन में देखा जा सकता है।

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  33. Ibn Taymiyyah

    टाकी एड-दीन एबाद इब्न अब्द अल-हलीम इब्न अब्द-अल-सलाम अल-नुमैरी अल-अराअन्नी के लिए संक्षेप में, एक मुस्लिम विद्वान मुहादिथ, धर्मशास्त्री, न्यायाधीश, न्यायविद्या, जो कुछ तर्क देते थे, एक दार्शनिक थे, और जिन्हें कुछ लोगों द्वारा स्वीकार किया गया है। इस्लामिक कैलेंडर की 7 वीं शताब्दी का मुजद्दिद। उन्हें इल्खनीद शासक ग़ज़न खान के साथ अपनी कूटनीतिक भागीदारी और मारज अल-सफ़र की लड़ाई में अपनी विजयी उपलब्धि के लिए जाना जाता है जिसने लेवांत के मंगोल आक्रमण को समाप्त कर दिया। हनबली स्कूल के एक सदस्य, इब्न तैमियाह के आइकॉक्लास्टिक विचारों पर अपने समय के व्यापक रूप से स्वीकृत सुन्नी सिद्धांतों जैसे कि संतों की वंदना और उनके मकबरे-मंदिरों की यात्रा ने उन्हें कई विद्वानों और शासकों के साथ अलौकिक बना दिया, जिनके आदेश के तहत वह थे। कई बार कैद हुई।

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  34. जानोस फ़ार्कस J Farkas

    जानोस फ़ार्कस (27 मार्च 1942 को बुडापेस्ट में - 29 सितंबर 1989 को बुडापेस्ट एक हंगेरियन फुटबॉलर था।

    अपने क्लब कैरियर के दौरान उन्होंने वास एससी के लिए खेला। उन्होंने 1961 से 1969 तक हंगरी राष्ट्रीय फुटबॉल टीम के लिए 33 कैप अर्जित किए और 20 गोल किए, 1962 फीफा विश्व कप, 1964 यूरोपीय राष्ट्र कप और 1966 फीफा विश्व कप में भाग लिया। उन्होंने 1964 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में फुटबॉल में स्वर्ण पदक भी जीता। उन्हें विशेष रूप से ब्राजील के खिलाफ 1966 फीफा विश्व कप में अपने शानदार लक्ष्य के लिए याद किया जाता है, जिसमें उन्होंने लगातार चैंपियन के खिलाफ 3–1 से जीत दर्ज की। उन्होंने 30 साल की उम्र में अपना करियर जल्दी खत्म कर लिया और गैस्ट्रोनोमर बन गए। 47 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के बाद एक युवा फुटबॉल टूर्नामेंट उनके नाम पर रखा गया था।

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  35. Zeno of Citium

    ज़ीनो ऑफ़ सिटियम फियोनियन मूल का एक हेलेन दार्शनिक था [3] सिटियम ,साइप्रस से। ज़ेनो दर्शनशास्त्र के स्टोइक स्कूल के संस्थापक थे, जो उन्होंने लगभग 300 ईसा पूर्व एथेंस में पढ़ाया था। Cynics के नैतिक विचारों के आधार पर, स्टोकिज्म ने प्रकृति के अनुसार सदाचार का जीवन जीने से प्राप्त मन की अच्छाई और शांति पर बहुत जोर दिया। यह बहुत लोकप्रिय साबित हुआ, और रोमन काल के माध्यम से हेलेनिस्टिक काल से दर्शन के प्रमुख स्कूलों में से एक के रूप में फला-फूला।

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  36. रॉबर्ट बॉयस ब्रैंडोम Robert Brandom

    रॉबर्ट बॉयस ब्रैंडोम (जन्म 13 मार्च 1950) एक अमेरिकी दार्शनिक हैं जो पिट्सबर्ग विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं। वह मुख्य रूप से भाषा के दर्शन, मन के दर्शन और दार्शनिक तर्क में काम करता है, और उसका अकादमिक आउटपुट इन विषयों में व्यवस्थित और ऐतिहासिक दोनों तरह के हितों को दर्शाता है। उनके कार्यों ने "सामाजिक रूप से मानक-शासित उपयोग (" अर्थ के रूप में उपयोग ", विट्गेन्स्टाइनियन नारे का हवाला देते हुए) के संदर्भ में भाषाई वस्तुओं के अर्थ को समझाने के लिए" पूरी तरह से व्यवस्थित और तकनीकी रूप से कठोर प्रयास "प्रस्तुत किया है, जिससे एक गैर भी मिल रहा है विचार की जानबूझकर और कार्रवाई की तर्कसंगतता के रूप में अच्छी तरह से प्रतिनिधित्व करते हैं।

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  37. जुरगेन हबेर्मस Jurgen Habermas

    जुरगेन हेबरमास एक जर्मन दार्शनिक और समाजशास्त्री है जो आलोचनात्मक सिद्धांत की परंपरा में है; व्यावहारिकता। उनका कार्य संप्रेषणीयता और सार्वजनिक क्षेत्र को संबोधित करता है।

    फ्रैंकफर्ट स्कूल से संबद्ध, हेबरमास का काम महामारी विज्ञान और सामाजिक सिद्धांत की नींव, उन्नत पूंजीवाद और लोकतंत्र के विश्लेषण, एक महत्वपूर्ण सामाजिक-विकासवादी संदर्भ में कानून का शासन, प्राकृतिक कानून परंपरा के दायरे में यद्यपि पर केंद्रित है, और समकालीन राजनीति, विशेष रूप से जर्मन राजनीति। हेबरमास की सैद्धांतिक प्रणाली आधुनिक संस्थानों में और तर्कसंगत हितों को जानबूझकर और आगे बढ़ाने की मानव क्षमता में तर्क, मुक्ति और तर्कसंगत-महत्वपूर्ण संचार अव्यक्त की संभावना को प्रकट करने के लिए समर्पित है। हेबरमास आधुनिकता की अवधारणा पर अपने काम के लिए जाना जाता है, विशेष रूप से मूल रूप से मैक्स वेबर द्वारा तर्कसंगत रूप से चर्चा के संबंध में। वह अमेरिकी व्यावहारिकता, एक्शन थ्योरी और पोस्टस्ट्रक्चरलिज़्म से प्रभावित रहा है।

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  38. Herbert Marcuse

    हरबर्ट मार्कुस ( जुलाई 19, 1898 - 29 जुलाई, 1979) फ्रैंकफर्ट स्कूल ऑफ़ क्रिटिकल थ्योरी से जुड़े एक जर्मन-अमेरिकी दार्शनिक, समाजशास्त्री और राजनीतिक सिद्धांतकार थे। बर्लिन में जन्मे, मार्क्युज़ ने बर्लिन के हम्बोल्ट विश्वविद्यालय और फिर फ्रीबर्ग में अध्ययन किया, जहाँ उन्होंने अपनी पीएचडी प्राप्त की। वह फ्रैंकफर्ट स्थित इंस्टीट्यूट फॉर सोशल रिसर्च में एक प्रमुख व्यक्ति थे - जिसे बाद में फ्रैंकफर्ट स्कूल के रूप में जाना जाने लगा। उनका विवाह सोफी वर्थिम (1924-1951), इंगे न्यूमैन (1955-1973), और एरिका शेरोवर (1976-1979) से हुआ था।अपने लिखित कार्यों में, उन्होंने यह कहते हुए पूंजीवाद, आधुनिक प्रौद्योगिकी, ऐतिहासिक भौतिकवाद और मनोरंजन संस्कृति की आलोचना की कि वे सामाजिक नियंत्रण के नए प्रतिनिधित्व करते हैं।

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  39. पियरे बॉर्डियू Pierre Bourdieu

    पियरे बॉर्डियू (1 अगस्त 1930 - 23 जनवरी 2002) एक फ्रांसीसी समाजशास्त्री, मानवविज्ञानी, दार्शनिक और सार्वजनिक बुद्धिजीवी थे। शिक्षा के समाजशास्त्र में बॉर्डियू के प्रमुख योगदान, समाजशास्त्र के सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र के समाजशास्त्र ने कई संबंधित शैक्षणिक क्षेत्रों (जैसे मानव विज्ञान, मीडिया और सांस्कृतिक अध्ययन, शिक्षा), लोकप्रिय संस्कृति और कलाओं में व्यापक प्रभाव प्राप्त किया है। अपने अकादमिक करियर के दौरान वह मुख्य रूप से पेरिस में सोशल साइंसेज में एडवांस्ड स्टडीज़ के लिए स्कूल और कोलिज डी फ्रांस से जुड़े थे।

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  40. टॉम बटलर-बाउडन Tom Butler-Bowdon

    टॉम बटलर-बाउडन (जन्म; 1967) ऑक्सफोर्ड, इंग्लैंड में स्थित एक गैर-कथा लेखक है।

    बटलर-बोडन का जन्म एडिलेड में हुआ था। उन्होंने सिडनी विश्वविद्यालय (बीए ऑनर्स, सरकार और इतिहास) और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (एमएससी पॉलिटिक्स ऑफ द वर्ल्ड इकोनॉमी) से स्नातक किया।

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  41. हिप्पो का ऍगस्टीन Augustine of Hippo
    ऍगस्टीन (354 ई॰ - 430 ई॰) एक इसाई दार्शनिक थे। इनका जन्म 13 नवम्बर संन 354 में रोमन अफ्रीका के नुमिडिया प्रांत के थागास्ते नमाक शहर में हुआ था। मध्य युग मै इनका कार्य सराहनीय रहा है। इनके द्वारा लैटिन भाषा में लेखी गयी प्रमुख किताबे थी - दे सिविअताते दी (अंग्रेजी में इसे सिटी ऑफ़ गॉड के नाम से जाना जाता हैं) और कंफेशंस।

