मरुस्थल या रेगिस्तान ऐसे भौगोलिक क्षेत्रों को कहा जाता है जहां जलपात (वर्षा तथा हिमपात का योग) अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा काफी कम होती है। प्रायः (गलती से) रेतीले रेगिस्तानी मैदानों को मरुस्थल कहा जाता है जोकि गलत है। यह बात और है कि भारत में सबसे कम वर्षा वाला क्षेत्र (थार) एक रेतीला मैदान है। मरूस्थल (कम वर्षा वाला क्षेत्र) का रेतीला होना आवश्यक नहीं। मरुस्थल का गर्म होना भी आवश्यक नहीं है। अंटार्कटिक, जोकि बर्फ से ढका प्रदेश है, विश्व का सबसे बड़ा मरुस्थल है ! विश्व के अन्य देशों में कई ऐसे मरुस्थल हैं जो रेतीले नहीं है। आज हम दुनिया के कुछ सबसे विशाल रेगिस्तान अथवा मरूस्थलों के सम्बन्ध में आपको जानकारी देंगे –

  1. अंटार्कटिका

    अंटार्कटिका Antarctica
    अंटार्कटिका (या अन्टार्टिका) पृथ्वी का दक्षिणतम महाद्वीप है, जिसमें दक्षिणी ध्रुव अंतर्निहित है। यह दक्षिणी गोलार्द्ध के अंटार्कटिक क्षेत्र और लगभग पूरी तरह से अंटार्कटिक वृत के दक्षिण में स्थित है। यह चारों ओर से दक्षिणी महासागर से घिरा हुआ है। अपने 140 लाख वर्ग किलोमीटर (54 लाख वर्ग मील) क्षेत्रफल के साथ यह, एशिया, अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका और दक्षिणी अमेरिका के बाद, पृथ्वी का पांचवां सबसे बड़ा महाद्वीप है, अंटार्कटिका का 98% भाग औसतन 1.6 किलोमीटर मोटी बर्फ से आच्छादित है।
    औसत रूप से अंटार्कटिका, विश्व का सबसे ठंडा, शुष्क और तेज हवाओं वाला महाद्वीप है और सभी महाद्वीपों की तुलना में इसका औसत उन्नयन सर्वाधिक है। अंटार्कटिका को एक रेगिस्तान माना जाता है, क्योंकि यहाँ का वार्षिक वर्षण केवल 200 मिमी (8 इंच) है और उसमे भी ज्यादातर तटीय क्षेत्रों में ही होता है। यहाँ का कोई स्थायी निवासी नहीं है लेकिन साल भर लगभग 1,000 से 5,000 लोग विभिन्न अनुसंधान केन्द्रों जो कि पूरे महाद्वीप पर फैले हैं, पर उपस्थित रहते हैं। यहाँ सिर्फ शीतानुकूलित पौधे और जीव ही जीवित, रह सकते हैं, जिनमें पेंगुइन, सील, निमेटोड, टार्डीग्रेड, पिस्सू, विभिन्न प्रकार के शैवाल और सूक्ष्मजीव के अलावा टुंड्रा वनस्पति भी शामिल हैं
    हालांकि पूरे यूरोप में टेरा ऑस्ट्रेलिस (दक्षिणी भूमि) के बारे में विभिन्न मिथक और अटकलें सदियों से प्रचलित थे पर इस भूमि से पूरे विश्व का 1820 में परिचय कराने का श्रेय रूसी अभियान कर्ता मिखाइल पेट्रोविच लाज़ारेव और फैबियन गॉटलिएब वॉन बेलिंगशौसेन को जाता है। यह महाद्वीप अपनी विषम जलवायु परिस्थितियों, संसाधनों की कमी और मुख्य भूमियों से अलगाव के चलते 19 वीं शताब्दी में कमोबेश उपेक्षित रहा। महाद्वीप के लिए अंटार्कटिका नाम का पहले पहल औपचारिक प्रयोग 1890 में स्कॉटिश नक्शानवीस जॉन जॉर्ज बार्थोलोम्यू ने किया था। अंटार्कटिका नाम यूनानी यौगिक शब्द ανταρκτική एंटार्कटिके से आता है जो ανταρκτικός एंटार्कटिकोस का स्त्रीलिंग रूप है और जिसका अर्थ "उत्तर का विपरीत" है।"1959 में बारह देशों ने अंटार्कटिक संधि पर हस्ताक्षर किए, आज तक छियालीस देशों ने इस संधि पर हस्ताक्षर किए हैं। संधि महाद्वीप पर सैन्य और खनिज खनन गतिविधियों को प्रतिबन्धित करने के साथ वैज्ञानिक अनुसंधान का समर्थन करती है और इस महाद्वीप के पारिस्थितिक क्षेत्र को बचाने के लिए प्रतिबद्ध है। विभिन्न अनुसंधान उद्देश्यों के साथ वर्तमान में कई देशों के लगभग 4,000 से अधिक वैज्ञानिक विभिन्न प्रयोग कर रहे हैं।

