1. चित्तौड़गढ़ दुर्ग

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    चित्तौड़गढ़ दुर्ग Chittorgarh Fort
    चित्तौड़गढ़ दुर्ग भारत का सबसे विशाल दुर्ग है। यह राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में स्थित है जो भीलवाड़ा से कुछ किमी दक्षिण में है। यह एक विश्व विरासत स्थल है। चित्तौड़ मेवाड़ की राजधानी थी।

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  2. आमेर दुर्ग

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    आमेर दुर्ग Amer Fort
    आमेर दुर्ग भारत के राजस्थान राज्य की राजधानी जयपुर के आमेर क्षेत्र में एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित एक पर्वतीय दुर्ग है। यह जयपुर नगर का प्रधान पर्यटक आकर्षण है। आमेर का कस्बा मूल रूप से स्थानीय मीणाओं द्वारा बसाया गया था, जिस पर कालांतर में कछवाहा राजपूत मान सिंह प्रथम ने राज किया व इस दुर्ग का निर्माण करवाया। यह दुर्ग व महल अपने कलात्मक विशुद्ध हिन्दू वास्तु शैली के घटकों के लिये भी जाना जाता है। दुर्ग की विशाल प्राचीरों, द्वारों की शृंखलाओं एवं पत्थर के बने रास्तों से भरा ये दुर्ग पहाड़ी के ठीक नीचे बने मावठा सरोवर को देखता हुआ प्रतीत होता है।

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  3. लाल क़िला

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    लाल क़िला Red Fort
    लाल किला या लाल क़िला, दिल्ली के ऐतिहासिक, क़िलेबंद, पुरानी दिल्ली के इलाके में स्थित, लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है। यद्धपि यह किला काफी पुराना है और ईस किले को पाँचवे मुग़ल शासक शाहजहाँ ने अपनी राजधानी के रूप में चुना था। इस किले को "लाल किला", इसकी दीवारों के लाल-लाल रंग के कारण कहा जाता है। इस ऐतिहासिक किले को वर्ष 2007 में युनेस्को द्वारा एक विश्व धरोहर स्थल चयनित किया गया था।

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  4. भुजिया फोर्ट

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    भुजिया फोर्ट Bhujia Fort
    भुजिया किला, जिसे भुजिया किला भी कहा जाता है, भारत के कच्छ जिले में भुज शहर के बाहरी इलाके में स्थित एक किला है। किले को भुजिया पहाड़ी के ऊपर बनाया गया है।

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  5. चित्रदुर्ग किला

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    चित्रदुर्ग किला Chitradurga Fort
    चित्रदुर्ग, कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिले में स्थित एक दुर्ग है।

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  6. बेकल किला

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    बेकल किला Bekal Fort
    बेकल किले को 1650 ईस्वी में केलदी के शिवप्पा नायक ने बेकल में बनवाया था। यह 40 एकड़ में फैला केरल का सबसे बड़ा किला है।

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  7. बीदर का किला

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    बीदर का किला Bidar Fort
    'बीदर का किला दक्षिणी कर्नाटक के बीदर में स्थित है। बहमनी वंश के शासक अल्ला उद्दीन बहमन ने 1427 में अपनी राजधानी गुलबर्गा से बीदर कर लिया और इस किले तथा अन्य भवनों का निर्माण कराया।

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  8. दौलताबाद का किला

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    दौलताबाद का किला Daulatabad Fort
    दौलताबाद किला, जिसे देवगिरी या देवगिरी के नाम से भी जाना जाता है, औरंगाबाद, महाराष्ट्र, भारत में स्थित एक ऐतिहासिक गढ़ है। कुछ समय के लिए दिल्ली सल्तनत की राजधानी और बाद में अहमदनगर सल्तनत की एक माध्यमिक राजधानी के रूप में यह यादव वंश की राजधानी थी।

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  9. ग्वालियर का क़िला

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    ग्वालियर का क़िला Gwalior Fort
    ग्वालियर दुर्ग ग्वालियर शहर का प्रमुखतम स्मारक है। ग्वालियर दुर्ग का निर्माण कछवाहशासक सूरजसेन ने किया बघेलशासकों ने ग्वालियर पर लगभग 600 से 700 साल तक शासन किया। यह किला 'गोपाचल' नामक पर्वत पर स्थित है। किले के पहले राजा का नाम सूरज सेन था, जिनके नाम का प्राचीन 'सूरज कुण्ड' किले पर स्थित है। इसका निर्माण 93वीं शताब्दी में राजा मान सिंह तोमर ने मान मंदिर महल का निर्माण करवाया। भिन्न कालखण्डों में इस पर विभिन्न शासकों का नियन्त्रण रहा। गुजरी महल का निर्माण रानी मृगनयनी के लिए राया ।

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  10. कुम्भलगढ़ दुर्ग

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    कुम्भलगढ़ दुर्ग Kumbhalgarh Fort
    कुम्भलगढ़ का दुर्ग राजस्थान के राजसमंद जिले में स्थित है। निर्माण कार्य पूर्ण होने पर महाराणा कुम्भा ने सिक्के डलवाये जिन पर दुर्ग और उसका नाम अंकित था। वास्तुशास्त्र के नियमानुसार बने इस दुर्ग में प्रवेश द्वार, प्राचीर, जलाशय, बाहर जाने के लिए संकटकालीन द्वार, महल, मंदिर, आवासीय इमारतें, यज्ञ वेदी, स्तम्भ, छत्रियां आदि बने है।