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  42. सिमोन द बोउआर Simone de Beauvoir
    सिमोन द बुआ (फ़्रांसीसी: Simone de Beauvoir) (जन्म: 9 जनवरी 1908 - मृत्यु : 14 अप्रैल 1986) एक फ़्रांसीसी लेखिका और दार्शनिक हैं। स्त्री उपेक्षिता (फ़्रांसीसी: Le Deuxième Sexe, जून 1949) जैसी महत्वपूर्ण पुस्तक लिखने वाली सिमोन का जन्म पैरिस में हुआ था। लड़कियों के लिए बने कैथलिक विद्यालय में उनकी आरंभिक शिक्षा हुई। उनका कहना था की स्त्री पैदा नहीं होती, उसे बनाया जाता है। सिमोन का मानना था कि स्त्रियोचित गुण दरअसल समाज व परिवार द्वारा लड़की में भरे जाते हैं, क्योंकि वह भी वैसे ही जन्म लेती है जैसे कि पुरुष और उसमें भी वे सभी क्षमताएं, इच्छाएं, गुण होते हैं जो कि किसी लड़के में। सिमोन का बचपन सुखपूर्वक बीता, लेकिन बाद के वर्षो में अभावग्रस्त जीवन भी उन्होंने जिया। 15 वर्ष की आयु में सिमोन ने निर्णय ले लिया था कि वह एक लेखिका बनेंगी।
    दर्शनशास्त्र, राजनीति और सामाजिक मुद्दे उनके पसंदीदा विषय थे। दर्शन की पढ़ाई करने के लिए उन्होंने पैरिस विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया, जहां उनकी भेंट बुद्धिजीवी ज्यां पॉल सा‌र्त्र से हुई। बाद में यह बौद्धिक संबंध आजीवन चला। द सेकंड सेक्स का हिंदी अनुवाद स्त्री उपेक्षिता भी बहुत लोकप्रिय हुआ। 1970 में फ्रांस के स्त्री मुक्ति आंदोलन में सिमोन ने भागीदारी की। स्त्री-अधिकारों सहित तमाम सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर सिमोन की भागीदारी समय-समय पर होती रही। 1973 का समय उनके लिए परेशानियों भरा था। सा‌र्त्र दृष्टिहीन हो गए थे। 1980 में सा‌र्त्र का देहांत हो गया। 1985-86 में सिमोन का स्वास्थ्य भी बहुत गिर गया था। निमोनिया या फिर पल्मोनरी एडोमा में खराबी के चलते उनका देहांत हो गया। सा‌र्त्र की कब्र के बगल में ही उन्हें भी दफनाया गया।

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  43. लुडविग विट्गेंस्टाइन Ludwig Wittgenstein
    लुडविग विट्गेंश्टाइन (Ludwig Josef Johann Wittgenstein') (26 अप्रिल 1889 - 29 अप्रैल 1951) आस्ट्रिया के दार्शनिक थे। उन्होने तर्कशास्त्र, गणित का दर्शन, मन का दर्शन, एवं भाषा के दर्शन पर मुख्यतः कार्य किया। उनकी गणना बीसवीं शताब्दी के महानतम दार्शनिकों में होती है।
    उनके जीते जी एक ही पुस्तक प्रकाशित हो पाई - Tractatus Logico-Philosophicus। बाद की प्रकाशित पुस्तकों में Philosophical Investigations काफी चर्चित रही। विट्गेंश्टाइन कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रहे हैं। विट्गेंश्टाइन के पिता कार्ल एक यहूदी थे जिन्होंने बाद में प्रोटेस्टेंट धर्म अपना लिया था।

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  44. विलियम शेक्सपीयर William Shakespeare
    विलियम शेक्सपीयर (William Shakespeare ; 23 अप्रैल 1564 - 23 अप्रैल 1616 ) अंग्रेजी के कवि, काव्यात्मकता के विद्वान नाटककार तथा अभिनेता थे। उनके नाटकों का लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में अनुवाद हुआ है।शेक्सपियर में अत्यंत उच्च कोटि की सृजनात्मक प्रतिभा थी और साथ ही उन्हें कला के नियमों का सहज ज्ञान भी था। प्रकृति से उन्हें मानो वरदान मिला था अत: उन्होंने जो कुछ छू दिया वह सोना हो गया। उनकी रचनाएँ न केवल अंग्रेज जाति के लिए गौरव की वस्तु हैं वरन् विश्ववांमय की भी अमर विभूति हैं। शेक्सपियर की कल्पना जितनी प्रखर थी उतना ही गंभीर उनके जीवन का अनुभव भी था। अत: जहाँ एक ओर उनके नाटकों तथा उनकी कविताओं से आनंद की उपलब्धि होती है वहीं दूसरी ओर उनकी रचनाओं से हमको गंभीर जीवनदर्शन भी प्राप्त होता है। विश्वसाहित्य के इतिहास में शेक्सपियर के समकक्ष रखे जानेवाले विरले ही कवि मिलते हैं।

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  45. जकोब जोहान फ़्रीह्र्र वॉन उसेक्सुएल Jakob Johann von Uexküll

    जकोब जोहान फ़्रीह्र्र वॉन उसेक्सुएल (8 सितंबर [ O.S 27 अगस्त] 1864 - 25 जुलाई 1944) एक बाल्टिक जर्मन जीवविज्ञानी थे, जो मांसपेशियों के शरीर विज्ञान, पशु व्यवहार अध्ययन और साइबरनेटिक्स के क्षेत्र में काम करते थे। जिंदगी। हालांकि, उनका सबसे उल्लेखनीय योगदान उम्वेल्ट की धारणा है, जिसका उपयोग अर्ध-लेखक थॉमस सेबोक और दार्शनिक मार्टिन हेइडेगर ने किया है। उनके कार्यों ने अनुसंधान के क्षेत्र के रूप में जैवसंश्लेषण की स्थापना की।

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  46. सॉरन किअर्केगार्ड Søren Kierkegaard
    सोरेन किर्केगार्द का जन्म 15 मई,1813 को कोपेनहेगन में हुआ था। अस्तित्ववादी दर्शन के पहले समर्थक हलाकि उन्होने अस्तित्ववाद शब्द का प्रयोग नहीं किया। किर्केगार्द का देहांत 4 नवंबर 1855 को हुआ।

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  47. निकोलो मैकियावेली Niccolò Machiavelli
    निकोलो मैकियावेली (Niccolò di Bernardo dei Machiavelli) (3 मई 1469 - 21 जून 1527) इटली का राजनयिक एवं राजनैतिक दार्शनिक, संगीतज्ञ, कवि एवं नाटककार था। पुनर्जागरण काल के इटली का वह एक प्रमुख व्यक्तित्व था। वह फ्लोरेंस रिपब्लिक का कर्मचारी था। मैकियावेली की ख्याति (कुख्याति) उसकी रचना द प्रिंस के कारण है जो कि व्यावहारिक राजनीति का महान ग्रन्थ स्वीकार किया जाता है।
    मैकियावेली आधुनिक राजनीति विज्ञान के प्रमुख संस्थापकों में से एक माने जाते हैं। वे एक कूटनीतिज्ञ, राजनीतिक दार्शनिक, संगीतज्ञ, कवि और नाटककार थे। सबसे बड़ी बात कि वे फ्लोरिडा गणराज्य के नौकरशाह थे। 1498 में गिरोलामो सावोनारोला के निर्वासन और फांसी के बाद मैकियावेली को फ्लोरिडा चांसलेरी का सचिव चुना गया।
    लियानार्डो द विंसी की तरह, मैकियावेली पुनर्जागरण के पुरोधा माने जाते हैं। वे अपनी महान राजनीतिक रचना, द प्रिंस (राजनीतिक शास्त्र), द डिसकोर्स और द हिस्ट्री के लिए मशहूर हुए जिनका प्रकाशन उनकी मृत्यु (1532) के बाद हुआ, हालांकि उन्होंने निजी रूप इसे अपने दोस्तों में बांटा। एकमात्र रचना जो उनके जीवनकाल में छपी वो थी द आर्ट ऑफ वार. ये रचना युद्ध-कौशल पर आधारित थी। अपनी कुटिल राजनीति को मैकियावेलीवाद कहा जाता है।

    एक व्यक्ति अपने पिता के हत्यारे को क्षमा कर सकता है किंतु अपनी पैतृक संपत्ति छिनने वाले को नहीं। -निकोलो मैकयावली

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  48. ग्राहम प्रीस्ट Graham Priest

    ग्राहम प्रीस्ट (जन्म 1948) ग्रेजुएट सेंटर में दर्शनशास्त्र के प्रतिष्ठित प्रोफेसर हैं, साथ ही मेलबर्न विश्वविद्यालय में एक नियमित आगंतुक हैं, जहां वह बॉयस गिब्सन प्रोफेसर ऑफ फिलॉसफी और सेंट एंड्रयूज विश्वविद्यालय में भी थे।

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  49. आर्थर शोपेनहावर Arthur Schopenhauer
    आर्थर शोपेनहावर (Arthur Schopenhauer) (22 फ़रवरी 1788 - 21 सितम्बर 1860) जर्मनी के प्रसिद्ध दार्शनिक थे। वे अपने 'नास्तिक निराशावाद' के दर्शन के लिये प्रसिद्ध हैं। उन्होने 25 वर्ष की आयु में अपना शोधपत्र पर्याप्त तर्क के चार मूल (On the Fourfold Root of the Principle of Sufficient Reason) प्रस्तुत किया जिसमें इस बात की मीमांसा की गयी थी कि क्या केवल तर्क (reason) संसार के गूढ रहस्यों से पर्दा उठा सकता है? बौद्ध दर्शन की भांति शोपेनहावर भी कि इच्छाओं (will) के शमन की आवश्यकता पर बल दिया है।