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  2. आर्कटिक रेगिस्तान

    आर्कटिक रेगिस्तान Arctic desert
    आर्कटिक मरुस्थल का उत्थान एक स्थलीय उद्गार है, जो आर्कटिक महासागर में स्वाल्बार्ड, फ्रांज जोसेफ लैंड, सेवरनी द्वीप और सेवरना जेम्लिया के द्वीप समूहों को 75 डिग्री उत्तरी देशांतर से ऊपर कवर करता है। ई कठोर बर्फ के वातावरण में ग्लेशियरों, बर्फ और नंगे चट्टान के साथ कवर किया गया।

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  3. सहारा

    सहारा Sahara
    सहारा (अरबी: الصحراء الكبرى, "सबसे बड़ा मरुस्थल') विश्व का विशालतम गर्म मरुस्‍थल है। सहारा नाम रेगिस्तान के लिए अरबी शब्द सहरा (صحراء) से लिया गया है जिसका अर्थ है मरुस्थल। यह अफ़्रीका के उत्तरी भाग में अटलांटिक महासागर से लाल सागर तक 5,600 किलोमीटर की लम्बाई तक सूडान के उत्तर तथा एटलस पर्वत के दक्षिण 1,300 किलोमीटर की चौड़ाई में फैला हुआ है। इसमे भूमध्य सागर के कुछ तटीय इलाके भी शामिल हैं। क्षेत्रफल में यह यूरोप के लगभग बराबर एवं भारत के क्षेत्रफल के दूने से अधिक है। माली, मोरक्को, मुरितानिया, अल्जीरिया, ट्यूनीशिया, लीबिया, नाइजर, चाड, सूडान एवं मिस्र देशों में इस मरुस्थल का विस्तार है। दक्षिण मे इसकी सीमायें सहल से मिलती हैं जो एक अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय सवाना क्षेत्र है। यह सहारा को बाकी अफ्रीका से अलग करता है।
    सहारा एक निम्न मरुस्थलीय पठार है जिसकी औसत ऊँचाई 300 मीटर है। इस उष्णकटिबंधीय मरूभूमि का आंतरायिक इतिहास लगभग 30 लाख वर्ष पुराना है। यहाँ कुछ निम्न ज्वालामुखी पर्वत भी हैं जिनमें अल्जीरिया का होगर तथा लीबिया का टिबेस्टी पर्वत मुख्य हैं। टिबेस्टी पर्वत पर स्थित ईमी कूसी ज्वालामुखी सहारा का सबसे ऊँचा स्थान है जिसकी ऊँचाई 3,415 मीटर है। हवा के साथ बनते विशाल बालू के टीले एवं खड्ड इसकी सामान्य भू-प्रकृति बनाते हैं। सहारा मरुस्थल के पश्चिम में विशेष रूप से मरिसिनिया क्षेत्र में बड़े-बड़े बालू के टीले पाये जाते हैं। कुछ रेत के टिब्बों की ऊंचाई 180 मीटर (600 फीट) तक पहुँच सकती है। सहारा के मरुस्थल में कहीं-कहीं कुआँ, नदी, या झरना द्वारा सिंचाई की सुविधा के कारण हरे-भरे मरुद्यान पाये जाते हैं। कुफारा, टूयाट, वेडेले, टिनेककूक, एलजूफ सहारा के प्रमुख मरु-उद्यान हैं। कहीं-कहीं नदीयों की शुष्क घाटियाँ हैं जिन्हें वाडी कहते हैं। यहाँ खारी पानी की झीलें मिलती हैं।
    सहारा मरुस्थल की जलवायु शुष्क एवं विषम है। यहाँ दैनिक तापान्तर तथा वार्षिक तापान्तर दोनों अधिक होते हैं। यहाँ दिन में कड़ी गर्मी तथा रात में कठोर सर्दी पड़ती है। दिन में तापक्रम 580 सेन्टीग्रेड तक पहुँच जाता है और रात में तापक्रम हिमांक से भी नीचे चला जाता है। हाल के एक नए शोध से ज्ञात हुआ है कि अफ्रीका का सहारा क्षेत्र लगातार हरियाली घटते रहने के कारण लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व विश्व के सबसे बड़े मरुस्थल में बदल गया। अफ्रीका के उत्तरी क्षेत्र 6000 वर्ष पूर्व हरियाली से भरे हुए थे। इसके अलावा वहां बहुत सी झीलें भी थीं। इस भौतिक बदलाव का विस्तृत ब्यौरा देने वाले अधिकांश प्रमाण भी अब नष्ट हो चुके हैं। ये अध्ययन चाड में स्थित योआ झील पर किये गये थे। यहां के वैज्ञानिक स्टीफन क्रोपलिन के अनुसार सहारा को मरुस्थल बनने में पर्याप्त समय लगा, वहीं पुराने सिद्धांत एवं मान्यताओं के अनुसार लगभग साढ़े पांच हजार वर्ष पूर्व हरियाली में तेजी से कमी आयी और ये मरुस्थल उत्पन्न हुआ। सन 2000 में कोलंबिया विश्वविद्यालय के डॉ॰पीटर मेनोकल के अध्ययन पुरानी मान्यता को सहारा देते हैं।
    सहारा मरुस्थल में पूर्वोत्तर दिशा से हरमट्टम हवाएं चलती हैं। ये गर्म एवं शुष्क होती हैं। गिनी के तटीय क्षेत्रों में ये हवाएं डॉक्टर वायु के नाम से प्रचलित हैं, क्योंकि ये इस क्षेत्र के निवासियों को आर्द्र मौसम से राहत दिलाती हैं। इसके अलावा मई तथा सितंबर के महीनों में दोपहर में यहां उत्तरी एवं पूर्वोत्तर सूडान के क्षेत्रों में, खासकर राजधानी खार्तूम के निकटवर्ती क्षेत्रों में धूल भरी आंधियां चलती है। इनके कारण दिखाई देना भी बहुत कम हो जाता है। ये हबूब नाम की हवाएं तड़ित एवं झंझावात के साथ साथ भारी वर्षा लाती हैं।