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  11. गोलकुंडा किला

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    गोलकुंडा किला Golconda Fort
    गोलकुंडा या गोलकोण्डा दक्षिणी भारत में, हैदराबाद नगर से पाँच मील पश्चिम स्थित एक दुर्ग तथा ध्वस्त नगर है। पूर्वकाल में यह कुतबशाही राज्य में मिलनेवाले हीरे-जवाहरातों के लिये प्रसिद्ध था।

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  12. नाहरगढ़ दुर्ग

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    नाहरगढ़ दुर्ग Nahargarh Fort
    नाहरगढ़ का किला जयपुर को घेरे हुए अरावली पर्वतमाला के ऊपर बना हुआ है। आरावली की पर्वत श्रृंखला के छोर पर आमेर की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इस किले को सवाई राजा जयसिंह द्वितीय ने सन 1734 में बनवाया था। यहाँ एक किंवदंती है कि कोई एक नाहर सिंह नामके राजपूत की प्रेतात्मा वहां भटका करती थी। किले के निर्माण में व्यावधान भी उपस्थित किया करती थी। अतः तांत्रिकों से सलाह ली गयी और उस किले को उस प्रेतात्मा के नाम पर नाहरगढ़ रखने से प्रेतबाधा दूर हो गयी थी।

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  13. मुरुड जंजीरा किला

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    मुरुड जंजीरा किला Murud Janjira Fort
    मुरुद-जंजीरा भारत के महाराष्ट्र राज्य के रायगड जिले के तटीय गाँव मुरुड में स्थित एक किला हैं। जंजिरा किला पर्यटन के लिए काफी प्रसिद्ध है। यह भारत के पश्चिमी तट का एक मात्र किला हैं, जो की कभी भी जीता नही
    जा सका था। यह किला 350 वर्ष पुराना है। स्‍थानीय लोग इसे अजेय किला कहते हैं, जिसका शाब्दिक अर्थ अजेय होता है। माना जाता है कि यह किला पंच पीर पंजातन शाह बांडया बाबा के संरक्षण में है। शाह बाबा का मकबरा भी इसी किले में है। यह किला समुद्र तल से 90 फीट ऊंचा है। इसकी नींव 20 फीट गहरी है। यह किला सिद्दी जौहर द्वारा बनवाया गया था। इस किले का निर्माण 22 वर्षों में हुआ था। यह किला 22 एकड़ में फैला हुआ है। इसमें 22 सुरक्षा चौकियां है। ब्रिटिश, पुर्तगाली, शिवाजी महाराज , कान्‍होजी आंग्रे, चिम्‍माजी अप्‍पा तथा संभाजी महाराजने इस किले को जीतने का काफी प्रयास किया था, लेकिन कोई सफल नहीं हो सका। इस किले में सिद्दिकी शासकों की कई तोपें अभी भी रखी हुई हैं।
    जंजीरा का किला जाने के लिए ऑटोरिक्‍शा से मुरुड से राजपुरी जाना होता है। यहां से नाव द्वारा जंजीरा का किला जाया जा सकता है। एक व्‍यक्‍ित का नाव का किराया 20 रु. है।
    समय: सुबह 7 बजे से शाम 6 से 7 के बीच। यह किला शुक्रवार को दोपहर से 2 बजे तक बंद रहता है।
    इतिहास
    जंजिरा यह शब्द अरबी भाषा से अपने यहॉ रुढ हुआ है। अरबी भाषा में जंजिरा इस शब्द से वो आया है। जंजिरा मतलब बंदरगाह। इस बंदरगाह पर पहले एक मेढेकोट था। उस समय राजपुरी में मुख्यतः कोली लोगोंकी बस्ती थी। इन कोली लोगों को लुटेरे और चाचे लोगों की हमेशा ही परेशानी होती थी। तब इन चाचों की परेशानी पर प्रतिबंध करने के लिए इस बंदरगाह पर मेढेकोट बनाया गया है।मेढेकोट मतलब लकडी के बडे 'ओंडके'(बुंदा)एक के पास एक गाडकर तयार की हुई तटबंदी। इस तटबंदी में कोली लोग सुरक्षित रहते थे। उस समय उनका प्रमुख थे राम पाटील । इस मेढेकोट बनाने के लिए उस समय निजामी ठाणेदार की सहमति लेनी पडी थी। मेढेकोटा की सुरक्षितता मिलते ही राम पाटील उस ठाणेदार की बात सुनता न था इसलिए ठाणेदार ने उसका बंदोबस्त करने के लिए पिरमखानाची नियुक्ती की।
    राम पाटील अपने को मेढेकोटा के पास आने नहीं देगा इसकी कल्पना पिरमरखान को थी। वह बहुत चतुर था।उसने स्वयं को शराब काे व्यापारी बताया और अपनी गलबते खाडी में लगाई। राम पाटील से स्नेहवत संबंध रहे इसलिए शराब की कुछ टंकिया उन्हें भेट भेजी इस कारण राम पाटील खूप खुश हुए। पिरमखान ने मेढेकोट देखने की इच्छा व्यक्त की। पिरमखान मेढेकोट गए। रात् को सब कोली दारू पिकर झूम रहे थे तभी पिरमखान ने बाकी की जगह के अपने सैनिक बुलाकर मेढेकोट के सब लोगों की कत्तल करके मेढेकोट अपने हाथों लिया।
    इसके बाद पिरमखान की जगह बुर्‍हानखान की नियुक्ती हुई । उसने वहीं पर भक्कम दुर्ग बनाने की इजाजत निजाम से ली और अभी जो दुर्ग है वह बुर्‍हाणखान ने ही बांधा हुआ है। आगे इ.स.1617 में सिद्दी अंबर ने बादशह से जहागिरी प्राप्त की। जंजिरा संस्था का यह मुख्य पुरुष समझा जाता है।
    जंजिऱा का पुरातन झंडा
    जंजिरा के सिद्दी यह अबिसीनिया के थे वे दर्यावर्दी, शूर थे।उन्होंने प्राणपण से जंजिरा की लडाई की अनेकाें ने जंजिरा जीतने का प्रयत्‍न किया परंतु कोई कभी भी सफल हो सका नही। छत्रपती शिवाजी राजा भी जंजिरा पर स्वामित्व नही प्राप्त कर सके। इ.स.1617 से इ.स.1947 ऐसे 330 वर्ष जंजिरा अंजिक्य रहा। जंजिरा का प्रवेशद्वार पूर्वाभिमुख है। होडी से किले के प्रवेश द्वार तक पहुँचने का एक प्रवेशद्वार एक उपदार है। प्रवेशद्वार के पास एक शिल्प है। बुर्‍हाणखान की दर्पोक्तीच इस चित्र में दिखाई देती है।
    एक शेर ने चारों पाव में चार हाथी पकडे है और पूँछ में एक हाथी पकडा है ऐसा यह चित्र है। बुर्‍हाणखान अन्य सत्ताधारियों को सुझाव देते है कि "तुम हाथी हो तो मैं भी शेर हूँ। "इस किले की ओर बुरी नजर से देखने की हिम्मत न करें। "
    इस किले का सिद्दी सरदाराें ने यह किला हमेशा अजेय रखा। संभाजी महाराज ने तो यह किला हस्तगत करने के लिए इस किले के नजीक पाच छ: किलोमीटर अंतर पर पद्मदुर्ग नाम का मजबूत किला बनाया था। पर फिर भी मुरुड का जंजिरा जीतना महाराज को असंभव ही रहा।
    किले की अवस्था
    जंजिरे की तटबंदी बुलंद है। उसे सागर की ओर एक दरवाजा है। ऐसे 19 बुलंद बुरूज है। दो बुरुज में अंतर 90 फुट से जास्त है। तटबंदी पर जाने के लिए जगह- जगह सीढियॉ है। तटबंदी में कमान है। उस कमान में मुँह करके तोफ रखी गई है। जंजिरा पर 514 तोफा होने का उल्लेख है। उसमें से कलालबांगडी, लांडाकासम और चावरी ये तोफे आज भी देखने को मिलती है।
    किले के मध्यभाग में सुरुलखाना का भव्य बाडा आज जर्जर अवस्था में है। पानी के दो बडे़ तालाब है। किले में पहले तीन मोहल्ले थे। इसमें दो मोहल्ले मुसलमान के और एक अन्य लोगों के थे। पहले किले में बडी बस्ती थी।

