तोरण किले का ऐतिहासिक महत्व यह है कि यह छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा कब्जा किया गया पहला किला था; इसके अलावा, यह मराठा साम्राज्य की नींव बना रहा है। समुद्र तल से 4600 फीट की ऊँचाई के साथ, यह पुणे के पास का सबसे ऊंचा किला भी है। हम इसी के साथ पुणे के सभी किलो के बारे में चर्चा कर रहे है आपको उनके बारे में भी जानना चाहिए।

  1. शनिवार वाड़ा

    शनिवार वाड़ा (अंग्रेजी :Shaniwarwada) (Śanivāravāḍā) भारत के महाराष्ट्र राज्य के पुणे ज़िले में स्थित एक दुर्ग है जिनका निर्माण १८वीं सदी में १७४६ में किया था। यह मराठा पेशवाओं की सीट थी। जब मराठाओं ने ईस्ट इंडिया कम्पनी से नियंत्रण खो दिया तो तीसरा आंग्ल-मराठा युद्ध हुआ था तब मराठों ने इसका निर्माण करवाया था। दुर्ग खुद को काफी हद तक एक अस्पष्टीकृत आग से १८३८ में नष्ट हो गया था, लेकिन जीवित संरचनाएंअब एक पर्यटक स्थल के रूप में स्थित है।
    मराठा साम्राज्य में पेशवा बाजीराव जो कि छत्रपति शाहु के प्रधान (पेशवा) थे इन्होंने ने ही शनिवार वाड़ा का निर्माण करवाया था। शनिवार वाड़ा का मराठी में मतलब शनिवार (शनिवार/Saturday) तथा वाड़ा का मतलब टीक होता है।
    शनिवार वाडा की नींव का काम १० जनवारी १७३० को शुरू हुआ। २२ जनवारी १७३२ को शनिवार वाडा की नींव करके वास्तुशांती की गई। १७३२ के बाद भी बाडे में हमेशा नया बांधकाम, बदल होते गए। बुरुज के दरवाजे का काम होते होते १७६० ये वर्ष आया।१८०८, १८१२, १८१३ इन वर्षों में छोटी बड़ी आग लगने की दुर्घटना हुई तो १७ नवंबर १८१७ को बाडेपर ब्रिटिशो के निशान लगे। इसके बाद यहाँ कुछ समय तक पुणे के पहिले कलेक्‍टर हेन्‍री डंडास रॉबर्टसन रहते थे। बाडे में तुरुंग, पंगुगृह, पुलिस का निवासस्थान थे। १८२८ में बाडे में बड़ी आग लगी और आग में अंदाजे सर्व इमारतॆ जल गई। आगे लगभग ९० साल बाद बाडे की दुरवस्था खत्म होने का योग आया। १९१९ में बाडा संरक्षित स्मारक घोषित किया गया और बाडे का उत्खनन करने का काम शुरू किया गया। उस समय बाडे में कोर्ट के लिए उपयोग में लाई जाने वाली इमारत १९२३ के पहले उत्खनन के लिए गिरा दी गई। शनिवारबाडे संबंधी अनेक घटना, दुर्घटना है। बाडेतील पेशवे के कार्यालय में अनेक वीर और मातब्बर राजकारण के दाव पेच रंगते थे। पेशवे का दरबार यही पर था।पेशवे के घर के लडके लडकियों का विवाह इसी बाडे में होता था। शनिवारबाडे के आगे के प्रांगण में सैनिको की सभा होने लगी। आचार्य अत्रे ने संयुक्त महाराष्ट्र का आंदोलन इसी प्रांगण सेे लढा़। बाडे के प्रांगण में मारुती का सभामंडप था। हे मंदिर लॉइड्ज पूल (हल्लीचा नवा पूल किंवा शिवाजी पूल) बांधने वाले केंजले ने बांधा. मंदिर में १९ मार्च १९२४ को मारुतीकी मूर्ती बिहार गई।