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  4. अरेबियन डेजर्ट

    अरेबियन डेजर्ट Arabian Desert
    अरबी रेगिस्तान (अंग्रेज़ी: Arabian Desert; अरबी: الصحراء العربية‎, अस-सहरा अल-अरबीया) पश्चिमी एशिया में स्थित एक विशाल रेगिस्तान है जो दक्षिण में यमन से लेकर उत्तर में फ़ारस की खाड़ी तक और पूर्व में ओमान से लेकर पश्चिम में जोर्डन और इराक़ तक फैला हुआ है। अरबी प्रायद्वीप का अधिकाँश भाग इस रेगिस्तान में आता है और इस मरुस्थल का कुल क्षेत्रफल 23.3 लाख किमी2 है, यानि पूरे भारत के क्षेत्रफल का लगभग 70%। इसके बीच में रुब अल-ख़ाली नाम का इलाक़ा है जो विश्व का सबसे विस्तृत रेतीला क्षेत्र है।अरबी रेगिस्तान का वातावरण बहुत कठोर है। दिन में यहाँ अत्यंत गर्मी और सूरज का प्रकोप रहता है और रात में तापमान कभी-कभी शुन्य से भी नीचे गिर जाता है। इस वजह से यहाँ जीव विविधता काफ़ी कम है, हालांकि यहाँ ग़ज़ल और ओरिक्स जैसे हिरण, रेत बिल्ली और कांटेदार दुम वाली गिरगिट जैसे प्राणी रहते हैं। यहाँ कभी धारीदार लकड़बग्घा, सियार और बिज्जू भी मिलते थे लेकिन अनियंत्रित शिकार और अन्य मानवी गतिविधियों से वह यहाँ विलुप्त हो चुके हैं।इस क्षेत्र की धरती के रूप विविध हैं। लाल रेत के टीले, लावा की विस्तृत चट्टानें, शुष्क पहाड़ी शृंखलाएँ, सूखी वादियाँ और ऐसे रेतीले क्षेत्र जिसमें चलने वाले दलदल की तरह अन्दर धंसकर डूब जाते हैं - सभी इस रेगिस्तान में मौजूद हैं।