    राजाश्रय समाप्त होने पर वो सर्व बस्ती वहॉ से उठ गई।
    जंजिरे की तटबंदी से विस्तृत प्रदेश दिखता है। इसमें समुद्र में बांधा कासा उर्फ पद्मदुर्ग और किनारे पर सामराजगड यह भी यहॉ से येथून दिखता है। 330 वर्ष अभेद्य और अंजिक्य रहा जंजिरे का मेहरुब देखने का इतिहास के अनेक पर्व का आलेख सबकी नजर के सामने से जाता है। थोडा इतिहास का अभ्यास किया तो जंजिरे को भेट देना निश्चित रूप से संस्मरणीय रहेगा।
    ऐसा हा अजेय जंजिरा, 20 सिद्दी सत्ताधीश के बाद आए सिद्दी मुहमंदखान यह आखरी सिद्दी थे, और उस राज्य की स्थापना के बाद 330 वर्ष बाद मतलब 3 एप्रिल 1948 को वो राज्य भारतीय संघराज्य में विलीन हुआ।
    हे सुद्धा पहा
    जंजिरा (पुस्तक)
    बाह्य दुवे
    मुरुड जंजिरा किल्ला

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  14. श्रीरंगपटना फोर्ट

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    श्रीरंगपटना फोर्ट Srirangapatna Fort
    श्रीरंगपटना किला एक ऐतिहासिक किला है जो दक्षिण भारतीय राज्य कर्नाटक के ऐतिहासिक राजधानी श्रीरंगपट्टनम में स्थित है। 1454 में टिममनना नायक द्वारा निर्मित।

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  15. लेह पैलेस

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    लेह पैलेस Leh Palace
    लेह पैलेस एक पूर्व शाही महल है जो भारतीय हिमालय में लेह शहर, लद्दाख से दिखता है। इसका निर्माण सन् 1600 में सेंगे नामग्याल ने करवाया था। 19 वीं शताब्दी के मध्य में डोगरा सेना ने लद्दाख पर अधिकार कर लिया और शाही परिवार को स्टोक पैलेस में जाने के लिए मजबूर कर दिया।

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  16. उपरकोट फोर्ट

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    उपरकोट फोर्ट Uparkot Fort
    उपरकोट जूनागढ़, गुजरात, भारत के पूर्व में स्थित एक किला है।

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  17. जयगढ़ दुर्ग

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    जयगढ़ दुर्ग Jaigarh Fort
    जयगढ़ दुर्ग भारत के पश्चिमी राज्य राजस्थान की राजधानी जयपुर में अरावली पर्वतमाला में चील का टीला पर आमेर दुर्ग एवं मावता झील के ऊपरी ओर बना किला है। इस दुर्ग का निर्माण मिर्जा राजा जयसिंह ने 1667 ई. में आमेर दुर्ग एवं महल परिसर की सुरक्षा हेतु करवाया था और इसका नाम उन्हीं के नाम पर रखा गया है।