    Read More

    0 Votes
  2. राजगढ़ का किला

    Rajgad (literal meaning Ruling Fort) is a hill fort situated in the Pune district of Maharashtra, India. Formerly known as Murumdev, the fort was the capital of the Maratha Empire under the rule of Chhatrapati Shivaji for almost 26 years, after which the capital was moved to the Raigad Fort. Treasures discovered from an adjacent fort called Torna were used to completely build and fortify the Rajgad Fort.The Rajgad Fort is located around 60 km (37 mi) to the south-west of Pune and about 15 km (9.3 mi) west of Nasrapur in the Sahyadris range. The fort lies 1,376 m (4,514 ft) above the sea level. The diameter of the base of the fort was about 40 km (25 mi) which made it difficult to lay siege on it, which added to its strategic value. The fort's ruins consist of palaces, water cisterns, and caves. This fort was built on a hill called Murumbadevi Dongar (Mountain of the Goddess Murumba). Rajgad boasts of the highest number of days stayed by Chhatrapati Shivaji on any fort.

    Read More

    0 Votes
  3. तोरणा किला

    Torna Fort, also known as Prachandagad, is a large fort located in Pune district, in the Indian state of Maharashtra. It is historically significant because it was the first fort captured by Chatrapati Shivaji Maharaj in 1646, at the age of 16, forming the nucleus of the Maratha empire. The hill has an elevation of 1,403 metres (4,603 ft) above sea level, making it the highest hill-fort in the district. The name derives from Prachanda (Marathi for huge or massive) and gad (Marathi for fort).

    Read More

    0 Votes
  4. मल्हारगड

    Malhargad is a hill fort in western India near Saswad, 30 kilometres from Pune. It is also known as Sonori Fort due to the village of Sonori being situated at its base. The fort was named for the god Malhari and was the last fort built by the Marathas, about 1775.

    Read More

    0 Votes
  5. विसापुर किला

    Visapur Fort (also called Visapoor Fort) is a hill fort near Visapur village in MaharashtraIndia. It is a part of the Lohagad-Visapur fortification.

    Read More

    0 Votes
  6. पुरंदर का किला

    Purandar Fort is known as the birthplace of Chhatrapati Sambhaji Maharaj, the son of Chhatrapati Shivaji Maharaj. The fort is repeatedly mentioned in the rising of Shivaji Maharaj against the Adil Shahi Bijapur Sultanate and the Mughals. The fort of Purandhar stands at 4,472 ft (1,387 m) above the sea level in the Western Ghats, 50 km to the southeast of Pune.

    The twin forts of Purandar and Vajragad (or Rudramal) of which the latter is the smaller of the two, is located on the eastern side of the main fort. The village of Purandar takes its name from this fort.