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  5. गोबी रेगिस्तान

    गोबी रेगिस्तान Gobi Desert
    गोबी मरुस्थल, चीन और मंगोलिया में स्थित है। यह विश्व के सबसे बड़े मरुस्थलों में से एक है। गोबी दुनिया के ठंडे रेगिस्तानों में एक है, जहां तापमान शून्य से चालीस डिग्री नीचे तक चला जाता है। गोबी मरुस्थल एशिया महाद्वीप में मंगोलिया के अधिकांश भाग पर फैला हुआ है। यह मरुस्थल संसार के सबसे मरुस्थलों में से एक है। 'गोबी' एक मंगोलियन शब्द है, जिसका अर्थ होता है- 'जलरहित स्थान'। आजकल गोबी मरूस्थल एक रेगिस्तान है, लेकिन प्राचीनकाल में यह ऐसा नहीं था। इस क्षेत्र के बीच-बीच में समृद्धशाली भारतीय बस्तियाँ बसी हुई थीं। गोबी मरुस्थल पश्चिम में पामीर की पूर्वी पहाड़ियों से लेकर पूर्व में खिंगन पर्वतमालाओं तक तथा उत्तर में अल्ताई, खंगाई तथा याब्लोनोई पर्वतमालाओं से लेकर दक्षिण में अल्ताइन तथा नानशान पहाड़ियों तक फैला है। इस मरुस्थल का पश्चिमी भाग तारिम बेसिन का ही एक हिस्सा है। यह संसार का पांचवां बड़ा और एशिया का सबसे विशाल रेगिस्तान है। सहारा रेगिस्तान की भांति ही इस रेगिस्तान को भी तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है- 1. ताकला माकन रेगिस्तान 2. अलशान रेगिस्तान 3. मुअस या ओर्डिस रेगिस्तान गोबी रेगिस्तान का अधिकतर भाग रेतीला न होकर चट्टानी है। यहाँ रेगिस्तान की जलवायु में तेजी से बदलाव होता है। यहाँ न केवल सालभर तापमान बहुत जल्दी-जल्दी बदलता है, बल्कि 24 घंटों में ही तापमान में व्यापक परिवर्तन भी आ जाता है। गोबी रेगिस्तान में वर्षा की औसत मात्रा 50 से 100 मि.मी. है। यहाँ अधिकतर वर्षा गर्मी के मौसम में ही होती है। रेगिस्तान में अधिकतर नदियाँ बारिश के मौसम में ही बहती हैं। अत: केवल वर्षा ऋतु में ही नदी में पानी रहता है। निकटवर्ती पर्वतों से जल धाराएँ रेगिस्तान की शुष्क भूमि में समा जाती हैं। यहाँ काष्ठीय व सूखा प्रतिरोधी गुणों वाले सैकसोल नामक पौधे बहुतायत में मिलते हैं। लगभग पत्ति विहीन यह पौधा ऐसे क्षेत्रों में भी उग आता है, जहाँ की रेत अस्थिर होती है। अपने इस विशेष गुण के कारण यह पौधा भू-क्षरण को रोकने में सहायक होता है। गोबी रेगिस्तान 'बेकिटरियन ऊंट', जिनके दो कूबड होते हैं, का आवास स्थल माना जाता है। कछु जगंली किस्म के गधे भी यहाँ पाये जाते हैं। संसार के रेगिस्तान के विशेष भालू इसी रेगिस्तान में पाए जाते हैं। इन भालूओं