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  50. यूनानी तत्वदर्शी ज़ेनो Zeno of Elea
    यूनानी तत्वदर्शी ज़ेनो (Zeno, 495-435 ईo पूo) का जन्म एलिया में हुआ था। गणितजगत्‌ में इनकी प्रसिद्धि के मुख्य कारण अपने परम मित्र पार्मेनिदेस के तर्कों की रक्षा के निमित्त आविष्कृत चार असत्याभास (paradoxes) हैं, जिनमें सातत्य, अनंत एवं अत्यल्प के सामान्य विचार विद्यमान हैं। 435 ईo पूo में राजद्रोह अथवा ऐसे ही किसी अपराध के कारण इनको अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।

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  51. मान्तेन Michel de Montaigne
    माइकेल डि मांतेन (Michel de Montaigne ; 1533-1592) फ्रांसीसी पुनर्जागरण का सबसे प्रभावी लेखक था। माना जाता है कि उसने ही निबन्ध को साहित्य की एक विधा के रूप में प्रचलित किया। उसे आधुनिक संशयवाद (skepticism) का जनक भी माना जाता है।

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  52. बोएथिउस Boethius
    अनिसिउस मनिलिउस सेवेरिनुस बोएथिउस सामान्यता बोएथिउस के नाम से जाने जाते हैं। ये एक रोमन दार्शनिक थे। ये नव-प्लातोवादी दार्शनिक थे।

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  53. एपिकुरुस Epicurus
    एपिकुरुस प्राचीन युनान के दार्शनिक थे। ये आनंदवाद के संस्थापक थे। एपिकुरुस का जन्म 342/1 ईसापूर्व समोस में हुआ था।

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  54. इब्न रश्द Averroes
    इब्न रश्द, (अंग्रेजी में -"Averroes") लैटिन भाषा में आवेररोस (पूरा नाम :अबू इ-वालिद मुहम्मद इब्न ' अहमद इब्न रुस्द) को इस नाम से पुकारा जाता है। एक एंडलुसियन दार्शनिक और विचारक थे जिन्होंने दर्शन, धर्मशास्त्र, चिकित्सा, खगोल विज्ञान, भौतिकी, इस्लामी न्यायशास्त्र और कानून, और भाषाविज्ञान सहित विभिन्न विषयों पर भी लिखा था। उनके दार्शनिक कार्यों में अरिस्टोटल पर कई टिप्पणियां शामिल थीं, जिसके लिए उन्हें पश्चिम में द कमेंटेटर के रूप में जाना जाता था। उन्होंने अलमोहाद खिलाफत के लिए एक न्यायाधीश और एक अदालत चिकित्सक के रूप में भी कार्य किया।
    अरिस्टोटेलियनवाद के एक मजबूत समर्थक, इन्होंने अरिस्तोटल की मूल शिक्षाओं के रूप में जो कुछ देखा और लिखा, उसे बहाल करने का प्रयास किया, जो पिछले मुस्लिम विचारकों, जैसे अल-फरबी और एविसेना की नियोप्लाटोनिस्ट प्रवृत्तियों का विरोध करता था। उन्होंने अल-गजली जैसे अशारी धर्मशास्त्रियों की आलोचना के खिलाफ दर्शन की खोज का भी बचाव किया। उन्होंने तर्क दिया कि इस्लाम में दर्शन केवल स्वीकार्य नहीं था, बल्कि कुछ अभिजात वर्गों के बीच भी अनिवार्य था। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यदि बाइबल का पाठ कारण और दर्शन के आधार पर निष्कर्ष निकालने के लिए प्रकट हुआ, तो पाठ को रूपक रूप से व्याख्या किया जाना चाहिए। आखिरकार, इस्लामी दुनिया में उनकी विरासत भौगोलिक और बौद्धिक कारणों के लिए अहम थी।
    पश्चिम में वह अरिस्टोटल पर अपनी व्यापक टिप्पणियों के लिए जाने जाते थे, जिसका व्यापक रूप से लैटिन और हिब्रू में अनुवाद किया गया था। उनके काम के अनुवादों ने अरिस्टोटल और ग्रीक विचारकों में सामान्य रूप से पश्चिमी यूरोपीय रुचि को पढ़ा, अध्ययन का एक क्षेत्र जिसे आम तौर पर रोमन साम्राज्य के पतन के बाद त्याग दिया गया था। उनके विचारों ने लैटिन ईसाईजगत में विवाद पैदा किए। उन्होंने एवरोइज्म नामक उनके बारे में एक दार्शनिक आंदोलन शुरू किया। 1270 और 1277 ईस्वी में कैथोलिक चर्च द्वारा उनके कार्यों की भी निंदा की गई थी। हालांकि थॉमस एक्विनास द्वारा निंदा और निरंतर आलोचना से कमजोर, लैटिन एवररोइज्म ने सोलहवीं शताब्दी तक अनुयायियों को आकर्षित करना जारी रखा।

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  55. हेरक्लिटस Heraclitus
    हेरक्लिटस(535 ईसा पूर्व -475 ईसा पूर्व) यूनानी दार्शनिक था।

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  56. मैमोनिदेस Maimonides
    मोसेस मैमोनिदेस (1135-1204) मध्य युग के यहूदी दार्शनिक थे। इन्होने गाइड तो दौब्टिंग (अंग्रेजी में - Guide to Doubting) नामक पुस्तक लिखी थी। इस पुस्तक में ये धर्ममीमांसा(theology) को पूरी तरह से तर्कसंगत करने की कोशिश करते हैं।

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  57. टामस हाब्स Thomas Hobbes
    टामस हाव्स (Thomas Hobbes ; 1588 ई0 - 1679 ई0) प्रसिद्ध आंग्ल दार्शनिक एवं राजनीतिक विचारक।

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  58. ज़ाक लाकाँ Jacques Lacan
    ॹाक लाकाँ (फ़्रान्सीसी: फ़्रान्सीसी‎; 13 अप्रैल 1901 – 9 सितंबर 1981) एक फ़्रान्सीसी मनोविश्लेषक और मनोविकारविज्ञानी थे जिन्हें "फ़्रोइड के बाद सबसे विवादास्पद मनोविश्लेषक" कहा जाता है। 1953 से 1981 तक पेरिस में वार्षिक सेमिनार देने के द्वारा लाकाँ ने 1960 और 1970वी सदी के कई मुख्य फ़्रांसीसी बुद्धिजीवीओं को प्रभावित किया, ख़ास तौर पे उन्हें जो उत्तर-संरचनावाद से जुड़े हुए हैं। उत्तर-संरचनावाद, समालोचनात्मक सिद्धांत, भाषाविज्ञान, 20वी सदी का फ़ांसीसी दर्शन, फ़िल्म सिद्धांत और नैदानिक मनोविश्लेषण पर उनके विचारों का महत्वपूरण प्रभाव है।

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  59. उमर खय्याम Omar Khayyam
    उमर खय्याम (1048–1131) फ़ारसी साहित्यकार, गणितज्ञ एवं ज्योतिर्विद थे। इनका जन्म उत्तर-पूर्वी फ़ारस के निशाबुर (निशापुर) में 18 सदी में एक ख़ेमा बनाने वाले परिवार में हुआ था। इन्होंने इस्लामी ज्योतिष को एक नई पहचान दी और इसके सुधारों के कारण सुल्तान मलिकशाह का पत्रा (तारीख़-ए-मलिकशाही), जलाली संवत या सेल्जुक संवत का आरंभ हुआ। इनकी रुबाईयों (चार पंक्तियों में लिखी एक प्रकार की कविता) को विश्व स्तरीय करने में अंग्रेज़ी कवि एडवर्ड फ़िज़्ज़ेराल का बहुत योगदान रहा है।
    खय्याम ने ज्यामिति बीजगणित की स्थापना की, जिसमें उनहोने अल्जेब्रिक समीकरणों के ज्यामितीय हल प्रस्तुत किये। इसमें हाइपरबोला तथा वृत्त जैसी ज्यामितीय रचनाओं द्बारा क्यूबिक समीकरण का हल शामिल है। उन्होंने टेक्नोलोजी व्यापक द्विघात समीकरण का भी विचार दिया।
    खगोलशास्त्र में कार्य करते हुए उमर खय्याम ने एक सौर वर्ष की दूरी दशमलव के छः स्थानों तक शुद्ध प्राप्त की। इस आधार पर उनहोने एक नए कैलेंडर का आविष्कार किया। उस समय की ईरानी हुकूमत ने इसे जलाली कैलेंडर के नाम से लागू किया। वर्तमान ईरानी कैलंडर जलाली कैलेंडर का ही एक मानक रूप है।

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  60. पारमेनीडेस Parmenides

    पारमेनीडेस(515 ईसा पूर्व- 460 ईसा पूर्व) यूनानी दार्शनिक था।

    पर्मानाइड्स को तत्वमीमांसा या ऑन्कोलॉजी का संस्थापक माना जाता है और इसने पश्चिमी दर्शन के पूरे इतिहास को प्रभावित किया है। वह दर्शनशास्त्र के एलैटिक स्कूल के संस्थापक थे, जिसमें एलिया के ज़ेनो और सामोस के मेलिस्स भी शामिल थे। ज़ेनो की गति के विरोधाभास परमेनाइड्स के दृष्टिकोण का बचाव करने के लिए थे।