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  18. कांगड़ा दुर्ग

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    कांगड़ा दुर्ग Kangra Fort
    कांगड़ा दुर्ग हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा कस्बे के बाहरी सेमा में फैला हुआ एक प्राचीन दुर्ग है। इस दुर्ग का उल्लेख सिकन्दर महान के युद्ध सम्बन्धी रिकार्डों में प्राप्त होता है जिससे इसके इसापूर्व चौथी शताब्दी में विद्यमान होना सिद्ध होता है। कांगड़ा, धर्मशाला से 20 किमी दूर है।

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  19. रायगढ़

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    रायगढ़ Raigad Fort
    रायगढ़ दुर्ग, महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के महाड में पहाड़ी पर स्थित प्रसिद्ध दुर्ग है। इसे छत्रपति शिवाजी ने बनवाया था और 1674 में इसे अपनी राजधानी बनाया।

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  20. रणथम्भोर दुर्ग

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    रणथम्भोर दुर्ग Ranthambore Fort
    रणथंभोर दुर्ग दिल्ली-मुंबई रेल मार्ग के सवाई माधोपुर रेल्वे स्टेशन से 13 कि॰मी॰ दूर रन और थंभ नाम की पहाडियों के बीच समुद्रतल से 481 मीटर ऊंचाई पर 12 कि॰मी॰ की परिधि में बना एक दुर्ग है। दुर्ग के तीनो और पहाडों में प्राकृतिक खाई बनी है जो इस किले की सुरक्षा को मजबूत कर अजेय बनाती है। यूनेस्को की विरासत संबंधी वैश्विक समिति की 36वीं बैठक में 21 जून 2013 को रणथंभोर को विश्व धरोहर घोषित किया गया। यह राजस्थान का एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है।

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  21. जैसलमेर दुर्ग

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    जैसलमेर दुर्ग Jaisalmer Fort
    जैसलमेर दुर्ग स्थापत्य कला की दृष्टि से उच्चकोटि की विशुद्ध स्थानीय दुर्ग रचना है। ये दुर्ग 250 फीट तिकोनाकार पहाडी पर स्थित है। इस पहाडी की लंबाई 150 फीट व चौडाई 750 फीट है।

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  22. झांसी का किला

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    झांसी का किला Jhansi Fort
    उत्तर प्रदेश राज्य के झाँसी में बंगरा नामक पहाड़ी पर 1613 इस्वी में यह दुर्ग ओरछा के बुन्देल राजा बीरसिंह जुदेव ने बनवाया था। 25 वर्षों तक बुंदेलों ने यहाँ राज्य किया उसके बाद इस दुर्ग पर क्रमश मुगलों, मराठों और अंग्रजों का अधिकार रहा। मराठा शासक नारुशंकर ने 1729-30 में इस दुर्ग में कई परिवर्तन किये जिससे यह परिवर्धित क्षेत्र शंकरगढ़ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में इसे अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ।

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  23. सिंधुदुर्ग

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    सिंधुदुर्ग Sindhudurg Fort
    सिंधुदुर्ग, शिवाजी द्वारा सन 1664 में महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग जिले के मालवन तालुका के समुद्र तट से कुछ दूर अरब सागर में एक द्वीप पर निर्मित एक नौसैनिक महत्व के किले का नाम है। यह मुंबई के दक्षिण में महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में स्थित है।

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  24. विजयदुर्ग किला

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    विजयदुर्ग किला Vijaydurg Fort
    विजयदुर्ग, सिंधुदुर्ग तट पर सबसे पुराना किला, शिलाहर वंश के राजा भोज द्वितीय के शासनकाल के दौरान और शिवाजी द्वारा पुनर्गठन किया गया था। इससे पहले, किले में 5 एकड़ का क्षेत्र शामिल था और चारों तरफ से समुद्र से घिरा हुआ था।

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  25. लोहागढ़ किला

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    लोहागढ़ किला Lohagarh Fort
    लोहागढ़ दुर्ग एक दुर्ग अथवा एक किला है जो भारतीय राज्य राजस्थान के भरतपुर जिले में स्थित है। दुर्ग का निर्माण भरतपुर के जाट वंश के(जाटो का प्लेटो अथार्त जाटों का अफलातून) तब कुंवर महाराजा सूरजमल ने 19 फरवरी 1733 ई. में करवाया था, जो सोघर के निकट निर्मित हैं।
    यह भारत का एकमात्र अजेय दुर्ग हैं। अतः इसको अजय गढ़ का दुर्ग भी कहते हैं।
    इसके चारों ओर मिट्टी की दोहरी प्राचीर बनी हैं। अतः इसको मिट्टी का दुर्ग भी कहते हैं।
    किले के चारों ओर एक गहरी खाई हैं, जिसमें मोती झील से सुजानगंगा नहर द्वारा पानी लाया गया हैं।
    इस किले में दो दरवाजे हैं। इनमें उत्तरी द्वार अष्टधातु का बना है, जिसे जवाहर सिंह जाट 1765 ई. में दिल्ली विजय के दौरान लाल किले से उतारकर लाएँ थे।
    दीवाने खास के रूप में प्रयुक्त कचहरी कला का उदाहरण हैं।
    भरतपुर राज्य के जाट राजवंश के राजाओ का राज्यभिषेक जवाहर बुर्ज में होता था।
    इस किले पर कई आक्रमण हुए हैं, लेकिन इसे कोई भी नहीं जीत पाया। इस पर कई पड़ोसी राज्यों, मुस्लिम आक्रमणकारियों तथा अंग्रेजो ने आक्रमण किया, लेकिन सभी असफल रहे।
    1803 ई. में लार्ड लेक ने बारूद भरकर इसे उड़ाने का असफल प्रयास किया था।
    यहां पर फतेह बुर्ज का निर्माण ब्रिटिश सेना पर विजय को चिरस्थायी बनाने के लिए करवाया गया था।