की प्रजाति 'मज़ालाई' अथवा 'गोबी' अब लुप्त होने के कगार पर पहुँच चुकी है। इसके अतिरिक्त यहाँ जंगली घोड़े, गिलहरी व छोटे कद के बारहसिंगे भी पाये जात हैं। विस्तार संसार के बड़े मरुस्थलों में से एक गोबी का मरुस्थल, जिसका विस्तार उत्तर से दक्षिण में लगभग 600 मील तथा पूर्व से पश्चिम में लगभग 1000 मील है, तिब्बत तथा अल्ताई पर्वतमालाओं के बीच छिछले गर्त के रूप में विद्यमान है। इसकी प्राकृतिक भू-रचना ढालू मैदान के समान है, जिसके चारों तरफ़ पर्वतीय ऊँचाइयाँ हैं। कटाव तथा संक्षारण क्रियाओं के प्रबल होने से यह मरुस्थल अपनी विशिष्ट भूरचना के लिये प्रसिद्ध है। सूखी हुई नदियों की तलहटियाँ तथा झीलों के तटों पर ऊँचाई पर स्थित जल के निशान यहाँ की जलवायु में परिवर्तन के प्रमाण हैं। सभ्यता अवशेष प्राचीन कालीन विभिन्न सभ्यताओं के द्योतक भग्नावशेष भी इस मरुस्थल में पाए जाते हैं। यहाँ गर्मी बहुत ज़्यादा और तेज़ पड़ती है तथा गर्मी में औसत तापमान 45° से 65° सें. तथा जाड़े का ताप 15° सें. तक रहता है। यहाँ पर कभी-कभी बर्फ़ के तूफ़ान तथा उष्ण बालू मिश्रित तूफ़ान भी आते हैं। यहाँ कि वनस्पतियों में घास तथा काँटेदार झाड़ियाँ मुख्य रूप से पाई जाती हैं। जल का यहाँ प्राय: अभाव ही रहता है। कारवाँ मार्गों पर 10 मील से 40 मील की दूरी पर कुएँ पाए जाते हैं। गोबी के मरुस्थल से उठते धूल के गुबार से परेशान चीन ने राजधानी बीजिंग के बाहरी इलाकों से मंगोलिया के भीतर तक वृक्षारोपण के जरिये पेड़ों की दीवार बनाई है। इससे काफी हद तक 'येलो ड्रैगन' के नाम से मशहूर इस धूल भरी आंधी से चीन को छुटकारा मिला है। चीन की योजना इस रेगिस्तान को रोकने की है, क्योंकि उसे भय है कि इसके विस्तार से उसकी कृषि व्यवस्था के लिए संकट पैदा हो सकता है। भूजल स्तर के गिरने, जंगलों की अंधाधुंध कटाई और पशुओं की चराई केकारण यह मरुस्थल फैलता ही जा रहा है।

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  6. पटागोनियन रेगिस्तान

    पटागोनियन रेगिस्तान Patagonian Desert
    पैटागोनियन रेगिस्तान, जिसे पेटागोनियन स्टेपी के रूप में भी जाना जाता है, अर्जेंटीना में सबसे बड़ा रेगिस्तान है और क्षेत्रफल के हिसाब से दुनिया का 8 वां सबसे बड़ा रेगिस्तान है, जिसमें 673,000 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र है।

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  7. महान विक्टोरिया रेगिस्तान