    परमेनाइड्स द्वारा एकल ज्ञात काम, एक कविता है, ऑन नेचर, जिसके केवल टुकड़े बचे हैं, जिसमें पश्चिमी दर्शन के इतिहास में पहला निरंतर तर्क शामिल है। इसमें, परमेनाइड्स वास्तविकता के दो विचारों को निर्धारित करता है। "सच्चाई का रास्ता" (कविता का एक हिस्सा) में, वह बताते हैं कि सभी वास्तविकता एक है, परिवर्तन असंभव है, और अस्तित्व कालातीत, एक समान और आवश्यक है। "राय का तरीका" में, परमेनिड्स दिखावे की दुनिया की व्याख्या करते हैं, जिसमें किसी के संवेदी संकायों की अवधारणाएं होती हैं जो झूठी और धोखेबाज होती हैं, फिर भी वह एक कॉस्मोलॉजी प्रदान करता है।

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  61. रोलां बार्थ Roland Barthes
    रोलां बार्थ (1915 - 1980) फ्रांस के प्रमुख साहित्यिक आलोचक, साहित्यिक और सामाजिक सिद्धांतकार, दार्शनिक और लाक्षण-विज्ञानी थे। संरचनावाद, लाक्षण-विज्ञान, समाजशास्त्र, डिज़ाइन सिद्धांत, नृविज्ञान और उत्तर-संरचनावाद जैसे सिद्धांत उनके विविध विचारों से प्रभावित थे।

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  62. अल्बैर कामू Albert Camus

    अल्बैर कामू (1913-1960) एक फ्रेंच लेखक थे जिन्हें 1957 में नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

    कैमस का जन्म अल्जीरिया में (उस समय एक फ्रांसीसी उपनिवेश) में फ्रेंच पिड्स नायर के माता-पिता के यहां हुआ था। उनकी नागरिकता फ्रांसीसी थी। उन्होंने अपना बचपन एक गरीब पड़ोस में बिताया और बाद में अल्जीयर्स विश्वविद्यालय में दर्शन का अध्ययन किया। 1940 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब जर्मनों ने फ्रांस पर हमला किया था, तब वह पेरिस में थे। कैम्स ने भागने की कोशिश की, लेकिन अंततः फ्रांसीसी प्रतिरोध में शामिल हो गए जहां उन्होंने कॉम्बैट में एक प्रमुख अखबार के प्रधान संपादक के रूप में काम किया। युद्ध के बाद, वह एक प्रसिद्ध व्यक्ति थे और उन्होंने दुनिया भर में कई व्याख्यान दिए। उन्होंने दो बार शादी की लेकिन कई विवाहेतर संबंध थे। कैमस राजनीतिक रूप से सक्रिय था; वह वामपंथ का हिस्सा था जिसने सोवियत संघ का विरोध किया क्योंकि इसके अधिनायकवाद के कारण। कैमस एक नैतिकतावादी था और अनारचो-संघवाद के प्रति झुकाव रखता था। वह यूरोपीय एकीकरण की मांग करने वाले कई संगठनों का हिस्सा था। अल्जीरियाई युद्ध (1954-1962) के दौरान, उन्होंने एक तटस्थ रुख रखा, एक बहुसांस्कृतिक और बहुलवादी अल्जीरिया की वकालत की, एक ऐसी स्थिति जो विवाद का कारण बनी और अधिकांश दलों द्वारा खारिज कर दिया गया।

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  63. ज़ाक देरिदा Jacques Derrida
    ॹाक देरिदा (15 जुलाई 1930 – 8 अक्टूबर 2004) अल्जीरिया में जन्में एक फ्रांसीसी दार्शनिक थे जिन्हें विरचना (deconstruction) के सिद्धान्त के लिए जाना जाता है। उनके विशाल लेखन कार्य का साहित्यिक और यूरोपीय दर्शन पर गहन प्रभाव पड़ा है। Of Grammatology उनकी सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक मानी जाती है।

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  64. डेविड ह्यूम David Hume

    डेविड ह्यूम (1711-1776) आधुनिक काल के विश्वविख्यात दार्शनिक थे। वे स्काटलैंड (एडिनबरा) के निवासी थे। आपके मुख्य ग्रंथ हैं - 'मानव प्रज्ञा की एक परीक्षा' (An Enquiry Concerning Human Understanding) और 'नैतिक सिद्धांतों की एक परीक्षा' (An Enquiry Concerning the Principles of Morals)

    ह्यूम का दर्शन अनुभव की पृष्ठभूमि में परमोत्कृष्ट है। आपके अनुसार यह अनुभव (impression) और एकमात्र अनुभव ही है जो वास्तविक है। अनुभव के अतिरिक्त कोई भी ज्ञान सर्वोपरि नहीं है। बुद्धि से किसी भी ज्ञान का आविर्भाव नहीं होता। बुद्धि के सहारे मनुष्य अनुभव से प्राप्त विषयों का मिश्रण (संश्लेषण) एवं विच्छेदन (विश्लेषण) करता है। इस बुद्धि से नए ज्ञान की वृद्धि नहीं होती।

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  65. प्रोतागोरास Protagoras

    प्रोटागोरस एक पूर्व-सुकराती ग्रीक दार्शनिक थे। प्लेटो द्वारा उन्हें एक परिष्कारक के रूप में गिना जाता है। अपने संवाद प्रोटोगोरस में, प्लेटो ने पेशेवर परिष्कारक की भूमिका का आविष्कार करने का श्रेय उसे दिया।

    माना जाता है कि प्रोटागोरस ने भी प्राचीन काल में अपने बयान के माध्यम से एक बड़ा विवाद पैदा किया था कि, "मनुष्य सभी चीजों का माप है", इसका अर्थ प्लेटो द्वारा व्याख्या करना है, जिसका अर्थ है कि कोई उद्देश्य सत्य नहीं है। जो भी व्यक्ति सत्य होने का दंभ भरता है वह सत्य है।

    यद्यपि उनके तर्क की व्याख्या की सीमा पर सवाल उठाने का कारण है, उस समय के लिए व्यक्तिगत सापेक्षता की अवधारणा अलौकिक थी, और अन्य दार्शनिक सिद्धांतों के विपरीत, जो दावा करते थे कि ब्रह्मांड मानव उद्देश्य या धारणाओं के बाहर कुछ उद्देश्य पर आधारित था। ।

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  66. एडमंड हुसर्ल Edmund Husserl

    एडमंड गुस्ताव अल्ब्रेक्ट हुसेर्ल: जर्मन 23 अप्रैल 59 - 19 अप्रैल 93 एक जर्मन दार्शनिक थे, जिन्होंने घटना विज्ञान के स्कूल की स्थापना की। अपने शुरुआती काम में, उन्होंने तर्कवाद के विश्लेषण के आधार पर तर्कवाद में ऐतिहासिकता और मनोवैज्ञानिकता की आलोचना की। अपने परिपक्व काम में, उन्होंने तथाकथित घटनात्मक कमी के आधार पर एक व्यवस्थित मूलभूत विज्ञान विकसित करने की मांग की। यह तर्क देते हुए कि पारलौकिक चेतना सभी संभावित ज्ञान की सीमाओं को निर्धारित करती है, हुसेरेल ने घटना को एक पारलौकिक-आदर्शवादी दर्शन के रूप में पुनर्परिभाषित किया। हसरेल के विचार ने गहराई से 20 वीं सदी के दर्शन को प्रभावित किया, और वह समकालीन दर्शन और उससे परे एक उल्लेखनीय व्यक्ति बने हुए हैं।

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  67. एडमंड हुसर्ल Edmund Husserl

    एडमंड गुस्ताव अल्ब्रेक्ट हुसेर्ल: जर्मन 23 अप्रैल 59 - 19 अप्रैल 93 एक जर्मन दार्शनिक थे, जिन्होंने घटना विज्ञान के स्कूल की स्थापना की। अपने शुरुआती काम में, उन्होंने तर्कवाद के विश्लेषण के आधार पर तर्कवाद में ऐतिहासिकता और मनोवैज्ञानिकता की आलोचना की। अपने परिपक्व काम में, उन्होंने तथाकथित घटनात्मक कमी के आधार पर एक व्यवस्थित मूलभूत विज्ञान विकसित करने की मांग की। यह तर्क देते हुए कि पारलौकिक चेतना सभी संभावित ज्ञान की सीमाओं को निर्धारित करती है, हुसेरेल ने घटना को एक पारलौकिक-आदर्शवादी दर्शन के रूप में पुनर्परिभाषित किया। हसरेल के विचार ने गहराई से 20 वीं सदी के दर्शन को प्रभावित किया, और वह समकालीन दर्शन और उससे परे एक उल्लेखनीय व्यक्ति बने हुए हैं।

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  68. खलील जिब्रान Kahlil Gibran
    खलील जिब्रान (Khalil Gibran (/dʒɪˈbrɑːn/; पूरा अरबी नाम : Gibran Khalil Gibran, अरबी: جبران خليل جبران‎ / ALA-LC: Jubrān Khalīl Jubrān or Jibrān Khalīl Jibrān) ( 6 जनवरी, 1883 – 10 जनवरी, 1931) एक लेबनानी-अमेरिकी कलाकार, कवि तथा न्यूयॉर्क पेन लीग के लेखक थे। उन्हें अपने चिंतन के कारण समकालीन पादरियों और अधिकारी वर्ग का कोपभाजन होना पड़ा और जाति से बहिष्कृत करके देश निकाला तक दे दिया गया था। आधुनिक अरबी साहित्य में जिब्रान खलील 'जिब्रान' के नाम से प्रसिद्ध हैं, किंतु अंग्रेजी में वह अपना नाम खलील ज्व्रान लिखते थे और इसी नाम से वे अधिक प्रसिद्ध भी हुए।

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  69. डेमी क्रिट्स Democritus

    डेमी क्रिट्स यूनान के दार्शनिक थे। ये आण्विक तथ्य के जन्मदाता थे। इन्होंने पदार्थ के गठन के सम्बन्ध में खोज किया।