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  26. जूनागढ़ दुर्ग

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    जूनागढ़ दुर्ग Junagarh Fort
    जूनागढ़ दुर्ग, राजस्थान के बीकानेर में स्थित है। मूलतः इसका नाम चिन्तामणि था। यह राजस्थान के उन मुख्य दुर्गों में से एक है जो पहाड़ी पर नहीं बने हैं।

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  27. शनिवार वाड़ा

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    शनिवार वाड़ा   Shaniwar Wada
    शनिवार वाड़ा (अंग्रेजी :Shaniwarwada) (Śanivāravāḍā) भारत के महाराष्ट्र राज्य के पुणे ज़िले में स्थित एक दुर्ग है जिनका निर्माण १८वीं सदी में १७४६ में किया था। यह मराठा पेशवाओं की सीट थी। जब मराठाओं ने ईस्ट इंडिया कम्पनी से नियंत्रण खो दिया तो तीसरा आंग्ल-मराठा युद्ध हुआ था तब मराठों ने इसका निर्माण करवाया था। दुर्ग खुद को काफी हद तक एक अस्पष्टीकृत आग से १८३८ में नष्ट हो गया था, लेकिन जीवित संरचनाएंअब एक पर्यटक स्थल के रूप में स्थित है।
    मराठा साम्राज्य में पेशवा बाजीराव जो कि छत्रपति शाहु के प्रधान (पेशवा) थे इन्होंने ने ही शनिवार वाड़ा का निर्माण करवाया था। शनिवार वाड़ा का मराठी में मतलब शनिवार (शनिवार/Saturday) तथा वाड़ा का मतलब टीक होता है।
    शनिवार वाडा की नींव का काम १० जनवारी १७३० को शुरू हुआ। २२ जनवारी १७३२ को शनिवार वाडा की नींव करके वास्तुशांती की गई। १७३२ के बाद भी बाडे में हमेशा नया बांधकाम, बदल होते गए। बुरुज के दरवाजे का काम होते होते १७६० ये वर्ष आया।१८०८, १८१२, १८१३ इन वर्षों में छोटी बड़ी आग लगने की दुर्घटना हुई तो १७ नवंबर १८१७ को बाडेपर ब्रिटिशो के निशान लगे। इसके बाद यहाँ कुछ समय तक पुणे के पहिले कलेक्‍टर हेन्‍री डंडास रॉबर्टसन रहते थे। बाडे में तुरुंग, पंगुगृह, पुलिस का निवासस्थान थे। १८२८ में बाडे में बड़ी आग लगी और आग में अंदाजे सर्व इमारतॆ जल गई। आगे लगभग ९० साल बाद बाडे की दुरवस्था खत्म होने का योग आया। १९१९ में बाडा संरक्षित स्मारक घोषित किया गया और बाडे का उत्खनन करने का काम शुरू किया गया। उस समय बाडे में कोर्ट के लिए उपयोग में लाई जाने वाली इमारत १९२३ के पहले उत्खनन के लिए गिरा दी गई। शनिवारबाडे संबंधी अनेक घटना, दुर्घटना है। बाडेतील पेशवे के कार्यालय में अनेक वीर और मातब्बर राजकारण के दाव पेच रंगते थे। पेशवे का दरबार यही पर था।पेशवे के घर के लडके लडकियों का विवाह इसी बाडे में होता था। शनिवारबाडे के आगे के प्रांगण में सैनिको की सभा होने लगी। आचार्य अत्रे ने संयुक्त महाराष्ट्र का आंदोलन इसी प्रांगण सेे लढा़। बाडे के प्रांगण में मारुती का सभामंडप था। हे मंदिर लॉइड्ज पूल (हल्लीचा नवा पूल किंवा शिवाजी पूल) बांधने वाले केंजले ने बांधा. मंदिर में १९ मार्च १९२४ को मारुतीकी मूर्ती बिहार गई।