    महान विक्टोरिया रेगिस्तान Great Victoria Desert
    ग्रेट विक्‍टोरिया विश्व का एक विशाल मरूस्‍थल है।जो आस्ट्रेलिया में है।

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  8. कालाहारी रेगिस्तान

    कालाहारी रेगिस्तान Kalahari Desert
    कालाहारी विश्व का एक विशाल मरूस्‍थल है। कालाहारी मरुस्थल का क्षेत्र दक्षिणवर्ती अफ़्रीका के बोत्सवाना, नामीबिया तथा दक्षिण अफ़्रीका देशों की सीमा में लगभग 9 लाख वर्गकिलोमीटर में विस्तृत है। इसको आवृत करने वाली कालाहारी घाटी कोई 25 लाख वर्ग किलोमीटर में फैली है। मरुस्थल में सालाना 8-19 सेमी वर्षा होती है। इसके कुछ हिस्सों में साल में तीन महीने वर्षा होती है जिसकी वजह से यहाँ पशुओं की आबादी भी देखने को मिलती है। यहाँ रहने वाली जनजातियों को बुशमैन कहा जाता है। 1980 के दशक में यहाँ के वन्य जीव संरक्षण के कई उपाय हुए। यह एक उष्ण कटिबंधीय मरुस्थल है। इसके पश्चिम में नामीब मरुस्थल है। कालाहारी में दो बड़े नमक के मैदान भी है। इसके उत्तर पश्चिम में ओकावंगो नदी डेल्टा बनाती है जो वन्यजीवन से भरपूर है। इस रेगिस्तान में पाई जाने वाली रेत भी स्थान-स्थान पर भिन्न रंग की होती है। कुछ लोग कालाहारी को रेगिस्तान नहीं मानते, क्योंकि यहाँ पर वर्षा का स्तर काफ़ी अच्छा है। जाड़े के दिनों में यहाँ का तापमान जमाव बिन्दु से नीचे चला जाता है। इस रेगिस्तान में जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की विभिन्न प्रजातियाँ पाई जाती हैं।यह रेगिस्तान अपने खनिजों के लिए बहुत प्रसिद्ध है, यहाँ हीरा ,निकल तथा यूरेनियम आदि के पर्याप्त भण्डार मौजूद हैं।यह रेगिस्तान दक्षिण में 'ओरेंज नदी तथा उत्तर में जाम्बेजी नदी के बीच स्थित है।'कालाहारी' शब्द संभवतः 'कीर' से बना है, जिसका अर्थ होता है-'बेहद प्यास'। यह भी कहा जाता है कि कालाहारी एक विशेष जनजातीय शब्द है,जो 'कालागारी' अथवा 'कालागारे' से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ होता है-'जलविहीन स्थान'। अन्य रेगिस्तानों की भांति इस स्थान पर भी रेत के टीले व बजरी के समतल क्षेत्र हैं। यहाँ के टीले लगभग स्थिर रहते हैं।

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  9. महान बेसिन रेगिस्तान

    महान बेसिन रेगिस्तान Great Basin Desert
    महान बेसिन रेगिस्तान सिएरा नेवादा और वाशेच रेंज के बीच ग्रेट बेसिन का हिस्सा है।

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  10. सीरियाई रेगिस्तान

    सीरियाई रेगिस्तान Syrian Desert
    सीरियाई मरुस्थल (Syrian Desert, अरबी: بادية الشام, बादियत अस-शाम) मध्यपूर्व में स्थित एक 500,000 वर्ग किमी पर फैला हुआ घासभूमि और रेगिस्तान का एक विस्तार है। यह दक्षिणपूर्वी सीरिया, पूर्वोत्तरी जॉर्डन, उत्तरी साउदी अरब और पश्चिमी इराक़ में फैला हुआ है। दक्षिण में यह अरबी रेगिस्तान से जाकर मिल जाता है। इसका अधिकतर भाग एक शुष्क कंकड़-बजरी वाला मैदान है जिसमें जहाँ-तहाँ वादियाँ मिलती हैं।

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