    डेमोक्रिटस का जन्म एबर्डा, थ्रेस, [4] के आसपास 460 ईसा पूर्व में हुआ था, हालांकि सटीक वर्ष को लेकर असहमति है। उनके सटीक योगदानों को उनके गुरु ल्यूयुसपस के उन विषयों से अलग करना मुश्किल है, क्योंकि उन्हें अक्सर ग्रंथों में एक साथ उल्लेख किया गया है। ल्यूसिप्पस से ली गई परमाणु पर उनकी अटकलें, 19 वीं शताब्दी के परमाणु संरचना को समझने के लिए एक आंशिक और आंशिक समानता का सामना करती हैं, जिसने कुछ अन्य यूनानी दार्शनिकों की तुलना में डेमोक्रिटस को एक वैज्ञानिक के रूप में अधिक माना है; हालाँकि, उनके विचारों ने बहुत भिन्न आधारों पर विश्राम किया। [5] प्राचीन एथेंस में बड़े पैमाने पर नजरअंदाज किया गया, कहा जाता है कि डेमोक्रिटस को प्लेटो द्वारा इतना नापसंद किया गया था कि बाद वाले ने उनकी सभी पुस्तकों को जला दिया। [6] फिर भी वह अपने साथी उत्तरी मूल के दार्शनिक अरस्तू के बारे में अच्छी तरह से जानते थे, और प्रोटागोरस के शिक्षक थे।

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  70. विलियम जेम्स William James
    विलियम जेम्स (William James ; 11 जनवरी, 1842 – 26 अगस्त, 1910) अमेरिकी दार्शनिक एवं मनोवैज्ञानिक थे जिन्होने चिकित्सक के रूप में भी प्रशिक्षण पाया था। इन्होंने मनोविज्ञान को दर्शनशास्त्र से पृथक किया था, इसलिए इन्हें मनोविज्ञान का जनक भी माना जाता है।
    विलियम जेम्स ने मनोविज्ञान के अध्ययन हेतु एक पुस्तक लिखी जिसका नाम "प्रिंसिपल्स ऑफ़ साइकोलॉजी" है। इसका भाई हेनरी जेम्स प्रख्यात उपन्यासकार था।
    आकर्षक लेखनशैली और अभिव्यक्ति की कुशलता के लिये जेम्स विख्यात हैं।
    विलियम जेम्स का जन्म 11 जनवरी 1842 को न्यूयार्क में हुआ। जेम्स ने हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में चिकित्साविज्ञान का अध्ययन किया और वहीं 1872 से 1907 तक क्रमश: शरीरविज्ञान, मनोविज्ञान और दर्शन का प्राध्यापक रहा। 1899 से 1901 तक एडिनबर्ग विश्वविद्यालय में प्राकृतिक धर्म पर और 1908 में ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालय में दर्शन पर व्याख्यान दिए। 26 अगस्त, 1910 को उसकी मृत्यु हो गई।
    1890 में उसकी पुस्तक प्रिंसिपिल्स ऑव् साइकॉलाजी प्रकाशित हुई, जिसने मनोविज्ञान के क्षेत्र में क्रांति सी मचा दी, और जेम्स को उसी एक पुस्तक से जागतिक ख्याति मिल गई। अपनी अन्य रचनाओं में उसने दर्शन तथा धर्म की समस्याओं को सुलझाने में अपनी मनोवैज्ञानिक मान्यताओं का उपयोग किया और उनका समाधान उसने अपने फलानुमेयप्रामाणवाद (Pragmatism) और आधारभूत अनुभववाद (Radical Empiricism) में पाया। फलानुमेयप्रामाणवादी जेम्स ने 'ज्ञान' को बृहत्तर व्यावहारिक स्थिति का, जिससे व्यक्ति स्वयं को संसार में प्रतिष्ठित करता है, भाग मानते हुए 'ज्ञाता' और 'ज्ञेय' को जीवी (Organism) और परिवेश (Environment) के रूप में स्थापित किया है। इस प्रकार सत्य कोई पूर्ववृत्त वास्तविकता (Antecedent Reality) नहीं है, अपितु वह प्रत्यय की व्यावहारिक सफलता के अंशों पर आधारित है। सभी बौद्धिक क्रियाओं का महत्व उनकी व्यावहारिक उद्देश्यों की पूर्ति की क्षमता में निहित है।
    आधारभूत अनुभववाद जेम्स ने पहले मनोवैज्ञानिक सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया। जॉन लॉक और जार्ज बर्कली के मतों से भिन्न उसकी मान्यता थी कि चेतना की परिवर्तनशील स्थितियाँ परस्पर संबंधित रहती हैं; तदनुसार समग्र अनुभव की स्थितियों में संबंध स्थापित हो जाता है; मस्तिष्क आदि कोई बाह्य शक्ति उसमें सहायक नहीं होती। मस्तिष्क प्रत्यक्ष अनुभव की समग्रता में भेद करता है। फलानुमेय प्रामाण्यवाद और आधारभूत अनुभववाद पर ही जेम्स की धार्मिक मान्यताएँ आधृत हैं। फलानुमेय प्रामाण्यवाद सत्य की अपेक्षा धार्मिक विश्वासों की व्याख्या में अधिक सहायक था; क्योंकि विश्वास प्राय: व्यावहारिक होते हैं यहाँ तक कि तर्कों के प्रमाण के अभाव में भी मान्य होते हैं; किंतु परिणामवादीदृष्टिकोण से सत्य की, परिभाषा स्थिर करना संदिग्ध है।
    'द विल टु बिलीव' में जेम्स ने अंतःकरण के या संवेगजन्य प्रमाणों पर बल दिया है और सिद्ध किया है कि उद्देश्य (Purpose) और संकल्प (Will) ही व्यक्ति के दृष्टिकोण का निर्माण करते हैं। 'द वेराइटीज़ ऑव रिलीजस एक्सपीरियेंस' में जेम्स ने व्यक्ति को निष्क्रिय और शक्तिहीन दिखलाया है तथा यह भी प्रदर्शित किया है कि उसकी रक्षा कोई बाह्य शक्ति करती है। जेम्स के अनुभववाद से धार्मिक अनुभूति की व्याख्या इसलिये असंभव है कि इन अनुभूतियों का व्यक्ति के अवचेनत से सीधा संबंध होता है।
    जेम्स के धर्मदर्शन में तीन बातें मुख्य हैं-

    (1) अंत:करण या संवेगजन्य प्रमाणों की सत्यता पर बल,
    (2) धर्म की संदिग्ध सर्वोत्कृष्टता और ईश्वर की सीमितता का आग्रह, और
    (3) बाह्य अनुभव को यथावत् ग्रहण करने की आतुरता।जेम्स की अन्य प्रकाशित पुस्तकें 'साइकॉलजी', ब्रीफर कोर्स' (1892), 'ह्यूमन इम्मारटलिटी' (1898), टाक्स टु टीचर्स आन साइकॉलजी' (1899), 'प्राग्मैटिज्म' (1907), 'अ प्ल्यूरलिस्टिक यूनिवर्स' (1909), 'द मीनिंग ऑव ट्रूथ (1909), 'मेमोरीज एंड स्टडीज' (1911), 'सम प्राब्लेम्स ऑव फिलासफी' (1911), 'एसेज इन रेडिकल एंपिरिसिज्म' (1912) है।