    Read More

    0 Votes
  7. सिंहगढ़ का किला

    सिंहगढ़, सिंहगड, (अर्थ : सिंह का दुर्ग) ,भारत के महाराष्ट्र राज्य के पुणे ज़िले में स्थित एक पहाड़ी क्षेत्र पर स्थित एक दुर्ग है जो पुणे से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। दुर्ग को पहले कोंढाना के नाम से भी जाना जाता था। यह दुर्ग समुदतल से लगभग 4400 फूट ऊँचाई पर स्थित हेेै। सह्याद्री के पूर्व शाखा पर फैला भुलेश्वर की 'रांगेवर' यह दुर्ग बना है।दो सीढ़ियों जैसा दिखाई देनेवाला पहाडी सा भाग और दूरदर्शन के लिए खडा किया 'मनोरा' इस कारण पुणे से कही भी वो सबको आकर्षित करता है। पुरंदर, राजगड, तोरणा, लोहगड, विसापूर, तुंग ऐसा प्रचंड मुलुख इस दुर्ग से दिखाई देता है।
    किले का पहले का नाम 'कोंढाणा' है। पूरा किला आदिलशाही में था।दादोजी कोंडदेव ये आदिलशहा की ओर से सुभेदार पद पर चुने गए। आगे इ.स. 1647 में किलेपर अपना लष्करी केंद्र बनाया। आगे इ.स. 1649 में शहाजी राजा को छुड़ाने के लिए शिवाजी राजा ने यह किला फिर से आदिलशह को सुपुर्द किया। पुरंदर के तह में जो किले मुगल को दिए उसमें कोंडाना किला भी था। मुगलोंकी तरफ से उदेभान राठोड यह कोंडाना का अधिकारी था। यह राजपूत था पर बाद में मुसलमान बन गया था।
    शिवाजी महाराज का कालखंड में उनके विश्वास के सरदार और बालमित्र तानाजी मालुसरे और उनके मावले इस गाँव के सैनिकों ने (मावळ प्रांत से भरती हुए सैनिको का समूह) यह किला एक चढाई में जीता। इस लढाई में तानाजी को वीरमरण आया और प्राणो का बलीदान देकर किला जीता इसलिए शिवाजी महाराजा ने "गड आला पण सिंह गेला"(मतलब दुर्ग मिला पर सिंह गया) ये वाक्य उच्चारे थे । आगे उन्होंने कोंढाणा यह नाम बदलकर "सिंहगड" ऐसा नाम रखा। सिंहगड यह मुख्यतः तानाजी मालुसरे इनके बलिदान के कारण प्रसिद्ध है। सिंहगढ़ का युद्ध, देखें
    तानाजी मालुसरे नाम का हजारी सैनिक का था। उसने कबूल किया कि, 'कोंडाणा अपन लेंगे', ऐसा कबूल करके वस्त्रे, पान लेकर किले के यत्नास 500 आदमी लेकर किले के नीचे गया और दोनो सैनिक मर्दाने चुनकर रात को किले की दिवार पर चढाए। किले पर उदेभान रजपूत था। उसे पता चला कि गनिमाके लोग आए और ये खबर पता चलने पर कुल रजपूत कंबरकस्ता होकर, हाती तोहा बार लेकर, हिलाल (मशाल), चंद्रज्योती लगाकर बारासौ आदमी तोफवाले और तिरंदाज, बरचीवाले, चलकर आए, तब सैनिक लोगोने फौजपर रजपुत के भी चलकर आऐ, बडा युद्ध एक प्रहर हुआ। पाच सौ रजपूत मारे गए,उदेभान किल्लेदार खाशा की और तानाजी मालुसरा इनकी मुठभेड़ हुई। दोघे बड़े योद्धे, महशूर, एक एक से बढचढ पडे, तानाजीचे बाँए हाथ की ढाल टुटी, दूसरी ढाल समयास आई नहीं, फिर तानाजीने अपना बाँए हाथ की ढाल करके उसे खींच कर , दोनो महरागास भडके। दोनो की मौत हुई। फिर सूर्याजी मालुसरा (तानाजीचा भाई), इसने हिंमत कर के किला कुल लोग समेटते हुए बचे राजपूत मारे। किला काबीज किया।