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  28. नीमराना फोर्ट

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    नीमराना फोर्ट Neemrana Fort
    नीमराना (वास्तविक उच्चारण :नीमराणा) भारत के राजस्थान प्रदेश के अलवर जिले का एक प्राचीन ऐतिहासिक शहर है, जो नीमराना तहसील में दिल्ली-जयपुर राजमार्ग पर दिल्ली से 122 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह 1947 तक चौहानों द्वारा शासित 14 वीं सदी के पहाड़ी किले का स्थल है। नीमराना के अंतिम राजा राजेन्द्र सिंह ने महल पर तिरंगा फहराया यह क्षेत्र राठ के नाम से जाना जाता है कहावत है काठ नवे पर राठ नवे ना , जो इसके अंतिम शासक है और उन्होंने प्रीवी पर्स के उन्मूलन के बाद किले के रखरखाव में असमर्थ होने के कारण इसे नीमराना होटल्स नामक एक समूह को बेच दिया, जिसे इसने एक हेरिटेज (विरासत) होटल में बदल दिया. नीमराना से कुछ दूरी पर अलवर जिले में एक दूसरा किला केसरोली है, जो सबसे पुराने विरासत स्थलों में से एक है। इतिहासकार इसे महाभारत काल का मत्स्य जनपद बताते हैं। केसरोली में कोई विराटनगर के बौद्ध विहार के सबसे पुराने अवशेष देख सकता है, जहां पांडवों ने भेष बदलकर अपने निर्वासन के अंतिम वर्ष बिताये थे, जहां के पांडुपोल में हनुमान की लेटी हुई प्रतिमा, पुराने जलाशयों के अलावा संत शासक भर्तृहरि और तालवृक्ष की समाधियां हैं।
    यह किला दुर्लभ, काले हार्नस्टोन ब्रेकिया पत्थरों पर स्थित है और इसके प्राचीर से हरे-भरे खेतों के आकर्षक दृश्य दिखते हैं, जो 50-65 मीटर ऊंचा है। केसरोली किले का मूल पीछे की ओर छठी सदी में खोजा जा सकता है। यह भगवान कृष्ण के वंशज यादवों द्वारा निर्मित होने के कारण प्रसिद्ध है, जो 14 वीं सदी के मध्य में इस्लाम धर्म में परिवर्तित हो गये और उन्हें खानजादा कहा जाने लगा. यह विभिन्न लोगों के कब्जे में रहा, जैसे पहले मुगलों ने इस पर विजय हासिल की और 1975 में राजपूतों के हाथों में आने के पहले यह जाटों के कब्जे में रहा, जब अलवर राजघराने की स्थापना हुई.

    यह रिको औद्योगिक भी क्षेत्र का घर भी है।

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  29. पालक्कड़ दुर्ग

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    पालक्कड़ दुर्ग Palakkad Fort
    पलक्कड़ किला केरल राज्य के पालक्कड़ जिले में स्थित राज्य के सबसे अच्छे संरक्षित किलों में से एक है। इतिहासकारों के अनुसार पलक्कड़ का राजा कोज़ीकोड़ के शासक ज़मोरीन का हितैषी हुआ करता था। 18वीं शताब्दी के आरम्भ में उन्होंने ज़मोरिन से अलग होने का निर्णय लिया और स्वतंत्र हो गए। तब ज़मोरीन ने पलक्कड़ पर आक्रमण किया जिससे बचने हेतु सहायता मांगने के लिए हैदर अली के पास आए। तब हैदर अली मौके का लाभ उठाया और उस सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान को इस सहायता के एवज में स्वयं अधिकृत कर लिया। इसके बाद 1766 में हैदर अली ने इसका पुनर्निर्माण भी करवाया। 1784 में ग्यारह दिनों के युद्ध के बाद किले को कर्नल फुलरटन के मातहत सेना द्वारा ब्रिटिश अधिकार में ले लिया गया। इसके बाद कोज़िकोड के ज़मोरीन के सैनिकों ने किले पर आक्रमण कर उसे अपने अधिकार में ले लिया कब्ज़ा कर लिया, किन्तु 1790 में अंग्रेजों ने इसे पुनः ले लिया और फिर से किले को पुनर्निर्मित किया। टीपू सुल्तान ने 1799 में अंग्रेजों के साथ एक मुठभेड़ में वीरगति पायी और तभी से उसके नाम पर जाना जाने लगा।

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  30. राजगढ़ का किला

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    राजगढ़ का किला  Rajgad Fort
    राजगढ़ भारत के महाराष्ट्र में पुणे जिले में स्थित एक पहाड़ी किला है। पूर्व में मुरुमदेव के रूप में जाना जाता था, किला लगभग 26 वर्षों तक शिवाजी के शासन में मराठा साम्राज्य की राजधानी थी, जिसके बाद राजधानी को रायगढ़ किले में स्थानांतरित कर दिया गया था।

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  31. तोरणा किला

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    तोरणा किला  Torna Fort
    तोरणा किला, जिसे प्रचंडगढ़ के नाम से भी जाना जाता है, भारत के महाराष्ट्र राज्य में पुणे जिले में स्थित एक बड़ा किला है। यह ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह 1646 में छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा 16 वर्ष की आयु में मराठा साम्राज्य के नाभिक का निर्माण करने वाला पहला किला था।

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  32. मल्हारगड

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    मल्हारगड  Malhargad

    मल्हारगढ़ पश्चिमी भारत में एक पहाड़ी किला है जो पुणे से 30 किलोमीटर की दूरी पर सासवड के पास है। इसके आधार पर सोनोरी गांव स्थित होने के कारण इसे सोनोरी किला के नाम से भी जाना जाता है। किले का नाम भगवान मल्हारी के लिए रखा गया था और मराठों द्वारा लगभग 1775 में बनाया गया आखिरी किला था।

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  33. पुरंदर का किला

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    पुरंदर का किला Purandar Fort

    पुरंदर किला को शिवाजी के पुत्र संभाजी के जन्मस्थान के रूप में जाना जाता है। किले का बार-बार आदिल शाही बीजापुर सल्तनत और मुगलों के खिलाफ शिवाजी के उदय में उल्लेख किया गया है। पुरंधर का किला पुणे के दक्षिण-पूर्व में 50 किमी दूर पश्चिमी घाट में समुद्र तल से 4,472 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।