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  71. जेरेमी बेन्थम Jeremy Bentham
    जेरेमी बेन्थम (Jeremy Bentham) (15 फ़रवरी 1748 – 6 जून 1832) इंग्लैण्ड का न्यायविद, दार्शनिक तथा विधिक व सामाजिक सुधारक था। वह उपयोगितावाद का कट्टर समर्थक था। वह प्राकृतिक विधि तथा प्राकृतिक अधिकार के सिद्धान्तों का कट्टर विरोधी था।
    सन् 1776 में उसकी 'शासन पर स्फुट विचार' (Fragment on Government) शीर्षक पुस्तक प्रकाशित हुई। इसमें उसने यह मत व्यक्त किया कि किसी भी कानून की उपयोगिता की कसौटी यह है कि जिन लोगों से उसका संबंध हो, उनके आनंद, हित और सुख की अधिक से अधिक वृद्धि वह करे। उसकी दूसरी पुस्तक 'आचार और विधान के सिद्धांत' (Introduction to Principles of Morals and Legislation) 1789 में निकली जिसमें उसके उपयोगितावाद का सार मर्म सन्निहित है। उसने इस बात पर बल दिया कि 'अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख' ही प्रत्येक विधान का लक्ष्य होना चाहिए। 'उपयोगिता' का सिद्धांत वह अर्थशास्त्र में भी लागू करना चाहता था। उसका विचार था कि प्रत्येक व्यक्ति को, किसी भी तरह के प्रतिबंध के बिना, अपना हित संपन्न करने की स्वतंत्रता रहनी चाहिए। सूदखोरी के समर्थन में उसने एक पुस्तक 'डिफेंस ऑव यूज़री' (Defence of Usury) सन् 1787 में लिखी थी। उसने गरीबों संबंधी कानून (पूअर लाँ) में सुधार करने के लिए जो सुझाव दिए, उन्हीं के आधार पर सन् 1834 में उसमें कई संशोधन किए गए। पार्लियामेंट में सुधार कराने के संबंध में भी उसने एक पुस्तक लिखी थी (1817)। इसमें उसने सुझाव दिया था कि मतदान का अधिकार प्रत्येक वयस्क व्यक्ति को मिलना चाहिए और चुनाव प्रति वर्ष किया जाना चाहिए। उसने बंदीगृहों के सुधार पर भी बल दिया। और 1811 में 'दंड और पुरस्कार' (Punishments and Rewards) शीर्षक एक पुस्तक लिखी।
    जेरेमी बेंथम के बारे में
    उपयोगितावाद के प्रवर्तक जेरेमी बेंथम का जन्म 1748 ईस्वी में इंग्लैंड के एक संपन्न वकील घर आने में हुआ था , बेंथम बचपन से ही असाधारण प्रतिभाशाली था और अपनी इस प्रतिभा के बल पर उसने 15 वर्ष की आयु में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से स्नातक परीक्षा पास कर ली बेंथम अपने असाधारण योग्यता के कारण ही अपने गुरुओं के और अयोग्य तथा साथियों को मूर्ख समझता था, स्नातक उपाधि प्राप्तत करने के बाद उसने 'लिकंस इन ' मैं कानून का अध्ययन करनेे के लिए प्रवेश लिया 1772 में उसने वकालत करना प्रारंंभ किया लेकिन थोड़ेे थोड़े समय के बाद ही उसने इस व्यवसाय को छोड़ दिया अपनेे युग के इस बौद्धिक आचार्यय को थोड़े समय तक वकालत करने परतत्कालीन कानून व्यवस्था के दोषों का ज्ञान हो गया और वकालत करने के स्थान पर अपने जीवन का भी कानूनी पद्धतिि का संशोधन करना निश्चित किया
    1772 मे वह कानूनी पद्धति के संशोधन कार्य में लग गया और 1776 ई. में उसकी प्रथम पुस्तक " शासन पर कुछ विचार "(fragments on government ) प्रकाशित हुई, इस पुस्तक में उस समय के विगत विधि शास्त्री ब्लैक स्टोन की आलोचना कर के कानून के क्षेत्र में हलचल मचा दी ,बेंथम प्रतिदिन नियमित रूप से लिखने वाला और साधारण व्यक्ति था और ज्ञान विज्ञान के सभी क्षेत्रों में उसकी निवाद गती थी, लेकिन उसका लेखन कार्य अत्यधिक अव्यवस्थित था 1788 सी में उसकी भेंट जेनेवा वासी कुमारी dumont से हुई जिसने उसकी रचनाओं का सभी जगत की फ्रेंच भाषा में अनुवाद किया इससे फ्रेंंच भाषा भाषी प्रदेशों में उसकी ख्याति बढ़ी 1821 में उसे 28 वर्षीय बोरिंग नामक भक्त नवयुवक के सहयोोग मिला जिसने उसके कुछ ग्रंथों को एक 11 खंडों में प्रकाशित किया, किंतु उसके लेखों का एक बड़ा भाग अब तक प्रकाशित है ा वृद्धा अवस्था तक बेंथम कितना अधिक सक्रियता इसका प्रमाण यह हैै कि अपनेे उग्र विचारों का प्रचार करने के लिए उसने 70 वर्ष की आयु वेस्ट मिनिस्टर रिव्यू नामक पत्र निकाला और 89 वर्ष की अवस्था में उसने लंदन विश्वविद्यालय के मूल्य यूनिवर्सिटी कॉलेज को इस उद्देश्य स्थापित किया कि या ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज के दूषित वातावरण से मुक्त रे उसने उपयोगितावाद के साथ साथ सुधारवादी नीव मजबूत की ा , चीर कुंवारे रहते हैं ,आनंद पूर्वक एक दीर्घ जीवन व्यतीत करने के बाद 1832 में इस महान विचारक की मृत्यु हो गई ा
    प्रसिद्ध कृतियां
    1. Fragments on government
    2. Introduction to the principles of morals and legislation
    3. Essay on political tactics
    4. Principles of international relations
    5. Anarchical fallacies
    6. manual of political economy
    7. Radicalism not '

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  72. थॉमस जेफ़र्सन Thomas Jefferson

    थामस जेफरसन (Thomas Jefferson) (13 अप्रैल 1743 - 4 जुलाई 1826) संयुक्त राज्य अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति (1801–1809) तथा अमेरिकी 'स्वतंत्रता की घोषणा' के मुख्य लेखक (1776) थे। जेफरसन एक राजनैतिक दार्शनिक तथा विद्वान व्यक्ति थे। ये डेमोक्रेटिक- रिपब्लिकन पार्टी से थे। उनकी इंग्लैण्ड और फ्रान्स के बहुत से बुद्धिजीवी नेताओं से जान-पहचान थी।

    अमेरिकी क्रांति के दौरान, जेफर्सन ने कॉन्टिनेंटल कांग्रेस में वर्जीनिया का प्रतिनिधित्व किया जिसने घोषणा को अपनाया, वर्जीनिया विधायक के रूप में धार्मिक स्वतंत्रता के लिए कानून का मसौदा तैयार किया, और अमेरिकी क्रांतिकारी युद्ध के दौरान 1779 से 1781 तक वर्जीनिया के दूसरे गवर्नर के रूप में कार्य किया। मई 1785 में, जेफरसन को फ्रांस के लिए संयुक्त राज्य मंत्री नियुक्त किया गया था, और बाद में, 1790 से 1793 तक राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन के तहत देश के पहले राज्य सचिव। जेफरसन और जेम्स मैडिसन ने गठन के दौरान फेडरलिस्ट पार्टी का विरोध करने के लिए डेमोक्रेटिक-रिपब्लिकन पार्टी का आयोजन किया। फर्स्ट पार्टी सिस्टम का। मैडिसन के साथ, उन्होंने 1798 और 1799 में उत्तेजक केंटकी और वर्जीनिया रिज़ॉल्यूशन लिखा, जिसमें संघीय एलियन और सेडिशन अधिनियमों को शून्य करके राज्यों के अधिकारों को मजबूत करने की मांग की गई।

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  73. अनेग्जीमेण्डर Anaximander
    यह थेल्स का शिष्य था। उसने सर्वप्रथम एक बेबीलोनियन यन्त्र नोमोन बनाया बनाया जो सूर्य घड़ी का कार्य करता था।
    अनेग्जीमेण्डर ईसा से 610-546 वर्ष पूर्व
    युनानी विद्वान था। इसने ब्रह्माण्डविज्ञान को विकसित किया।
    इसने ब्रह्माण्ड उत्पत्ति का सिद्धांत और नक्षत्रों का उल्लेख किया।
    मिलेसस निवासी यह बिद्द्वान थेल्स का शिष्य था तथा उतराधिकारी था ।उन्हिने पृथ्वी की उत्पति ,आकार तथा आकृति में विचार रखे ,उन्हिने पृथ्वी की उतपत्ति अदृश्य पदार्थो से मानी जो उसर्ण और शीतोष्ण दोनों गुड वाले थे ।अदृश्य पदार्थी में भीतरी भाग में ठण्डा होने से तो ढाल की आकृति में पृथ्वी बनी तथा बाहरी उषण भाग केंद्रित भाग से अलग हो गया जो काली धुंद के रूप में वायुमंडल बना ।इन्होने बाताया की पृथ्वी ब्रह्माण्ड के मध्य ठोस रूप में है तथा चपटी ना होकर गोलाकार है ।
    उन्होंने पृथ्वी के लम्बाई को चौड़ाई से तीन गुणा अधिक बताया उन्होंने एक मानचित्र भी बनाया ।जिसके मद्य यूनान तथा विश्व के चारो ओर महासागर नदी से घिरा हुआ बताया ।
    इन्होने अनेक जिव उत्पत्ति तथा प्रकाश सम्बंधित लेख लिखे तथा पृथ्वी तल से समस्त जीवधारियो को उत्पत्ति जीवो के विकास के फलस्वरूप मानी ।उन्हिने सर्वप्रथम एक बेविलोनियाँ यन्त्र नोमोन बताया जो सूर्य घडी का कार्य करता है amit patel

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  74. मार्कस ऑरेलियस Marcus Aurelius
    मार्कस ऑरेलियस (Marcus Aurelius ; /ɔːˈriːliəs/; लातिन : Marcus Aurelius Antoninus Augustus; 26 April 121 – 17 March 180 AD) रोम का सम्राट था जिसने 161 से 180 ई॰ तक शासन किया। वह उन पाँच सम्राटों में अन्तिम सम्राट था जिन्हें 'पाँच अच्छे सम्राट' कहा जाता है। वह स्टोइक दर्शन का अभ्यासी था। उसने बिना शीर्षक के एक पुस्तक की रचना की थी जिसे आजकल 'मेडिटेशन्स' (Meditations) नाम से जाना जाता है। वर्तमान समय में प्राचीन स्टोइक दर्शन को समझने की यह महत्वपूर्ण स्रोत है। बहुत से टिप्पणीकार दर्शन की महानतम पुस्तकों में इसे गिनते हैं।

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  75. मार्टिन हाइडेगर Martin Heidegger

    मार्टिन हाइडेगर एक जर्मन दार्शनिक थे | वह 26 सितंबर, 1889 को पैदा हुआ था। वे 26 मई, 1976 को निधन हो गया। वे वर्तमान काल के प्रसिद्ध अस्तित्ववादी दार्शनिक है किन्तु वे अपने सिद्धांत को अस्तित्ववादी सिद्धांत कहलाने से इंकार करते है। वह जर्मनी के छोटे से कस्बे में पैदा हुआ था और रोमन कैथोलिक वातावरण मे पला था। उसने अपनी दार्शनिक शिक्षा पहले तो नव कांटवादी विल्हेम व रिकेट के निर्देशन में प्राप्त की बाद में वे हसरेल के संपर्क मे आये।

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  76. बारूथ स्पिनोज़ा Baruch Spinoza
    बारूथ डी स्पिनोज़ा (Baruch De Spinoza) (24 नवम्बर 1632 - 21 फ़रवरी 1677) यहूदी मूल के डच दार्शनिक थे। उनका परिवर्तित नाम 'बेनेडिक्ट डी स्पिनोजा' (Benedict de Spinoza) था। उन्होने उल्लेखनीय वैज्ञानिक अभिक्षमता (aptitude) का परिचय दिया किन्तु उनके कार्यों का महत्व उनके मृत्यु के उपरान्त ही सम्झा जा सका।