    शिवाजी महाराज को दुर्ग जीतने की और तानाजी गिरने का समाचार मिला तब शिवाजी महाराज ने दुर्ग मिला पर सिंह गया एसा कहा।
    माघ वद्य नवमी दि. 4 फरवरी 1672 को यह युद्ध हुआ था।
    सिंहगड पर लगे फलक के अनुसार
    सिंहगड का नाम कोंढाणा, इसामी नाम के कवीने फुतुह्स्सलातीन या शाहनामा-इ-हिंद इस फार्शी काव्य में (इ. 1350) मुछ्म्द तुघलक ने इ.1628 में कुंधीयाना किले को लिया। उस समय यह किला नागनायक नाव के कोली के पास था।
    अहमदनगर के निजामशाही काल में कोंढाणा का उल्लेख इ.1482, 1553, 1554 व 1569 के समय के हैं इ.1635 के लगभग कोंढाणा पर सीडी अवर किलेदार थे मोगल व आदिलशाहा इऩ्होने मिलकर कोंढाणा लिया । इस समय(इ.1636) आदिलशाह का खजाना डोणज्याच्या खिंड में निजाम का सरदार मुधाजी मायदे ने लुटा।
    शहाजी राज्य के काल में सुभेदार दादोजी कोंडदेव मालवणकर इनके संरक्षण में कोंढाणा था ऐसा उल्लेख आदिलशाही फर्मानात है।
    दादोजी कोंडदेव आदिलशाही के नोकर थे फिर भी वो शहाजी राजा से एक निष्ठ थे।एकनिष्ठ होने के कारण शिवाजी राजा ने मृत्यूपर्यंत (इ.1647) कोंढाणा लेने का प्रयत्‍न नही किया। पर उनके बाद जल्द ही राजा ने यह दुर्ग अपने कब्जे में लिया।
    इतिहासकार श्री.ग.ह. खरे इनके मतानुसार तानाजी प्रसंग होने के पहले कोंढाणा का नाम 'सिहगड' किया गया इसके प्रमाण है। कै.ह.ना. आपटे इनके उपन्यास में तानाजी प्रसंग के बाद किले का नाम सिंहगड किया ऐसा उल्लेख है।
    शिवाजी राजा के समय और उसके बाद यह किला कभी मराठो के पास तो कभी मुगलाे के अधीन था।
    गडावरील ठिकाणे
    बारूद के कोठार: दरवाजे से अंदर आने पर जो पत्थरों की इमारत दिखती है वही ये बारूद के कोठार दि. 11 सितंबर 1751 में इन कोठारों पर बिजली गिरी इस दुर्घटना में उस समय दुर्ग पर स्थित फडणिस का घर उद्‌ध्वस्त हुआ और घर के सभी सदस्य मारे गए।
    टिलक बंगला : रामलाल नंदराम नाईक इनसे खरीदी गई जगह पर बने इस बंगलें में बाल गंगाधर तिलक आते रहते थे। 1915 साल में महात्मा गांधी और लोकमान्य तिलक इनकी मुलाकात इसी बंगले में हुई थी।
    कोंढाणेश्वर : यह मंदिर शंकरजी का है और वे यादव के कुलदैवता थे। अंदर एक पिंडी और सांब है और यह मंदिर यादवकालीन है।
    श्री अमृतेश्वर भैरव मंदिर' : कोंढाणेश्वर के मंदिर से थोडा आगे गए तो यह अमृतेश्वर का प्राचीन मंदिर लगता है। भैरव यह कोली लोगों के देवता है। यादवो के पहले इस दुर्ग पर कोली की बस्ती थी। मंदिर में भैरव व भैरवी ऐसी दो मूर्ती दिखती है। भैरव के हाथ में राक्षस की मुंडी है।
    देवटाके : तानाजी स्मारक के पीछे बाँए हाथ के छोटे तालाब के बाजू से बाई ओर जाने पर यह प्रसिद्ध ऐसा देवटाके लगता है। टंकी का उपयोग पीने के पानी के लिए किया जाता है और आज भी होता है। महात्मा गांधी जब पुणे आते थे तब जानकर इस टंकी का पानी पीने के लिए मंगाते थे।
    कल्याण दरवाजा : दुर्ग के पश्चिम दिशा की ओर यह दरवाजा है। कोंढण पूल पर से दुर्ग के शुरूवाती जगह से कल्याण गाव से ऊपर आने पर इस