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  34. सिंहगढ़ का किला

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    सिंहगढ़ का किला Sinhagad Fort
    सिंहगढ़, सिंहगड, (अर्थ : सिंह का दुर्ग) ,भारत के महाराष्ट्र राज्य के पुणे ज़िले में स्थित एक पहाड़ी क्षेत्र पर स्थित एक दुर्ग है जो पुणे से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। दुर्ग को पहले कोंढाना के नाम से भी जाना जाता था। यह दुर्ग समुदतल से लगभग 4400 फूट ऊँचाई पर स्थित हेेै। सह्याद्री के पूर्व शाखा पर फैला भुलेश्वर की 'रांगेवर' यह दुर्ग बना है।दो सीढ़ियों जैसा दिखाई देनेवाला पहाडी सा भाग और दूरदर्शन के लिए खडा किया 'मनोरा' इस कारण पुणे से कही भी वो सबको आकर्षित करता है। पुरंदर, राजगड, तोरणा, लोहगड, विसापूर, तुंग ऐसा प्रचंड मुलुख इस दुर्ग से दिखाई देता है।
    किले का पहले का नाम 'कोंढाणा' है। पूरा किला आदिलशाही में था।दादोजी कोंडदेव ये आदिलशहा की ओर से सुभेदार पद पर चुने गए। आगे इ.स. 1647 में किलेपर अपना लष्करी केंद्र बनाया। आगे इ.स. 1649 में शहाजी राजा को छुड़ाने के लिए शिवाजी राजा ने यह किला फिर से आदिलशह को सुपुर्द किया। पुरंदर के तह में जो किले मुगल को दिए उसमें कोंडाना किला भी था। मुगलोंकी तरफ से उदेभान राठोड यह कोंडाना का अधिकारी था। यह राजपूत था पर बाद में मुसलमान बन गया था।
    शिवाजी महाराज का कालखंड में उनके विश्वास के सरदार और बालमित्र तानाजी मालुसरे और उनके मावले इस गाँव के सैनिकों ने (मावळ प्रांत से भरती हुए सैनिको का समूह) यह किला एक चढाई में जीता। इस लढाई में तानाजी को वीरमरण आया और प्राणो का बलीदान देकर किला जीता इसलिए शिवाजी महाराजा ने "गड आला पण सिंह गेला"(मतलब दुर्ग मिला पर सिंह गया) ये वाक्य उच्चारे थे । आगे उन्होंने कोंढाणा यह नाम बदलकर "सिंहगड" ऐसा नाम रखा। सिंहगड यह मुख्यतः तानाजी मालुसरे इनके बलिदान के कारण प्रसिद्ध है। सिंहगढ़ का युद्ध, देखें
    तानाजी मालुसरे नाम का हजारी सैनिक का था। उसने कबूल किया कि, 'कोंडाणा अपन लेंगे', ऐसा कबूल करके वस्त्रे, पान लेकर किले के यत्नास 500 आदमी लेकर किले के नीचे गया और दोनो सैनिक मर्दाने चुनकर रात को किले की दिवार पर चढाए। किले पर उदेभान रजपूत था। उसे पता चला कि गनिमाके लोग आए और ये खबर पता चलने पर कुल रजपूत कंबरकस्ता होकर, हाती तोहा बार लेकर, हिलाल (मशाल), चंद्रज्योती लगाकर बारासौ आदमी तोफवाले और तिरंदाज, बरचीवाले, चलकर आए, तब सैनिक लोगोने फौजपर रजपुत के भी चलकर आऐ, बडा युद्ध एक प्रहर हुआ। पाच सौ रजपूत मारे गए,उदेभान किल्लेदार खाशा की और तानाजी मालुसरा इनकी मुठभेड़ हुई। दोघे बड़े योद्धे, महशूर, एक एक से बढचढ पडे, तानाजीचे बाँए हाथ की ढाल टुटी, दूसरी ढाल समयास आई नहीं, फिर तानाजीने अपना बाँए हाथ की ढाल करके उसे खींच कर , दोनो महरागास भडके। दोनो की मौत हुई। फिर सूर्याजी मालुसरा (तानाजीचा भाई), इसने हिंमत कर के किला कुल लोग समेटते हुए बचे राजपूत मारे। किला काबीज किया।
    शिवाजी महाराज को दुर्ग जीतने की और तानाजी गिरने का समाचार मिला तब शिवाजी महाराज ने दुर्ग मिला पर सिंह गया एसा कहा।
    माघ वद्य नवमी दि. 4 फरवरी 1672 को यह युद्ध हुआ था।
    सिंहगड पर लगे फलक के अनुसार
    सिंहगड का नाम कोंढाणा, इसामी नाम के कवीने फुतुह्स्सलातीन या शाहनामा-इ-हिंद इस फार्शी काव्य में (इ. 1350) मुछ्म्द तुघलक ने इ.1628 में कुंधीयाना किले को लिया। उस समय यह किला नागनायक नाव के कोली के पास था।
    अहमदनगर के निजामशाही काल में कोंढाणा का उल्लेख इ.1482, 1553, 1554 व 1569 के समय के हैं इ.1635 के लगभग कोंढाणा पर सीडी अवर किलेदार थे मोगल व आदिलशाहा इऩ्होने मिलकर कोंढाणा लिया । इस समय(इ.1636) आदिलशाह का खजाना डोणज्याच्या खिंड में निजाम का सरदार मुधाजी मायदे ने लुटा।
    शहाजी राज्य के काल में सुभेदार दादोजी कोंडदेव मालवणकर इनके संरक्षण में कोंढाणा था ऐसा उल्लेख आदिलशाही फर्मानात है।
    दादोजी कोंडदेव आदिलशाही के नोकर थे फिर भी वो शहाजी राजा से एक निष्ठ थे।एकनिष्ठ होने के कारण शिवाजी राजा ने मृत्यूपर्यंत (इ.1647) कोंढाणा लेने का प्रयत्‍न नही किया। पर उनके बाद जल्द ही राजा ने यह दुर्ग अपने कब्जे में लिया।
    इतिहासकार श्री.ग.ह. खरे इनके मतानुसार तानाजी प्रसंग होने के पहले कोंढाणा का नाम 'सिहगड' किया गया इसके प्रमाण है। कै.ह.ना. आपटे इनके उपन्यास में तानाजी प्रसंग के बाद किले का नाम सिंहगड किया ऐसा उल्लेख है।
    शिवाजी राजा के समय और उसके बाद यह किला कभी मराठो के पास तो कभी मुगलाे के अधीन था।
    गडावरील ठिकाणे
    बारूद के कोठार: दरवाजे से अंदर आने पर जो पत्थरों की इमारत दिखती है वही ये बारूद के कोठार दि. 11 सितंबर 1751 में इन कोठारों पर बिजली गिरी इस दुर्घटना में उस समय दुर्ग पर स्थित फडणिस का घर उद्‌ध्वस्त हुआ और घर के सभी सदस्य मारे गए।
    टिलक बंगला : रामलाल नंदराम नाईक इनसे खरीदी गई जगह पर बने इस बंगलें में बाल गंगाधर तिलक आते रहते थे। 1915 साल में महात्मा गांधी और लोकमान्य तिलक इनकी मुलाकात इसी बंगले में हुई थी।
    कोंढाणेश्वर : यह मंदिर शंकरजी का है और वे यादव के कुलदैवता थे। अंदर एक पिंडी और सांब है और यह मंदिर यादवकालीन है।
    श्री अमृतेश्वर भैरव मंदिर' : कोंढाणेश्वर के मंदिर से थोडा आगे गए तो यह अमृतेश्वर का प्राचीन मंदिर लगता है। भैरव यह कोली लोगों के देवता है। यादवो के पहले इस दुर्ग पर कोली की बस्ती थी। मंदिर में भैरव व भैरवी ऐसी दो मूर्ती दिखती है। भैरव के हाथ में राक्षस की मुंडी है।
    देवटाके : तानाजी स्मारक के पीछे बाँए हाथ के छोटे तालाब के बाजू से बाई ओर जाने पर यह प्रसिद्ध ऐसा देवटाके लगता है। टंकी का उपयोग पीने के पानी के लिए किया जाता है और आज भी होता है। महात्मा गांधी जब पुणे आते थे तब जानकर इस टंकी का पानी पीने के लिए मंगाते थे।
    कल्याण दरवाजा : दुर्ग के पश्चिम दिशा की ओर यह दरवाजा है। कोंढण पूल पर से दुर्ग के शुरूवाती जगह से कल्याण गाव से ऊपर आने पर इस