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  77. पाइथागोरस Pythagoras
    【 अनिक 】सामोस के पाईथोगोरस (यूनानी : Ὁ Πυθαγόρας ὁ Σάμιος, ओ पुथागोरस ओ समिओस , "पाईथोगोरस दी समियन (Samian)," या साधारण रूप से Ὁ Πυθαγόρας; उनका जन्म 580 और 572 ई॰पू॰ के बीच हुआ और मृत्यु 500 और 490 ई॰पू॰ के बीच हुई), या फ़ीसाग़ोरस, एक अयोनिओयन (Ionian) ग्रीक (Greek)गणितज्ञ (mathematician) और दार्शनिक थे और पाईथोगोरियनवाद (Pythagoreanism) नामक धार्मिक आन्दोलन के संस्थापक थे। उन्हें अक्सर एक महान गणितज्ञ, रहस्यवादी (mystic) और वैज्ञानिक (scientist) के रूप में सम्मान दिया जाता है; हालाँकि कुछ लोग गणित और प्राकृतिक दर्शन में उनके योगदान की संभावनाओं पर सवाल उठाते हैं। हीरोडोट्स उन्हें "यूनानियों के बीच सबसे अधिक सक्षम दार्शनिक" मानते हैं। उनका नाम उन्हें पाइथिआ (Pythia) और अपोलो से जोड़ता है; एरिस्तिपस (Aristippus) ने उनके नाम को यह कह कर स्पष्ट किया कि "वे पाइथियन (पाइथ-) से कम सच (एगोर-) नहीं बोलते थे," और लम्ब्लिकास (Iamblichus) एक कहानी बताते हैं कि पाइथिआ ने भविष्यवाणी की कि उनकी गर्भवती माँ एक बहुत ही सुन्दर, बुद्धिमान बच्चे को जन्म देगी जो मानव जाती के लिए बहुत ही लाभकारी होगा। (The Savisier-) उन्हें मुख्यतः पाईथोगोरस की प्रमेय (Pythagorean theorem) के लिए जाना जाता है, जिसका नाम उनके नाम पर दिया गया है। पाइथोगोरस को "संख्या के जनक" के रूप में जाना जाता है, छठी शताब्दी ईसा पूर्व में धार्मिक शिक्षण और दर्शनमें उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। पूर्व सुकराती (pre-Socratic) काल के अन्य लोगों की तुलना में उनके कार्य ने कथा कहानियों को अधिक प्रभावित किया, उनके जीवन और शिक्षाओं के बारे में अधिक विश्वास के साथ कहा जा सकता है। हम जानते हैं कि पाइथोगोरस और उनके शिष्य मानते थे कि सब कुछ गणित से सम्बंधित है और संख्याओं में ही अंततः वास्तविकता है और गणित के माध्यम से हर चीज के बारे में भविष्यवाणी की जा सकती है तथा हर चीज को एक ताल बद्ध प्रतिरूप या चक्र के रूप में मापा जा सकता है। लम्बलीकस (Iamblichus) के अनुसार, पाइथोगोरस ने कहा कि "संख्या ही विचारों और रूपों का शासक है और देवताओं और राक्षसों का कारण है।"
    वो पहले आदमी थे जो अपने आप को एक दार्शनिक, या बुद्धि का प्रेमी कहते थे, और पाइथोगोरस के विचारों ने प्लेटो पर एक बहुत गहरा प्रभाव डाला। दुर्भाग्य से, पाइथोगोरस के बारे में बहुत कम तथ्य ज्ञात हैं, क्योंकि उन के लेखन में से बहुत कम ही बचे हैं। पाइथोगोरस की कई उपलब्धियां वास्तव में उनके सहयोगियों और उत्तराधिकारियों की उपलब्धियां हैं।

    == जीवन ==

    पाईथोगोरस का जन्म सामोस (Samos) में हुआ, जो एशिया माइनर (Asia Minor) के किनारे पर, पूर्वी ईजियन में एक यूनानी द्वीप है। उनकी माँ पायथायस (समोस की निवासी) और पिता मनेसार्चस (टायर (Tyre) के एक फोनिसियन (Phoenicia) व्यापारी) थे। जब वे जवान थे तभी उन्होंने, अपने जन्म स्थान को छोड़ दिया और पोलिक्रेट्स (Polycrates) की अत्याचारी (tyrannical) सरकार से बच कर दक्षिणी इटलीमें क्रोटोन (Croton) केलेब्रिया (Calabria) में चले गए। लम्ब्लिकस (Iamblichus) के अनुसार थेल्स (Thales) उनकी क्षमताओं से बहुत अधिक प्रभावित था, उसने पाइथोगोरस को इजिप्त में मेम्फिस (Memphis) को चलने और वहाँ के पुजारियों के साथ अध्ययन करने की सलाह दी जो अपनी बुद्धि के लिए जाने जाते थे। वे फोनेशिया में टायर और बैब्लोस में शिष्य बन कर भी रहे। इजिप्ट में उन्होंने कुछ ज्यामितीय सिद्धांतों को सिखा जिससे प्रेरित होकर उन्होंने अंततः प्रमेय दी जो अब उनके नाम से जानी जाती है। यह संभव प्रेरणा बर्लिन पेपाइरस (Berlin Papyrus) में एक असाधारण समस्या के रूप में प्रस्तुत है। समोस से क्रोटोन (Croton), केलेब्रिया (Calabria), इटली, आने पर उन्होंने एक गुप्त धार्मिक समाज की स्थापना की जो प्रारंभिक ओर्फिक कल्ट (Orphic cult) से बहुत अधिक मिलती जुलती थी और संभवतः उससे प्रभावित भी थी।

    पाइथोगोरस ने क्रोटन के सांस्कृतिक जीवन में सुधर लाने की कोशिश की, नागरिकों को सदाचार का पालन करने के लिए प्रेरित किया और अपने चारों और एक अनुयायियों का समूह स्थापित कर लिया जो पाइथोइगोरियन कहलाते हैं। इस सांस्कृतिक केन्द्र के संचालन के नियम बहुत ही सख्त थे। उसने लड़कों और लड़कियों दोनों के liye सामान रूप से अपना विद्यालय खोला.जिन लोगों ने पाइथोगोरस के सामाज के अंदरूनी हिस्से में भाग लिए वे अपने आप को मेथमेटकोई कहते थे। वे स्कूल में ही रहते थे, उनकी अपनी कोई निजी संपत्ति नहीं थी, उन्हें मुख्य रूप से शाकाहारी भोजन खाना होता था, (बलि दिया जाने वाला मांस खाने की अनुमति थी) अन्य विद्यार्थी जो आस पास के क्षेत्रों में रहते थे उन्हें भी पाइथोगोरस के स्कूल में भाग लेने की अनुमति थी। उन्हें अकउसमेटीकोई के नाम से जाना जाता था और उन्हें मांस खाने और अपनी निजी सम्पति रखने की अनुमति थी। रिचर्ड ब्लेक्मोर ने अपनी पुस्तक दी ले मोनेस्ट्री (1714) में पाइथोगोरियनो के धार्मिक प्रेक्षणों को बताया, "यह इतिहास में दर्ज संन्यासी जीवन का पहला उदाहरण था।
    लम्ब्लिकास (Iamblichus) के अनुसार, पाइथोगोरस ने धार्मिक शिक्षण, सामान्य भोजन, व्यायाम, पठन और दार्शनिक अध्ययन से युक्त जीवन का अनुसरण किया। संगीत इस जीवन का एक आवश्यक आयोजन कारक था: शिष्य अपोलो के लिए नियमित रूप से मिल जुल कर भजन गाते थे; वे आत्मा या शरीर की बीमारी का इलाज करने के लिए वीणा (lyre) का उपयोग करते थे; याद्दाश्त को बढ़ाने के लिए सोने से पहले और बाद में कविता पठन किया जाता था।
    फ्लेवियस जोजेफस (Flavius Josephus), एपियन के विरुद्ध (Against Apion), यहूदी धर्म की रक्षा में ग्रीक दर्शनशास्त्र (Greek philosophy) के खिलाफ कहा कि समयरना के हर्मिपस (Hermippus of Smyrna) के अनुसार पाइथोगोरस यहूदी विश्वासों से परिचित था, उसने उनमें से कुछ को अपने दर्शन में शामिल किया।
    जिंदगी के अंतिम चरण में उसके और उसके अनुयायियों के खिलाफ क्रोतों के एक कुलीन सैलों (Cylon) द्वारा रचित शाजिश की वजह से वह मेतापोंतुम (Metapontum) भाग गया। वह अज्ञात कारणों से मेटापोंटम म में 90 साल की उम्र में मर गया।
    बर्ट्रेंड रसेल, ने पश्चिमी दर्शन के इतिहास (History of Western Philosophy), में बताया कि पाइथोगोरस का प्लेटो और अन्य लोगों पर इतना अधिक प्रभाव था कि वह सभी पश्चिमी दार्शनिकों में सबसे ज्यादा प्रभावी माना जाता था।

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  78. अंतोनियो ग्राम्शी Antonio Gramsci

    अंतोनियो ग्राम्शी (1891- 1937) इटली की कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक, मार्क्सवाद के सिद्धांतकार तथा प्रचारक थे। बीसवीं सदी के आरंभिक चार दशकों के दौरान दक्षिणपंथी फ़ासीवादी विचारधारा से जूझने और साम्यवाद की पक्षधरता के लिए विख्यात हैं।