    Read More

    0 Votes
  8. लोहगढ़ किला

    Lohagad ("Iron Fort") is one of the many hill forts of Maharashtra state in India. Situated close to the hill station Lonavala and 52 km (32 mi) northwest of Pune, Lohagad rises to an elevation of 1,033 m (3,389 ft) above sea level. The fort is connected to the neighboring Visapur fort by a small range. The fort was under the Maratha empire for the majority of the time, with a short period of 5 years under the Mughal empire.

    Read More

    0 Votes
  9. प्रतापगढ़ किला

    प्रतापगढ़ दुर्ग (या किला) महाराष्ट्र के सतारा जिले में सतारा शहर से 20 कि॰मी॰ दूरी पर स्थित है। यह मराठा शासक छत्रपती शिवाजी महाराज के अधिकार में था। उन्होंने इस किले को नीरा और कोयना नदियों की ओर से सुरक्षा बढ़ाने के उद्देश्य से बनवाया था। 1656 में किले का निर्माण पूर्ण हुआ था। उसी वर्ष 10 नवम्बर को इसी किले से शिवाजी और अफज़ल खान के बीच युद्ध हुआ था और इस युद्ध में शिवाजी को विजय प्राप्त हुई थी। इस जीत से मराठा साम्राज्य की हिम्मत को और बढ़ावा मिला था।

    दुर्ग समुद्री तल से 1000 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। किले में मां भवानी और शिव जी का मंदिर हैं।

    Read More

    0 Votes
  10. घनागढ़ का किला

    Ghangad is a fort situated near 30km from Lonavla-Khandala and 100 km from Pune in Maharashtra state, India.This fort is an important fort in the Pune district. The fort restoration is done by the Shivaji Trail group with the help of local villagers. The fort is at least 300 years old. Restoration work took place in 2011-12.

    Read More

    0 Votes
  11. कोरीगढ़ का किला

    Korigad (also called Koraigad, Koarigad or Kumwarigad) is a hill fort located about 20 km (12 mi) south of Lonavla in Pune district, Maharashtra, India. Its date of construction is not known but likely predates 1500. It is about 923 m above sea level. The planned township of Aamby Valley is built over the fort's southern and eastern foothills. The closest village is Peth Shahpur, about 1 km (0.62 mi) north of the fort.

    Read More

    0 Votes
  12. शिवनेरी किला

    शिवनेरी दुर्ग या शिवनेरी किला, भारत के महाराष्ट्र राज्य के पुणे के जुन्नर गांव के पास स्थित एक ऐतिहासिक किला है। शिवनेरी छत्रपति शिवाजी का जन्मस्थान भी है।
    शिवाजी के पिता, शाहजी बीजापुर के सुल्तान आदिल शाह की सेना में एक सेनापति थे। लगातार हो रहे युद्ध के कारण शाहजी, अपनी गर्भवती पत्नी जीजाबाई की सुरक्षा को लेकर चिंतित थे, इस लिए उन्होने अपने परिवार को शिवनेरी में भेज दिया। शिवनेरी चारों ओर से खड़ी चट्टानों से घिरा एक अभेद्य गढ़ था।
    शिवाजी का जन्म 19 फ़रवरी 1630 को हुआ था और उनका बचपन भी यहीं बीता। इस गढ़ के भीतर माता शिवाई का एक मन्दिर था, जिनके नाम पर शिवाजी का नाम रखा गया। किले के मध्य में एक सरोवर स्थित है जिसे "बादामी तालाब" कहते हैं। इसी सरोवर के दक्षिण में माता जीजाबाई और बाल शिवाजी की मूर्तियां स्थित हैं। किले में मीठे पानी के दो स्रोत हैं जिन्हें गंगा-जमुना कहते हैं और इनसे वर्ष भर पानी की आपूर्ति चालू रहती है।
    किले से दो किलोमीटर की दूरी पर लेन्याद्री गुफाएं स्थित हैं जहां अष्टविनायक का मन्दिर बना है।

    Read More

    0 Votes
अगर आपको इस सूची में कोई भी कमी दिखती है अथवा आप कोई नयी प्रविष्टि इस सूची में जोड़ना चाहते हैं तो कृपया नीचे दिए गए कमेन्ट बॉक्स में जरूर लिखें |