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  35. प्रतापगढ़ किला

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    प्रतापगढ़ किला   Pratapgad fort

    प्रतापगढ़ दुर्ग महाराष्ट्र के सतारा जिले में सतारा शहर से 20 कि॰मी॰ दूरी पर स्थित है। यह मराठा शासक छत्रपती शिवाजी महाराज के अधिकार में था। उन्होंने इस किले को नीरा और कोयना नदियों की ओर से सुरक्षा बढ़ाने के उद्देश्य से बनवाया था। 1656 में किले का निर्माण पूर्ण हुआ था।

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  36. शिवनेरी किला

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    शिवनेरी किला Shivneri Fort
    शिवनेरी दुर्ग या शिवनेरी किला, भारत के महाराष्ट्र राज्य के पुणे के जुन्नर गांव के पास स्थित एक ऐतिहासिक किला है। शिवनेरी छत्रपति शिवाजी का जन्मस्थान भी है।
    शिवाजी के पिता, शाहजी बीजापुर के सुल्तान आदिल शाह की सेना में एक सेनापति थे। लगातार हो रहे युद्ध के कारण शाहजी, अपनी गर्भवती पत्नी जीजाबाई की सुरक्षा को लेकर चिंतित थे, इस लिए उन्होने अपने परिवार को शिवनेरी में भेज दिया। शिवनेरी चारों ओर से खड़ी चट्टानों से घिरा एक अभेद्य गढ़ था।
    शिवाजी का जन्म 19 फ़रवरी 1630 को हुआ था और उनका बचपन भी यहीं बीता। इस गढ़ के भीतर माता शिवाई का एक मन्दिर था, जिनके नाम पर शिवाजी का नाम रखा गया। किले के मध्य में एक सरोवर स्थित है जिसे "बादामी तालाब" कहते हैं। इसी सरोवर के दक्षिण में माता जीजाबाई और बाल शिवाजी की मूर्तियां स्थित हैं। किले में मीठे पानी के दो स्रोत हैं जिन्हें गंगा-जमुना कहते हैं और इनसे वर्ष भर पानी की आपूर्ति चालू रहती है।
    किले से दो किलोमीटर की दूरी पर लेन्याद्री गुफाएं स्थित हैं जहां अष्टविनायक का मन्दिर बना है।

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  37. ओरछा का किला

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    ओरछा का किला Orchha Fort
    ओरछा किला भारत के मध्य प्रदेश राज्य के ओरछा नामक स्थान पर बना एक किला है। इसका निर्माण सोलहवीं सदी में राजा रुद्र प्रताप सिंह ने शुरू करवाया था।

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  38. वरंगल दुर्ग

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    वरंगल दुर्ग Warangal Fort
    वारंगल् दुर्ग तेलंगाना के वरंगल में स्थित एक दुर्ग है। इसका निर्माण 1399 ई में हुआ था। काकतीय वंश के गजपति देव तथा उनकी पुत्री रुद्रम्मा ने इस विशाल दुर्ग का निर्माण कराया था।

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