    ग्राम्शी का जन्म 22 जनवरी 1891 को सरदानिया में कैगलियारी के एल्स प्रांत में हुआ था। फ़्रांसिस्को ग्राम्शी और गिसेपिना मर्सिया की सात संतानों में से अंतोनियो ग्राम्शी चौथी संतान थे। पिता के साथ ग्राम्शी के कभी भी मधुर संबंध नहीं रहे लेकिन माँ के साथ उनका गहरा लगाव था। माँ की सहज बयान शैली, परिस्थितियों के अनुरूप लचीलापन और जीवंत हास्यबोध का उनके व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ा।[1]

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  79. राल्फ वाल्डो इमर्सन Ralph Waldo Emerson
    राल्फ वाल्डो इमर्सन (1803-1882) प्रसिद्ध निबंधकार, वक्ता तथा कवि थे। उन्हें अमरीकी नवजागरण का प्रवर्तक माना जाता है। आपने मेलविन, ह्विटमैन तथा हाथार्न जैसे अनेक लेखकों ओर विचारकों को प्रभावित किया। आप लोकोत्तरवाद के नेता थे जो एक सहृदय, धार्मिक, दार्शनिक एचं नैतिक आंदोलन था। आप व्यक्ति की अनंतता, अर्थात् दैवी कृपा के जाग्रत उसकी आध्यात्मिक व्यापकता के पक्ष के पोषक थे। आपकी दार्शनिकता के मुख्य आधार पहले प्लैटो, प्लोटाइनस, बर्कले फिर वर्डस्वर्थ, कोलरिज, गेटे, कार्लाइल, हर्डर, स्वेडनबोर्ग और अंत में चीन, ईरान ओर भारत के लेखक थे।

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  80. मैरी वोलस्टोनक्राफ़्ट Mary Wollstonecraft
    मैरी वुलस्टोनक्राफ़्ट (अंग्रेज़ी: Wollstonecraft) (/wʊlstən.krɑːft/, 27 अप्रैल 1759 - 10 सितंबर 1797) महिलाओं के अधिकारों के लिये लिखने वाली एक अंग्रेजी लेखक, दार्शनिक, और समर्थक थीं। अपने संक्षिप्त कार्यकाल के दौरान, वह उपन्यास, चरक, एक यात्रा कथा, फ्रांसीसी क्रांति, एक आचरण किताब का एक इतिहास है, और एक बच्चों की किताब में लिखा था। वुलस्टोनक्राफ़्ट सबसे अच्छा है कि वह महिलाओं को पुरुषों के लिए स्वाभाविक रूप से हीन नहीं हैं कि तर्क है जिसमें नारी के अधिकार (1792), का एक प्रमाण के लिए जाना जाता है, लेकिन वे शिक्षा की कमी ही है क्योंकि होना दिखाई देते है। वह दोनों पुरुषों और महिलाओं को तर्कसंगत प्राणी के रूप में इलाज किया गया और कारण की स्थापना पर एक सामाजिक व्यवस्था माहौल की जानी चाहिए कि पता चलता है।
    देर से 20 वीं सदी तक, कई अपरंपरागत निजी संबंधों को घेर लिया जो वुलस्टोनक्राफ़्ट के जीवन, उसे लिखने से ज्यादा ध्यान दिया गया। हेनरी फुसेली और गिल्बर्ट इम्ले के साथ दो मनहूस मामलों, के बाद (वह एक बेटी, फैनी इम्ले था, जिनके द्वारा), वुलस्टोनक्राफ़्ट दार्शनिक विलियम गॉडविन, अराजकतावादी आंदोलन के पूर्वजों में से एक शादी कर ली। वुलस्टोनक्राफ़्ट कई अधूरा पांडुलिपियों पीछे छोड़ रहा है, ग्यारह दिन उसकी दूसरी बेटी को जन्म देने के बाद, 38 वर्ष की आयु में निधन हो गया। इस बेटी मेरी वुलस्टोनक्राफ़्ट गोडविन, मेरी शेली, फ्रेंकस्टीन के लेखक के रूप में एक निपुण लेखक खुद बन गया।
    वुलस्टोनक्राफ़्ट की मृत्यु के बाद उसके विधुर अनजाने में लगभग एक सदी के लिए उसकी प्रतिष्ठा को नष्ट कर दिया है, जो उसे अपरंपरागत जीवन शैली, खुलासा, उसके जीवन का एक संस्मरण (1798) प्रकाशित। हालांकि, बीसवीं सदी के मोड़ पर नारीवादी आंदोलन के उद्भव के साथ, महिलाओं की समानता और पारंपरिक स्त्रीत्व की आलोचनाओं का वुलस्टोनक्राफ़्ट की वकालत तेजी से महत्वपूर्ण बन गया। आज वुलस्टोनक्राफ़्ट संस्थापक नारीवादी दार्शनिकों में से एक के रूप में माना जाता है, और नारीवादियों अक्सर महत्वपूर्ण प्रभाव के रूप में अपने जीवन और काम दोनों को अदालत में तलब किया गया है

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  81. चार्ल्स सैंडर्स पियर्स Charles Sanders Peirce
    चार्ल्स सैंडर्स पियर्स अमेरिकी दार्शनिक , तर्कशास्त्री , गणितज्ञ , और वैज्ञानिक थे।

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  82. प्लोटिनस Plotinus

    प्लोटिनस एक प्रमुख हेलेनिस्टिक दार्शनिक थे जो रोमन मिस्र में रहते थे। एन्नोइड्स में वर्णित उनके दर्शन में, तीन सिद्धांत हैं: एक, बुद्धि और आत्मा। उनके शिक्षक अम्मोनियस सैकस थे, जो प्लेटोनिक परंपरा के थे।19 वीं शताब्दी के इतिहासकारों ने नियोप्लाटोनिज्म शब्द का आविष्कार किया और इसे प्लोटिनस और उनके दर्शन पर लागू किया, जो लेट एंटिकिटी और मध्य युग के दौरान प्रभावशाली था। प्लोटिनस के बारे में बहुत सी जीवनी संबंधी जानकारी पोर्फिरी की प्रस्तावना से प्लॉटिनस एननहेड्स के उनके संस्करण से मिलती है। उनकी आध्यात्मिक लेखनी ने सदियों से बुतपरस्त, यहूदी, ईसाई, ज्ञानी और इस्लामी तत्वमीमांसा और मनीषियों को प्रेरित किया है, जिसमें धर्मों के भीतर मुख्यधारा की सैद्धान्तिक अवधारणाओं को प्रभावित करने वाले उपदेश शामिल हैं, जैसे कि दो आध्यात्मिक अवस्थाओं में द्वैत पर उनका काम। यह अवधारणा यीशु की ईश्वर की धारणा के समान है, ईश्वर और मनुष्य दोनों, ईसाई धर्मशास्त्र में एक मौलिक विचार है।

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  83. एरिक बार्कर Eric Barker

    एरिक लेस्ली बार्कर (12 फरवरी 1912 - 1 जून 1990) एक अंग्रेजी हास्य अभिनेता थे। उन्हें लोकप्रिय ब्रिटिश कैरी ऑन फिल्मों में उनकी भूमिकाओं के लिए याद किया जाता है, हालांकि वे केवल श्रृंखला में शुरुआती फिल्मों में दिखाई दिए, इसके अलावा 1978 में कैरी ऑन इमैनुएल के लिए वापसी की।

    एरिक बार्कर का जन्म लंदन के थॉर्नटन हीथ में हुआ था, जो 20 फरवरी 1912 को तीन बच्चों में सबसे छोटा था। उन्हें क्रॉयडन, सरे में लाया गया था, और व्हिटगिफ्ट स्कूल में शिक्षित किया गया था। वह शहर में अपने पिता के पेपर व्यापारियों की कंपनी में शामिल हो गए, लेकिन लेखन पर पूरा ध्यान केंद्रित करना छोड़ दिया। उनका पहला उपन्यास द वॉच हंट तब प्रकाशित हुआ था जब वह अठारह वर्ष के थे। उन्होंने लघु कथाएँ और नाटक लिखे, बाद में खुद में प्रकट हुए और धीरे-धीरे मंच पर और रेडियो के लिए गीत, रिव्यू और स्केच लिखने और प्रदर्शन करने लगे।

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  84. जेनी यू-फॉन यांग एक अमेरिकी रसायनज्ञ हैं। वह कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, इरविन में रसायन विज्ञान की सहायक प्रोफेसर हैं, जहां वह अकार्बनिक रसायन विज्ञान, कैटेलिसिस और सौर ईंधन पर केंद्रित एक शोध समूह का नेतृत्व करती हैं। यांग कई पुरस्कारों के प्राप्तकर्ता हैं।

    जेनी यू-फॉन यांग का जन्म सैन फर्नांडो घाटी में हुआ था और इसका जन्म लॉस एंजेलिस के चैटस्वर्थ में हुआ था। वह दूसरी पीढ़ी की ताइवानी-अमेरिकी हैं। यांग ने 2001 में बर्कले में रसायन विज्ञान में स्नातक की डिग्री पूरी की और 2007 में मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से अकार्बनिक रसायन विज्ञान में उनके दर्शनशास्त्र के डॉक्टर थे।

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  85. शाह निमतुल्लाह वली, (फ़ारसी: شاه نعمتhالله ولی Shāh Ne'matullāh-i Valī), जिन्हें नेमतुल्लाह के नाम से भी जाना जाता है और 14 से 15 साल तक निमतुल्लाह एक फारसी सूफी मास्टर और कवि थे। वह सुन्नी इस्लाम द्वारा एक संत के रूप में और निमतुल्लाहि तारिक़ के रूप में पूजनीय हैं, जो उन्हें अपना संस्थापक मानते हैं।

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